जिंदगी आमतौर पर
मूल्यों पर खड़ी होनी चाहिए।
जिसका समय समय पर
मूल्यांकन हो सके।
लेकिन इस मुल्क में
जिंदगी के मायने अलग-अलग हैं।
बचपन, जवानी और बुढ़ापा।
बचपन जिन परिस्थितियों में
गुजरता है।
वहां सरकारी स्कूल होते हैं,
जहां का टीचर जानता है
बच्चों का परिवेश, धर्म और जाति।
वहीं से शुरू होता है
नफरतों का बीज बो देता है
वह उस होनहार की जिंदगी में।
जिसे ढोता है पूरी जिंदगी
दुनिया की चकाचौंध में।
वह सच नहीं देख पाता
क्या यह कह सकते हैं
उसे सच देखने ही नहीं देता।
उसका पाठ्यक्रम ?
जिसमें संजोया गया है
जुमलेबाजी का भंडार,
गहरी काली झील में।
वहां से निकलता है
और वह टूट पड़ता है।
सौंदर्य के कच्चे पेड़ों पर।
वह नहीं जानता यह पेड़
इतने जहरीले फल देते हैं।
जिसे खाकर खो देता है
वह अपना होशो हवास।
हमने देखा है ऐसे ऐसे,
घटते हुए दिवास्वप्न।
जो सच नहीं थे।
और आगे भी सच होने के आसार।
नजर नहीं आ रहे हैं।
तभी तो दुनिया के सौंदर्य में।
वह सौंदर्य नजर नहीं आ रहे हैं।
जो हमारे पास 90/95 प्रतिशत.
देश बनाने वाले लोग।
अपने बच्चों में नहीं देख पा रहे हैं।
उनका भविष्य अंधकार में
डूबता जा रहा है.....।
या डुबोया जा रहा है।
पाखंड, अंधविश्वास और चमत्कार में।
हिंदू, मुसलमान, सिख और इसाई होने में।
हम कहां खड़े हैं।
मूल्यों पर खड़ी होनी चाहिए।
जिसका समय समय पर
मूल्यांकन हो सके।
लेकिन इस मुल्क में
जिंदगी के मायने अलग-अलग हैं।
बचपन, जवानी और बुढ़ापा।
बचपन जिन परिस्थितियों में
गुजरता है।
वहां सरकारी स्कूल होते हैं,
जहां का टीचर जानता है
बच्चों का परिवेश, धर्म और जाति।
वहीं से शुरू होता है
नफरतों का बीज बो देता है
वह उस होनहार की जिंदगी में।
जिसे ढोता है पूरी जिंदगी
दुनिया की चकाचौंध में।
वह सच नहीं देख पाता
क्या यह कह सकते हैं
उसे सच देखने ही नहीं देता।
उसका पाठ्यक्रम ?
जिसमें संजोया गया है
जुमलेबाजी का भंडार,
गहरी काली झील में।
वहां से निकलता है
और वह टूट पड़ता है।
सौंदर्य के कच्चे पेड़ों पर।
वह नहीं जानता यह पेड़
इतने जहरीले फल देते हैं।
जिसे खाकर खो देता है
वह अपना होशो हवास।
हमने देखा है ऐसे ऐसे,
घटते हुए दिवास्वप्न।
जो सच नहीं थे।
और आगे भी सच होने के आसार।
नजर नहीं आ रहे हैं।
तभी तो दुनिया के सौंदर्य में।
वह सौंदर्य नजर नहीं आ रहे हैं।
जो हमारे पास 90/95 प्रतिशत.
देश बनाने वाले लोग।
अपने बच्चों में नहीं देख पा रहे हैं।
उनका भविष्य अंधकार में
डूबता जा रहा है.....।
या डुबोया जा रहा है।
पाखंड, अंधविश्वास और चमत्कार में।
हिंदू, मुसलमान, सिख और इसाई होने में।
हम कहां खड़े हैं।
-डॉ.लाल रत्नाकर
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