रविवार, 12 सितंबर 2021

अंधी हो गयी है।


आपने भेजा
शहंशाह जैसा
अहंकार का स्वरूप
अहंकारी व्यक्ति
जिसके गुण धर्म
स्वभाव में 
मनु के मनुस्मृति का
चलन आ गया हो
संविधान की जगह
समकालीन सत्ता के
अंग अंग में ।
और आज जनता भी
अंधी हो गयी है।
उसी रंग ढंग में।


डॉ लाल रत्नाकर 

जुमलों से पहले



सही पकड़ा गुरु।
तो अपने थे ना वह।
नया विमान लाए हैं।
घुमा लाते हर कंट्री।
कोई बात नहीं।
मन की बात में संदेश भेज देना
शायद अमल कर ले
बेटी बचाओ 
बेटी पढ़ाओ 
की बजाय अगला नारा 
विदेश घूम आओ,का गढ़ लें।
जुमलों से पहले 
और उसके बाद भी।
होना तो कुछ भी नहीं है।
केवल धर्म और संस्कृति
के थोथे आख्यान !
देश को कर दिया है
वियाबान।
डॉ लाल रत्नाकर 

आइए मिलकर?


आपके सामने एक समर है
जीवन जीने के अधिकार का
गलतियां आपने बहुत की हैं
आइए मिलकर?
अब एक अच्छी बात करें।
यदि यह अवसर 
इस बार आपके हाथ से 
निकल गया तो सदियां 
लग जाएगी 
उसके लिए संघर्ष करना
संभव नहीं होगा।
असंभव को संभव बनाकर
संविधान की जगह 
मनुस्मृति लाकर।
हजारों साल के लिए
धार्मिक गुलाम बनाकर।
वह अत्याचार किए जाएंगे
जिसकी परिकल्पना भी 
आपके मन में नहीं है।
जरा उनसे पूछिए जिन्होंने,
प्रशासनिक अधिकारी होकर,
कुछ नहीं कर पाए
सीधे जेल की हवा खा रहे हैं।
राजनेता होकर।
जेल के सिखचों के पीछे
कैसा जीवन बिताये हैं।
जरा उनसे पूछिए 
जो सत्य की बातकर
जीवन जेल में बिता रहे हैं।
आपको जुमले सुनाकर,
आपदा में अवसर 
की बात बता कर ।
किसानों को वर्षों से 
सड़कों पर बैठाए हैं।
काले कृषि कानूनों के सहारे
संघ की विचारधारा के
काले हथकंडो को 
कानून बनाकर।
किसानों पर लागू करने के लिए
असंवैधानिक तरीके से लाए हैं।
अगर आपकी समझ में 
नहीं आया है तो समझिए।
मीठा बोलकर फंसाने की 
साजिश ही इनका धर्म है।
इससे निकलना है तो 
संविधान को बचाना है।
हिंदुत्व के गीत गाना छोड़कर।
मानवता का डंका बजाना है।
निकलिए पाखंड से धूर्तता से,
निकालिए अपने मन से
लोभ लालच और झूठ।
नहीं तो निगल जाएगा आपको।
मनुस्मृति का अमानवीय स्वरूप
मानवता को बचाना है
इन संतो नुमा सामंती 
अत्याचारियों को भगाना है।
जुमले झूठ और वादों को
मन के भीतर पैठने नहीं देना है
मन की बात !
अपने भीतर से सुनना है!
"क्रूरता में करूणा"
की बात करना जुमला है
करुणा अलग है,
और क्रूरता ही करना है।
डॉ लाल रत्नाकर  

शनिवार, 21 अगस्त 2021

ईवीएम मशीनें उगल रही थी।



तपस्या से जब सत्ता प्राप्ति हो
उस तपस्या को हमने देखा है।
देखा तो आपने भी है शायद,
भूले नहीं होंगे, उस तपस्वी को।
जो उस समय तपस्या के लिए
सुदूर वादियों में विराजमान था
जब देश के चुनाव का रेजल्ट।
ईवीएम मशीनें उगल रही थी।
परिणाम भी तप के अनुसार
तपस्वी के पक्ष में आ रहे थे।
ईवीएम मशीनों के सच पर,
आंच न आए इसलिए तपस्या !
करते हुए दिखाई देना मात्र ।
दिखावा नहीं था बल्कि सच को
बहुत सूक्ष्म ढंग से न दिखाने का
एक प्रतीकात्मक तरीका था।
इस पर बहस नहीं होनी थी।
क्योंकि मीडिया के लोगों को
पहले से ही समझाया गया था।
पर आशंका तो जरूर थी।
अवाम को तो पागल ही पागल
ऐसे थोड़े ही बनाया गया था।

डॉ लाल रत्नाकर

बुधवार, 18 अगस्त 2021

दहशतगर्दी कोई पवित्र मार्ग नहीं है।

हशत भी कोई चीज होती है।
धर्मांधता की हो या जातिवाद की।
निरंकुशता की हो या आतंकवाद की।
दहशत भी कोई चीज होती है।
कितना भी बड़ा दहशत गर्द हो।
आमना सामना हो तो यह तय हो जाता है।
डरने से काम नहीं चलेगा।
मुकाबला तो करना होगा।
दहशतगर्द कोई अलग तरह का जीव नहीं है।
वह भी इसी संसार का प्राणी है।
फर्क इतना है कि वह आतंक का सहारा लेता है।
और आप उसके आतंकवाद से डर जाते हो।
दहशत मुकाबले से खत्म हो जाती है।
दहशतगर्दी की इंतहा का भी अंत हो जाता है।
दहशतगर्द जब मुकाबले में आ जाता है।
क्योंकि दहशतगर्दी कोई पवित्र मार्ग नहीं है।
डॉ. लाल रत्नाकर

सोमवार, 2 अगस्त 2021

वहां हो आना।


मुश्किल दौर में
बहुत मुश्किल से
निकलना हो पाता है।
कहां जाना है कब जाना है
कहां पता हो पाता है।
कितने दिनों से सोच रहा हूं
किसानों के साथ जाने के लिए
मगर निकलना मुश्किल है।
जाना चाहता हूं।
पर कहां हो पाता है।
महानगरों में रहने वाले।
किसानों का
पैदा किया हुआ खाते हैं।
पर उनके साथ जाने में,
कहां अपना शॉप दिखाते हैं
कितना आसान है।
यदि वे भी किसानों के साथ
चलने का फैसला कर लें।
शायद इन शहरियों को देखकर
सरकार मन बना ले।
और कितना सरल हो जाये।
उनकी बातें मान ली जाए।
फिर दिवाली आ जाए
किसानों की नगरी में
जिसे उन्होंने आंदोलन के लिए
बसाया है।
काश उससे पहले।
कुछ दिन गुजार करके
वहां हो आना। 

-डॉ लाल रत्नाकर 
Sitaram Yadav, Ashok Yadav और 5 अन्य लोग
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बुधवार, 21 जुलाई 2021

बहरूपिये तेरे कर्म


बहरूपिये तेरे कर्म
मेरे कर्म पर भारी है।
यह कैसी लाचारी है।
जनजीवन सब तबाह हो रहा।
यह कैसी जिम्मेदारी है
यह कैसी जिम्मेदारी है।
अवाम कराह रही है
हाहाकार मचा है।
तुमको उनकी कोई चिंता।
नहीं तुम्हें तो।
सत्ता का नशा ही भारी है।
इसीलिए मंदिर बनाने की तैयारी है।
क्योंकि तुम्हारी सत्ता का रास्ता।
मंदिर से होकर गुजरता है।
आम आदमी की खुशहाली का रास्ता।
गांव और खेतों से होकर गुजरता है।
इसीलिए यह सरकार गांव को।
बर्बाद करने पर लगी हुई है।
और आम आदमी की मजबूरी क्या है।
वह मौन क्यों है।

-डॉ लाल रत्नाकर 

देखिए इस युग की चालबाजियां



देखिए इस युग की चालबाजियां
जो दूसरे युगों से अलग कैसे हैं।
तुम्हारे बिरादरों को मंत्री बना दिया है।
तुम्हें डॉक्टर बनने की
जरूरत क्या है?
अफसर बनने की
जरूरत क्या है?
स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालय
जाने की जरूरत क्या है?
वकील और जज बनने की
जरूरत क्या है?
तुम्हारे मंत्रियों को
हमने कोई अधिकार
थोड़े दिया है।
वह तो हमारी बारात के
खूबसूरत बैंड वालों की
तरह हैं जो सज धज कर
अपने काम से काम तक
उन लालबत्तियों के साथ
मशगूल हो गए हैं।
तुम्हें शूल चुभ रहा है ?
तो किसी भी मंदिर में
चले जाओ
या कांवर उठाओ
और गंगा जल भर भर
के ले आओ।
उसे किसी ऐसे मंदिर पर
चढाओ जो बढ़ता जाए
और तुम घटते जाओ।
रास्ते में तुम्हारे
खाने-पीने का
इंतजाम हमारे छुट भैया
सेठों ने कर रखा है।
दारू गांजा भांग
यह सब शिव का प्रसाद है ।
इसका सेवन करो
और अपनी पीढ़ियों के
बर्बादी के सपने देखो।
धर्मांध बनो और
सदियों सदियों पशुवत
जीवन जियो।
यही तो हमने मनुस्मृति में
भी लिखा है।
और तुमने पढ़ा थोड़े है
संविधान में क्या लिखा है।
हम तुम्हें आगे भी
पढ़ने नहीं देंगे।
तुम्हारे पूर्वजों ने
जो समझ पैदा की थी
हम उस समझ को
तुम्हारे मंत्रियों से ही
बर्बाद करा कर रख देंगे।
उन्हें मंत्री बनाएंगे
और उन्हीं से तुम्हें
गुलाम बनाने की
योजना पर काम कराऐंगे।
जिससे तुम गुलामी का
आनंद ले सको धर्मांध बनकर।
जिसका तुम्हें पता भी ना चले।
- डॉ लाल रत्नाकर
Ashok Yadav

रविवार, 27 जून 2021

यह वक्त कितना निर्मम है

 


यह वक्त कितना निर्मम है
जिसका भी जितना दम है
क्रूरता में कितना कम है
अब यह कौन तय करेगा,
क़ातिल ही जब जज है।
अन्याय को समझने का
उसका नजरिया बदला है।
न्याय उसके पक्ष में हो तो
न्याय है अन्यथा अन्याय है।
यह कब तक चलेगा ?
सवाल किससे करें कौन है
जो बचे हैं वह महान व्यक्ति
से स्वयं महान हैं कौन कहे।
क्यों कहें, मत कहिए, मत,
कहने की आदत नहीं है न।
सच!
यही तो चाहता है वह जो है।
उसके मन में, उनके लिए।
उनके मन में जो भी रहा हो,
हमारे लिए कौन कहे और क्यों !
कौन तय करेगा ? वक्त ?
डॉ लाल रत्नाकर

शनिवार, 26 जून 2021

क्यों इतना बदरंग है।

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जब सब कुछ प्रतीकात्मक हो
आपको प्रतीकों की भाषा, आकार
और रंग समझ में न आता हो !
यह मानना जरा मुश्किल लगता है।
क्योंकि आप हमेशा इन प्रतीकों के पीछे
इन प्रतीकों के साथ साथ
इतने बड़े हुए हो जिसको समझने की
जन्म से आपको आदत डाली गई है
जहां तिलक, भगवा, काला और सफेद
बहुत अच्छी तरह से समझ में आता है
मुंडन और चंदन भी समझ में आता है
पत्थरों के रंगे हुए तमाम देवी देवता,
और बजरंगबली भी समझ में आते हैं।
पीपल के पेड़ में लपेटी हुई चुनरी,
भी समझ में आती है,
खेतों में गाड़ा हुआ बिजूका
तो समझ में आता है।
घरों पर लटका हुआ बजरबट्टू भी
तो समझ में आता है।
शरीर पर लिपटा हुआ धागा
तक तो समझ में आता है।
पर यह क्यों नहीं समझ में आता ?
कि उसके मीठे बोल में इतना छल है।
उसकी आंखों में जो रंग है।
क्यों इतना बदरंग है।
लंबे लंबे बालों और अपनी दाढि़यों से
वह अपना असली चेहरा छुपा रखा है।
यह क्यों समझ में नहीं आता।
चलिए समझने की कोशिश करिए।
यह मेरी रचना उसी प्रतीकात्मकता को
बयां करने की कोशिश कर रही है।
डॉ.लाल रत्नाकर
24.06.2021

सोमवार, 14 जून 2021

जन जन का

तनहाई में स्मृतियां।
और धड़कने तेज हो जाती हैं।
जब निराशा घेर लेती है।
संभावनाएं खत्म हो जाती है।
तब हमारे सौंदर्य बोध का
अंत होने का संदेश बहुत बढ़ जाता है।
जैसे ही उम्मीदें बढ़ती है।
सौंदर्य बोध ही नहीं, सोच भी।
मगर महामारी के इस दौर में
उन निराशाजनक स्थितियों का
असंतोष उस हर व्यक्ति को खींचता है।
अन्याय और अत्याचार की ओर।
डॉ लाल रत्नाकर


रविवार, 13 जून 2021

कल वह विरवे, विशाल वटवृक्ष बनेंगे।

 जो भी है उन्होंने अपने पीछे एक दुनिया छोड़ी है ! जिसकी जिम्मेदारी भी हमारे उसी सुधी समाज की है, जिससे उन्हें बहुत उम्मीद थी कि यह लोग एक दिन बदलेंगे। और हमने बदलते हुए देखा भी है। यह तस्वीर देखा तो चंद लाइने ऐसे ही कमेंट में निकल आई थी उन्हें मैं यहां भी लगा रहा हूं:

कविता की परंपरा में जीवन की सच्चाई की बात मैं यह ब्लॉग और कविता लिखते वक़्त भी किया था और आज भी उसी पर स्थिर हूँ यानी विचलित नहीं हुआ हूँ इसलिए एक स्त्री की त्रासद जीवनी का उसके परिवेश से गहरा नाता है, प्रकृति भी उसे उसी तरफ ले जाती है।

***
दो तन थे
पर जान एक थी।
दो तन थे
पर मन एक था।
स्मृतियों को
संजोए रखना।
मन को बड़ा बनाए रखना।
एहसास।
को संबल बनाए रखना।
जीवन का लक्ष्य
संघर्ष की पीड़ा में
दुख के एहसास में।
हमेशा हमेशा।
विश्वास बनाए रखना।
जीवन की यात्रा में
मनोबल बनाए रखना।
कल वह विरवे,
विशाल वटवृक्ष बनेंगे।
मन में यह एहसास
जगाए रखना।
अब तन भी एक है
मन भी एक है।
दो आंखें हैं।
दोनों हाथ है।
विशाल होने वाले दो तन हैं
जो तुम्हारे साथ हैं।
(नमन)
डा लाल रत्नाकर

शनिवार, 12 जून 2021

समझ बैठे हैं जो मसीहा !

 
जब कोई आदत बन जाए।
तो जबान पर वही बार-बार आए।
यह कौन सी नई बात है।
सारी की सारी मन की बात।
और क्या है, क्या है उसमें ?
इरादा भी नेक हो तो बात बन जाती है।
सब कुछ बर्बाद करके 
दूसरे पर थोपने से।
क्या कहीं बात बन जाती है।
यह तो होना ही था, जो हुआ।
झूठ पकड़ में आनी ही थी, सो हुयी।
समझ बैठे हैं जो मसीहा !
भक्तिभाव में,अपने आव में अपने भाव में। 

-डॉ लाल रत्नाकर 

नफरत की दुनिया मैं दौलत है हावी।

 


जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां है ?
कहां है वे झूठे, नफरती कहां है।
कहां है वह धोखे और वादे कहां हैं।
कहां है वे नोटें और नौकरियां कहां है।
जिन्हें नाज है इन पर अब वो कहां हैं।
कहां हैं वो जुमलों का बाजीगर कहां हैं।
कहां है वह शोहरत, अपनापन कहां है।
नफरत की दुनिया मैं दौलत है हावी।
कहानी है फिल्मों में जीवन से आई।

-डा लाल रत्नाकर

कौन कितने आंकड़े छुपाया है



कौन कितने आंकड़े 
छुपाया है इसकी जांच
की जानी चाहिए ?
उत्तर प्रदेश इस मामले में
कितना पवित्र है,
जिसकै लिए किस तरह का 
नाटक किया जा रहा है,
इसके पीछे उत्तर प्रदेश 
सरकार और केन्द्र सरकार के 
महामारी के आंकड़े के लोग को
लोगों की नजरों से,
कैसे गायब किये जाए ?
उसके लिए एक प्रायोजित
राजनीतिक नाटक तो नहीं
किया जा रहा है।
लोगों को भटकाने के लिए?
यह सब साजिश.......
संघ की देखरेख में
संपन्न हो रही है।
ताकि लोगों का ध्यान
हटाया जा सके।
देश की आवाम को इसी तरह
हमेशा झूठ और नफरत की
आग में ढकेल कर उसका ही 
नुकसान किया गया है।
अब देखना यह है कि
क्या आने वाले दिनों में
महामारी के साथ किए गए
सरकार के उपेक्षात्मक रवैए
जनता को याद रहते है
या जनता भूल जाती है।
धूर्तता के सपनों में ,
खो जाती है।


- डॉ लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 11 जून 2021

कहीं चर न जाएं मनुष्यता



आप बनाते रहिए
इन खंडहर नुमा आवासों को
मनुष्य के रहने लायक
जिससे कल जो आए
वह थोड़े दिन मनुष्य बन जाए
कहीं चर न जाएं मनुष्यता
क्योंकि प्रकृति में ही
बसती है मानवता।
क्योंकि वह
मानवता को त्याग कर
जिस पद को धारण किया है।
उसे मानता है ईश्वर ने दिया है
और रात दिन
करता है अपराध।
सुबह शाम ईश्वर को
नतमस्तक होकर।
अपने अपराध पर
धर्म का लेप कर लेता है
और अधर्म लेप से छुप जाता है।
डा लाल रत्नाकर

झूठ और जुमले से डँसे गए हैं।

 


कैसे हो सकता है
सबकुछ ठीक !
ठीक तो तब होता है
जब हम भीतर से ठीक होते हैं।
लूट की प्रवृत्ति से दूर होते हैं
और बोलते हैं सत्य
असत्य से दूर होते हैं।
अभी अभी तो ठगे गये हैं।
झूठ और जुमले से डँसे गए हैं।
कैसा है माहौल!
फ़िकर नहीं है जिकर नहीं है।
कैसी है यह चाल ?
कर दिया गजब का कमाल !
उड़ा लिया सारा माल !

- डॉ लाल रत्नाकर

ग़म में बहुत मुश्किल से

 


ग़म में बहुत मुश्किल से
आँसू बहा दिए !
उस समय आ गये तो क्या
मौत को झुठला दिये !
सचमुच सुना था
हैवान होते हैं।
तुम्हारी हैवानियत के
दर्शन कर लिया।
हमारे कर से बनी चीजों को
तुमने बेच दिया अपनो को
कौड़ियों के भाव।
सरकारी संपदा को।

- डॉ लाल रत्नाकर

किया वो जो बवाल है।

 


ना हमें वो ग़म है
ना हमें वो ख़्वाब है
जो संजोऐ हुए है
मन के मैले मिज़ाज में
झॉको ज़रा जनाब
अपने ही अपने आप में
यह ग़म जुदा नही करता
यह ग़मज़दा का सवाल है।
किया वो जो बवाल है।

डॉ लाल रत्नाकर

देश उतना ही हमारा है जितना तुम्हारा है

 


जिस दुख दर्द को जनता ने सहा है,
सरकारें मौन है और बहाने भी नहीं है।
जाहिलियत औ धर्म का यह घालमेल है,
विज्ञान इस समय में क्यों करके फेल है।
पाखंड और झूठ का यह घालमेल है,
तभी तो आज विज्ञान यहां फेल है।
निज दुख का कोई ठिकाना नहीं यहां,
सरकारी अस्पताल में इंतजाम है कहां।
आयुष्मान भारत ने मार डाला है,
हजारों लाखों करोड़ों में यहां,
बनियों के हाथ में जिंदगी कहां सुरक्षित
कौन-कौन अस्पताल हैं आयुष्मान में।
डिजिटल दवाइयां नहीं है सुलभ,
आत्मनिर्भर भारत के डिजिटल जहां में।
क्रूरता में करुणा का अजीब चलन है,
आपदा में अवसर के हम विश्वगुरु हैं।
वोट ले लिया फिर नोट ले लिया,
ठग तो सुने थे हमने,अब देख भी लिया।
घर घर पहुंच गया है संदेश यह न्यारा,
न्यायालयों में जाएगा कैसे कोई बिचारा।
आओ उठो एक बार इंसाफ के लिए,
झूठों के जुमले और अत्याचार के लिए।
देश उतना ही हमारा है जितना तुम्हारा है
सहना नहीं है कुछ भी अत्याचार के लिए
डॉ लाल रत्नाकर