मौसम में भी ताप है
संबंधों का अभिशाप है
रास्ता जितना जटिल है
पर सत्य उतना अटल है
समस्या जटिल है।
सरकारी दफ्तरों का
कर्मचारी बेईमान है
कर्तव्य से हैवान है।
अपने उत्तरदायित्व के लिए
कितना जिम्मेदार है !
यह कैसा इंसान है।
जो गर्मी में भी शांत है।
उसका मस्तिष्क क्लांत है।
ऐसा लग रहा है जैसे सबकुछ शांत है।
धूर्तता में कितनी जान है
वह कितना महान है।
उसको यह नहीं पता ?
आने वाली पीढ़ियों पे
उसका कितना असर है।
उसको नहीं पता है।
की वह किसको ठग रहा है।
-डॉ लाल रत्नाकर

















