हमारी परवरिश का परिवेश ?
प्राकृतिक रहा है ।
नदियां नाले और जंगल रहे हैं।
प्रकृति में विविधता भरी है ।
उसकी सामूहिक चेतना।
परंपरा परिवार और
समृद्धि का सपना।
लोक संस्कृति, डीह,
लोक देवता।
पृष्ठभूमि में भले ही चले गए हो।
आज के नए परिवेश में।
संसाधनों का जमावड़ा।
गांव पहुंचती सड़के।
सड़कों के जरिए विकास।
विकास का समाज में सम्मान।
सब कुछ उस परिवेश से।
निरंतर छीजता जा रहा है।
उसे स़ंजोने का साहस करना होगा।
वही परिवेश आपकी मूल पूंजी है।
जो हमारे परवरिश
का परिवेश रहा है।
हमने वहीं पर कठिनाइयों का।
नैतिकता और ईमानदारी का,
ज्ञान, विज्ञान और
विकास का पाठ पढ़ा है।
सपना गढ़ा है।
नदियां नाले और जंगल रहे हैं।
प्रकृति में विविधता भरी है ।
उसकी सामूहिक चेतना।
परंपरा परिवार और
समृद्धि का सपना।
लोक संस्कृति, डीह,
लोक देवता।
पृष्ठभूमि में भले ही चले गए हो।
आज के नए परिवेश में।
संसाधनों का जमावड़ा।
गांव पहुंचती सड़के।
सड़कों के जरिए विकास।
विकास का समाज में सम्मान।
सब कुछ उस परिवेश से।
निरंतर छीजता जा रहा है।
उसे स़ंजोने का साहस करना होगा।
वही परिवेश आपकी मूल पूंजी है।
जो हमारे परवरिश
का परिवेश रहा है।
हमने वहीं पर कठिनाइयों का।
नैतिकता और ईमानदारी का,
ज्ञान, विज्ञान और
विकास का पाठ पढ़ा है।
सपना गढ़ा है।
-डॉ लाल रत्नाकर




















