बुधवार, 20 मई 2026

यह शहर है जहॉ पत्थरों को तराशा है देशभर के नामचीन शिल्पकारों ने!

 

यह शहर है जहॉ पत्थरों को 
तराशा है देशभर के 
नामचीन शिल्पकारों ने!
शायद उन्हें नहीं पता !
की यह बेशक़ीमती हैं 
इस शहर के इतिहास में 
मौलिकता की मिसाल है
एक अदद गौरवशाली 
परंपरा के पाषाण हैं ।
औद्योगिक शहर के 
मस्तक के तिलक हैं
कला के प्रतिमान है
उस युग के निशान हैं 
भव्यता की पहचान हैं 
ज्ञान और विज्ञान के प्रतिमान हैं 
हम सभ्य हैं उसकी पहचान हैं ।
शान्ति समृद्धि नैसर्गिक 
जीवंतता की थाती हैं ।
यह मेरे शहर की अद्भुत शान है
इसकी कल्पना के पीछे 
त्याग और समर्पण का 
संचित संकल्प है ।
यह केवल पत्थर नहीं है !
उसमें से निकलता हुआ 
बौद्धिकता का विन्यास है!
साहित्य संगीत कला का जीवंत 
पहचान है ।

-डॉ लाल रत्नाकर 

यह श्रमणों का देश, ऐसा यहां संदेश।

 

यह श्रमणों का देश,
ऐसा यहां संदेश।
जीवन के मोड़ों पर। 
महापुरुष मिले 
किया अनुसरण जिनका। 
मगर ठगों के बेस में,
अपने ही परिवेश में, 
मिले बहुरूपिये के वेश में ।
जब तक उन्हें पहचानें
ठगी कर गए अनेक ।
उनको क्या-क्या नाम दूं या नाम लूं।
यह सवाल जो बना हुआ है। 
उत्तर है अनेक?
जो समाज बारात के लिए 
सजा हुआ है। 
क्या उसको पता है ?
'बाराती का मूल्य ?
एक प्लेट भोजन होता है। 
स्वाद के लिए कुछ और व्यंजन।' 
उसका कर्मकांड से 
पाखंड से अंधविश्वास से। 
चमत्कारिक संबंध होता है। 
वह नहीं समझता। 
जीवन के मूल्यों को। 
क्योंकि उसका विश्वास है,
ठगों के आसपास।
चक्कर काटता रहता है।
ऊन ठगों को प्रणाम।
साधुबाद कि उन्होंने 
ठगों पर नियंत्रण बनाए रखा है।
जो हैं आपके आसपास।
परिवर्तन तो चाहते हैं। 
लेकिन ठगी में।

-डॉ.लाल रत्नाकर

हम गए थे गाँव में शादी कराने को !

 
हम गए थे गाँव में
शादी कराने को !
पहले हुआ बहुत विरोध !
फिर जब शादी हो गई।
तो सब ने माथे चढ़ा लिया!
बुड्ढे जवान सबने
अब मन बना लिया 
हम भी करेंगे शादी 
अब इसी रीति से !
न्योता मिला है ।
आगे की शादियों के लिए
सब ने महसूस किया
यह शादी बहुत भली है
न रात का झंझट है
न यजमान की ठगी है।
न पाखंड का कोई चक्कर
यहॉ सब कुछ खुला खुला है
वर वधू का प्रतिज्ञापन ।
फिर जयमाल से हो शादी
न समय की बर्बादी
न पाखंडियों की सौदेबाजी ।
संविधान की उद्देश्यिका
का वर बधू करे वाचन।
साक्षियों के समर्थन से ।
पूरी हो यह शादी।
वर वधू के हाथ में 
प्रमाण पत्र देकर ।
पूरा कर दिया है,
नव दंपति का संकल्प॥
अब वाह वाही मिल रही है।
चारों तरफ़ से खूब!
अर्जक संघ का यही है!
बहुजनों तुम्हें संदेश।
पाखंड अंधविश्वास से
बचाना है अपना परिवेश।
चमत्कारियों की यहॉ
खुल गई है अब पोल 
चारों तरफ़ बज रही
ख़ुशियों की शहनाई और ढोल।

-डॉ. लाल रत्नाकर

आईए अब मिलकर नाकामियों को गले लगा लें।

 

आईए अब मिलकर 
नाकामियों को गले लगा लें।
अपने उन्हीं साथियों से आंखें चुरा लें।
लड़ने की हिम्मत नहीं है।
इंसाफ के लिए।
डर को गले लगा लें।
शोहरत अपनी बढ़ा लें।
नफरत को भी छुपा लें।
हिंदू मुसलमान के बीच। 
कल तक यही थे ?
मेरे इतने अपने और अजीज।
आज उनसे इतनी दूरी 
क्यों बढ़ा लें।
ऐसा क्यों कर रहे हो।
दूरी क्यों बढ़ा रहे हो। 
यह मुल्क सब ने बनाया है। 
यह क्यों भूल रहे हो।
मनुष्यता का दुश्मन ।
वो सदियों से रहा है। 
सब में फूट डालकर जो लूट रहा है।
लोकतंत्र के लिए !
संविधान ने सब कुछ समझाया है।
यह मंत्र बताया है। 
इसीलिए संविधान ही धर्म हमारा है। 
यह तय करना होगा। 
हिंदू मुस्लिम सभी बचेंगे। 
जब यह नारा होगा। 
और बहुजन की आवाज उठेगी। 
भागेगा दुश्मन। 
यह बिल्कुल माकूल दवा है। 
हमें यही आवाज उठाना है।
यदि मुल्क बचाना है। 
सबको यही समझाना है।

-डा.लाल रत्नाकर 

शनिवार, 9 मई 2026

फलानी जी लड़ रही हैं -



उन्हें शर्म नहीं आती 
यह कहते हुए ; 
फलानी जी लड़ रही हैं -
पर सच क्या है 
क्या वह नहीं जानती 
तो सुनो कान खोलकर 
सबसे पहले उन्होंने 
बाबा साहब अंबेडकर के 
रास्ते को छोड़ा, 
काशीराम के रास्ते को छोड़ा 
और बहुजन की बजाय 
सर्वजन किया ?
किस दुनिया में हो 
और किस गुफा में सो रहे हो। 
निकलो आँखें खोलो 
वह जलालत को सह रही हैं। 
आत्मविश्वास मर चुका है। 
जागो बहुजन जागो।
मोह माया त्यागो !

-डॉ लाल रत्नाकर 

गुरुवार, 7 मई 2026

नए भारत में क्या नया होने जा रहा है !

नए भारत में क्या नया होने जा रहा है !
या होता जा रहा है निरंतर इस देश में.
सैकड़ों साल से खोद रहा था मुल्क को 
क्या आप देख पा रहे हैं हाँ या नहीं ?
मुझे यह दिख रहा है सीधी आँखों से !
जो इस देश की अवाम को लुभा रहे थे !
लुभा रहे हैं झूठ से, जुमले और धर्म से !
जाति-पांत के भेदभाव की राजनीती से। 
लूट खसोट के व्यवहार और विचार से। 
संघ के सवाल पर मनुवाद के हाल पर। 
कौन सोच रहा है लोकतंत्र के हाल पर !

-डॉ लाल रत्नाकर 



सोमवार, 4 मई 2026

लड़कियां खूबसूरत होती हैं

लड़कियां खूबसूरत होती हैं 
लडके भी इतने बुरे नहीं होते !
पर उनकी खूबसूरती का क्या ?
जो ईर्ष्यालु और नफ़रत से लबरेज हों 
सुकोमल कलियाँ नहीं कांटे हों 
कांटे की तरह चुभते हों !
मन में अविश्वास और फितरत पाले हों !
सुंदरता के मतवाले हों गले में 
सर्प डाले हों और जहरीले नयन !
प्रकृति के खिलाफ जहर उगल रहे हों !
आडम्बर में नग्न और निराले हों !
संसार में सुख और दुःख का माप तौल !
खुद के हानि लाभ से करते हों ?
किसी का हक़ किसी का गला,
काटने में उन्हें कोई परहेज़ न हो !
यही उनकी खूबसूरती में बाधक है। 

-डॉ लाल रत्नाकर 






शुक्रवार, 1 मई 2026

बंगाल की अपनी संस्कृति है

 बंगाल की अपनी संस्कृति है 
अन्य प्रदेशों के शातिर से शातिर ठग 
वहॉ सफल नहीं हो सकते ?
उस संस्कृति के परिवर्तन का कोई सवाल नहीं है। 
क्या है किसी भी पार्टी की मानसिकता!
ज़रूरी नहीं है वह जो कुछ कह रही है।
कितना भरोसा किया जा सकता है।
जिसकी मानसिकता ही विश्वासघाती है।
जनता यह जानती तो है पर मानती कहाँ है।
उनका कोई हक ही नहीं बनता ।
जो कुछ कह रहा है उसे मानने की। 
समाज में परिवर्तन की बात करने में। 
क्योंकि वह लोकतंत्र को नहीं मानते ?
चुनाव में वह नहीं केंचुआ लड़ रहा है ?
एक अकेली महिला से जो चिल्ला रही है 
एक अकेली महिला जो ललकार रही है !
ऐसे हालात में पूरा मुल्क दुत्कार रहा है ।
पर जीत को हड़प कर जश्न मना रहा है। 
सर्वत्र उसके गुंडे आग लगा रहे हैं। 
बंगाल की स्मिता को मिटा रहे हैं। 
क्योंकि अब तक बंगाली बंगाली था। 
जिसे हिन्दू और मुसलमान बना दिया ?
जातिवाद की आग लगा दिया !

-डॉ. लाल रत्नाकर







गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

लोक सभा में जो बैठा है वह संविधान के खिलाफ है


लोक सभा में जो बैठा है 
वह संविधान के खिलाफ है 
लोकसभा भी नई है 
और  इसको बनाने वाले
 भारतीय लोकतंत्र के विरोधी है
जो खुले आम कहते हैं
 कि वह संविधान नहीं मानते
लोकतंत्र विरोधी है वे मनुवादी !
मनुवाद का मुखौटा संविधान !
संविधान की करता बात है !
उसके मन में विश्वासघात है ?
रोज़ करता संविधान संसोधन !
जो है संविधान के खिलाफ !
निष्प्रभावी बनाता है संविधान को  !
मनुवाद के आधार पर परिवर्तन ?
ही उसका संविधान संशोधन है।
आवरण संविधान का परिवर्तन !
मनुवाद का जो बहुजन नहीं समझता ?
क्योंकि उसे फसा रखा है भगवान् में !
संविधान उसका धर्म है वह नहीं जानता !
पाखण्ड में अटका हुआ है !
अंधविश्वास में लटका हुआ है !
चमत्कार और झूठ से बंधा हुआ है !
यही उसपर अत्याचार है,
 जिसे वह नहीं जानता ?
लोक सभा में जो बैठा है 
वह संविधान के खिलाफ है 

-डॉ. लाल रत्नाकर 

सोमवार, 30 मार्च 2026

कोई मर गया है क्या?

कोई मर गया है क्या? 
नहीं मरा नहीं है मार दिया गया है।
किसने मारा और क्यों! 
यह तो मारने वाला भी नहीं जानता !
मरने वाले को जरूर पता होगा ?
यह पता कैसे चलेगा। 
इस पर जांच बैठाई जा सकती है। 
जांच के सदस्य जरूर पता कर लेंगे। 
इतना सुंदर कारण गढ़ देंगे।
मरने वाले के परिजन डर जाएंगे। 
मारने वाला और खूंखार हो जाएगा। 
उसे हत्या के जुर्म से 
मुक्त कर दिया गया है ।
और जगह-जगह पंडाल लगाकर। 
हत्यारे को उत्साही बताकर।
सम्मानित किया जाएगा ‌।
उसके साहसी होने में ,
चार चांद लगाया जा रहा है ।
उसका भविष्य गर्त में,
ले जाया जा रहा है।
नये देश में नए वेश में।
आत्मनिर्भर परिवेश में।
भयमुक्त समाज में!
कैसे मर गया है?

-डॉ.लाल रत्नाकर


मंगलवार, 10 मार्च 2026

हमारी परवरिश का परिवेश ?


हमारी परवरिश का परिवेश ?
प्राकृतिक रहा है ।
नदियां नाले और जंगल रहे हैं।
प्रकृति में विविधता भरी है ।
उसकी सामूहिक चेतना।
परंपरा परिवार और
समृद्धि का सपना।
लोक संस्कृति, डीह,
लोक देवता। 
पृष्ठभूमि में भले ही चले गए हो। 
आज के नए परिवेश में। 
संसाधनों का जमावड़ा। 
गांव पहुंचती सड़के।
सड़कों के जरिए विकास। 
विकास का समाज में सम्मान। 
सब कुछ उस परिवेश से।
निरंतर छीजता जा रहा है।
उसे स़ंजोने का साहस करना होगा। 
वही परिवेश आपकी मूल पूंजी है।
जो हमारे परवरिश 
का परिवेश रहा है। 
हमने वहीं पर कठिनाइयों का। 
नैतिकता और ईमानदारी का,
ज्ञान, विज्ञान और
विकास का पाठ पढ़ा है। 
सपना गढ़ा है।

-डॉ लाल रत्नाकर

रविवार, 8 मार्च 2026

तुम्हारे प्रतीकों का अर्थ कितने लोग समझते हैं

 


तुम्हारे प्रतीकों का अर्थ?
कितने लोग समझते हैं 
यह तो नहीं पता ?
लेकिन हमें अच्छी तरह 
समझ में आता है। 
तुम्हारे प्रतिकों में और 
तुम्हारे असली चेहरे में। 
दिन और रात का फर्क है। 
श्वेत और श्याम का फर्क है। 
काले और सफेद का फर्क है। 
फर्क है मनुष्यता का, 
हैवानियत का, जलालत का 
और इंसानियत का। 
तुम किसी भी तरह से 
इंसान नहीं हो सकते। 
भगवान बनने के चक्कर में। 
भगवान नहीं हो सकते। 
भगवान !
भूमि गगन वायु और नीर से बनता है। 
नर तो हो पर नारायण नहीं! 
प्रकृति सबकी जननी है 
उनकी भी जो मुंह से पैदा हुए हैं। 
या जैविक रूप से पैदा नहीं हुए हैं।
एक दिन बिना पानी,
बिना अग्नि बिना वायु,
जिंदा रहकर दिखा दो।
फिर तुम्हारे प्रतीकों पर।
भरोसा कर लेंगे। 
-डॉ लाल रत्नाकर

हजारों साल से जो दुश्मन रहे हैं।


आहत में राहत !
महसूस करने वाले।
जातियों में बंटे हैं।

हजारों साल के 
स्वजातीयों के 
दुश्मन हो गए हैं। 
उन जातियों के साथ। 
गलबहियां कर रहे हैं।
हजारों साल से 
जो दुश्मन रहे हैं। 

जब उनके लोग 
जहर उगलते हैं। 
तो उन्हीं जातियों का 
विरोध करते हैं। 
जिन जातियों ने 
उनकी रक्षा की है।
अब यहां यह 
समझ में नहीं आता। 
उनकी लड़ाई कौन लड़ेगा ?
वह तो उसी सत्ता के 
हिस्से बन गए हैं।
जो उनके विनाश का 
ढांचा तैयार कर रखा है। 
और निरंतर कर रहा है ।

याद आते हैं जगदेव बाबू 
याद आते हैं रामस्वरूप वर्मा, 
याद आते हैं ललई सिंह यादव। 
क्या इसी दिन के लिए 
उन्होंने लड़ा था।
उनमें वह कैसे फिट हो गए हैं। 
यही तो विचारणीय हैं।

क्योंकि एक संघी पत्रकार 
कह रहा था।
बहुजनों और दलितों के 
असली दुश्मन। 
तो यादव है।
वह बहुजन आंदोलन 
को कवर कर रहा था 
तभी आजकल के कथित,
बहुजन बौद्धिक। 
संघ की सेवा में लगे हैं।

- डॉ लाल रत्नाकर

नफ़रत के गीत लिखो शान्ति से


नफ़रत के गीत लिखो शान्ति से 
शान्ति से क्रान्ति लिखो मोहब्बत की !
आज़ादी का मतलब क्या यही है !
क्या यह सही है आज़ाद देश में !
किसके लिए कितना और कितना !
सहमति के साथ साथ असहमति भी ?
लिखो उनके लिए जो नफ़रत में पेज हैं !
पर किसके लिए कितना कितना ? 
जीतना अपने लिए उतना ही उनके लिए !
संविधान के विधान को बाबा के विधान को !
एक है हैवान भी 
चोंगे में ढोंगी के नशे में 
झूठ पर सवार भी !

-डॉ लाल रत्नाकर

यह बात कौन नहीं जानता पर मौन है !

 हमारे करम पर आफत आने वाली है 
क्योंकि हमारे गुरु जी फस गए हैं !
अपने कुकर्मों से चालाकी में चतुराई में। 
क्योंकि चुप हो गए चुप्पे की तरह ?
पूरी दुनिया में यह बात पहुँच गई है 
कोने कोने तक !
बेवफाई का नमूना निकल ही आता है। 
जरूरी नहीं है कि 
सब कुछ झूठ से छुप जाए। 
झूठ भी तो सच छुपाने के लिए होता है। 
सच झूठ को कैसे छुपाएगा। 
झूठा कभी नहीं शर्माएगा।
दुनिया भर के कानूनी फेरबदल। 
झूठ बोलने के लिए किए गए थे। 
क्योंकि सच बोलने की आदत नहीं है। 
यही तो नया भारत है। 
जहां झूठ बोलने की महारत है। 
क्योंकि देश इनको बर्दास्त नहीं करता 
यह बात कौन नहीं जानता पर मौन है !
तानाशाह के सामने आज के दौर में। 


-डॉ लाल रत्नाकर

सच के साथ हो या झूठ के !


सच तुम्हारा झूठ था 
झूठ तो सब झूठ था 
अंधे तुमने अंधा कर दिया 
जो पहले से ही अंधे अंधभक्त थे 
अब क्या करोगे !
कटोरा उठा लो !
यदि हाथ में दम हो ?
गम हो गम कम हो 
कैसे भूल जाऊं तुम !
धूर्त नहीं हो आज के 
पागल बनाने वाले देश को !
अब कहाँ ले जाओगे ?
इस धार्मिक देश को !
हिन्दू को ब्राह्मण बनाओ 
ब्राह्मण को शूद्र कहो !
ब्राह्मणो को छोड़कर ! 
सच के साथ हो या 
झूठ के !

-डॉ लाल रत्नाकर 

ब्राह्मणो को छोड़कर !

 

सच तुम्हारा झूठ था 
झूठ तो सब झूठ था 
अंधे तुमने अंधा कर दिया 
जो पहले से ही अंधे अंधभक्त थे 
अब क्या करोगे !
कटोरा उठा लो !
यदि हाथ में दम हो ?
गम हो गम कम हो 
कैसे भूल जाऊं तुम !
धूर्त नहीं हो आज के 
पागल बनाने वाले देश को !
अब कहाँ ले जाओगे ?
इस धार्मिक देश को !
हिन्दू को ब्राह्मण बनाओ 
ब्राह्मण को शूद्र कहो !
ब्राह्मणो को छोड़कर ! 
सच के साथ हो या 
झूठ के !

-डॉ लाल रत्नाकर 

शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

आग और पानी : आग और पानी सी दिल की कहानी

आग और पानी दिल की कहानी 
कितनी पुरानी यादें हैं हमें गिनानी।
जो गुजारी है हम पर और उनपर।  
किसकी कहानी है कितनी बतानी 
और कितनी छुपानी अपनों से परायों से 
आज की पीढ़ी को, सीढ़ी को उठानी है 
जहाँ चाहें लगानी है वहां से हटानी है। 





हमारी पीढ़ियां उलझी है विवादों में !
उनकी नफ़रत की सीमा नहीं होती !
दिल के झटके को करीने से बचाना है 
वो शातिर है बहुत माहिर सभी को जलाने में 
नहीं मरता अभी वह तो खतरा बहुत ही है 








आग और पानी सी दिल की कहानी। 
कितनी भी पुरानी यादें गिनानी हमें हैं। 
उनकी धारा हमारी धारा से धरासाई।
 

- डॉ लाल रत्नाकर 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

जो दौर गुजर जाते हैं ……!



जो दौर गुजर जाते हैं ……!
तब वह याद नहीं आते। 
उनकी स्मृतियों से ही ।
काम चला लेते हैं हमलोग !
उनकी स्मृतियां नहीं होती। 
क्योंकि स्मृतियाँ स्मृतियॉ होती हैं !
स्मृतियों पर ?
बहुत लंबी बहस हो सकती है।
पर स्मृतियां स्मृतियां हो तब न।
स्मृतियों को ढाल बनाकर ,
उनकी प्रतिमा लगाकर 
नहीं बनाया जा सकता !
इतिहास ?
जिनका इतिहास देशद्रोह का रहा !
बहाना नहीं बनाया जा सकता। 
स्मृतियों को समझना !
सपने की तरह ही है !
भुलाया नहीं जा सकता।
भूला जा सकता है कुछ समय के लिए ।
बहाना नहीं बनाया जा सकता ।
की इतिहास उन्हें माफ़ कर दिया है। 
क्योंकि उन्होंने उस सत्य की ह्त्या की है ?
जो दौर गुजर जाते हैं ……!
तब वह याद नहीं आते। 
उनकी स्मृतियों से ही ।
काम चला लेते हैं हमलोग !



















डॉ लाल रत्नाकर

सुनिए और भूल जाईए।


सुनिए और भूल जाईए।
वक्त गुजर जायेगा और ?
कुछ भी समझ नहीं आएगा।
वह लूटने को तैयार है 
और आप ?
बचाना भी नहीं जानते?
या बचाना ही नहीं चाहते ?

उसके पास भोथरा हथियार है।
और आप में धार भी नहीं ?
विचार भी नहीं।
कोई सरोकार है भी तो लाचार है। 
एक दूसरे की टांग खींचने में,
कामयाब हो हड़पने में लगे हो।
क्योंकि सच से डरे हो।

सच किसी की जागीर नहीं है।
सच सच है और यह नंगा करेगा।
झूठ का सम्राट बनकर !
कब तक ठगेगा वह तू कब जगेगा ढोर !



















-डा. लाल रत्नाकर