केवल तुम किरदार थे उस परिवार के
जिसे गढ़ा था त्याग और तपस्या से उस संत ने
जिसने हमारे लिए सपने बुने थे सदाचार के
आदर्श और ज्ञान के, गौरवशाली अभिमान के
जिसे उसने निगल लिया सुरा के गिलास में
और निर्वासित कर दिया उस युवा को
जिससे उसको डर था वह खड़ा हो जाएगा
उसके सामने,मैं देख रहा था उसकी शातिर
नियति और चालबाजियां, पर लाचार था !
उसके कुकर्मों से मर्यादा बचाये रहने में !
भविष्य को गढ़ने में और अपने गहनों में।
अंधा समाज मौन था यह कहने में शातिर !
कौन था ?
-डॉ. लाल रत्नाकर

















