शनिवार, 15 मई 2021

एक बार कर लेते उससे भी मन की बात !

  


दिन और रात !  
फलाने जी की बात 
किसके लिए ?
अपनी बात अपने लिए !
क्यों करते हैं अक्सर !
रेडिओ पर !
टी वी पर !
कौन सुनता है 
क्यों सुनता है 
शायद किसी दिन 
मन में आ जाए 
और पंद्रह लाख की 
अनहोनी खबर आ जाये !
मौन हैं वादे पर 
कर रहे हैं काम 
पूंजीपतियों के नाम 
राष्ट्रीय सम्पत्तियाँ !
आम आदमी से उनको 
नहीं है कोई काम 
किसान सडकों पर है 
कोरोना घर घर !
पर उनका पता नहीं है 
जो दिखते थे दिन रात !
करिये न कोरोना से  
अपने मन की बात !
और सुनिए न 
उसके मन की बात !
क्यों कर रहे हैं 
विश्वासघात !
आपको तो मिला होगा
अमेरिका में 
या बंगाल में 
बिहार में तो था 
आपके ही साथ !
इससे भी गठबंधन है 
संघ से निवंधन है
नागपुर से गठबंधन है !
कोरोना क्यों घूम रहा है !
कैसा आपका प्रबंधन है !
आपसे डरे हैं या 
डरे हैं कोरोना से !
बूढ़े बच्चे और नवजवान !
टीका (वैक्सीन) लगवायेगा 
तब कोरोना जाएगा  
कब तक टीका आएगा 
और कितने दिन रात 
कहाँ कहाँ से लोगो को 
अब तक निगल गया !
कर क्यों नहीं लेते 
आप उससे मुलाक़ात 
एक बार कर लेते 
उससे भी मन की बात !

-डॉ लाल रत्नाकर 
 

 

शुक्रवार, 14 मई 2021

विश्वगुरु कब जाओगे

 


विश्वगुरु कब जाओगे
इस देश से अपनी काबीलियत
का प्रभाव किसी और देश में
फैलाईऐ या बेच आइए।
कुछ दिन तो आपकी
अभूतपूर्व प्रतिघात का
दुष्प्रभाव
यहां की संस्थाओं से
जिससे दूर तो हो सके।
विश्वगुरु कब जाओगे।
क्या अपनी फैलाई हुई
विपदा भी साथ ले जाओगे।
जाओ विश्वगुरु जल्दी जाओ।
जिससे देश आपके अज्ञान से
निकल सके और अपने
पुराने दिनों को वापस पा सके।
अच्छे दिन के जुमले
आपदा में अवसर का स्लोगन
क्रूरता से करुणा का उत्पादन
आत्मनिर्भर भारत।
तो आपने बना ही दिया है।
हो सके तो अपने अप्रतिम
यह सब नारे भी,
अपने साथ ले जाना।
विश्व गुरु जल्दी जाओ।
ट्रंप आजकल खाली हैं।
उन्हीं को समझाओ ।
और जुमले सुनाओ
झूठ और नफरत के
बाजार भाव का बोर्ड लगाकर
नया गुण सीख करके आओ।
जाओ विश्वगुरु जल्दी जाओ।
डॉ लाल रत्नाकर

आपको झोला उठाकर के निकल लेना चाहिए।

 


नकली तो नकली होता है
असली को बहरूपिया
बनने की क्या जरूरत है।
आपके असली रूप को
बंगाल की जनता ने अच्छी तरह देखा है
अब बंगाल की नजरों से ही
पूरे देश को देखने की जरूरत है
आप की असलियत खुल गई है
अब आपको झोला उठाकर के
निकल लेना चाहिए।
आदत के अनुसार आपको
अभी और तरह से रूप बदलना होगा।
जनता को गुमराह करने के लिए
बहरूपिया तो बनना ही होगा।
अब चाहिए कि थोड़े दिनों के लिए आप
डॉक्टर वैद्य साइंटिस्ट बन जाओ
और देश में आई हुई विपदा से
किसी प्रदेश की चुनावी रैली की तरह
जम करके उसी प्रदेश में बैठ जाओ।
नकली तो नकली होता है
असली कहां से बन पाओगे ।
डॉ लाल रत्नाकर

तुम्हारी बातें याद आती है


 

तुम्हारी बातें याद आती है
उन बातों पर विश्वास नहीं होता।
हमारा कभी भरोसा नहीं था बातों पर।
झूठ बोलते हुए यह भी बोल गए थे कि
मुझे किसी चौराहे पर खड़ा करके
जितने जूते चाहो मार लेना।
यह कैसा तुम्हारा संस्कार था।
जिस पर आवाम ने विश्वास किया।
और आपने कभी चौराहों पर आने की
हिम्मत तो दिखाई होती।
हजारों लाखों गरीबों की उम्मीदों का।
और विश्वास का गला काट लिया।
फिर आपने कहा मैं चौकीदार हूं।
लेकिन आपके सामने से ही सारे।
देश लूटने वाले भाग गए।
फिर उधर से आवाज आई ।
चौकीदार चोर है ।
आप ने सीना तान के स्वीकार किया।
यह कि चौकीदार चोर है।
फिर भी जनता ने आप का भरोसा किया
उस भरोसे के पीछे किसका हाथ था
क्योंकि आपके पास ईवीएम का साथ था
ईवीएम पर बहुत अविश्वास हुआ
लेकिन उसपर विश्वास में
बदलने में आप कामयाब नहीं हूए।
इलेक्शन कमिशन में उसकी जांच।
बिना छुए हुए करने की इजाजत दी।
दुनिया में कोई बता सकता है कि।
मशीनों के दर्शन से
उसकी खूबियों का अंदाजा
क्या लगाया जा सकता है।
मशीनों को भी मूर्तियों की तरह।
दर्शन मात्र से कल्याण हो जाएगा।
ऐसा विपक्षियों से कहकर।
उनकी हकीकत से हटा दिया।
दुनिया का कोई भी वैज्ञानिक।
यह मानने को तैयार नहीं है कि।
मानव निर्मित बनाई हुई मशीनें।
मैनेज नहीं की जा सकती।
ईवीएम का कंट्रोल।
बहुत ही आसान है ऐसा तमाम।
ईवीएम के जानकारों ने बताया है।
तभी तो इसे बनाने वाला देश।
अपने यहां का चुनाव ।
इन मशीनों से नहीं कराया है।

आखिर मुंह में कालिख पोतकर।



यह नफरती मंजर किसे दिखता !
छुपाकर योद्धा जैसे लिबास में !
धर्म के आडम्बर में धनुर्धर बनकर !
औतार या यमराज था, किसको पता ?
भक्तों का सिरमौर,बणिकों का सगा।
ठग रहा था, तब कौन था जग रहा !
सो गऐ थे, अच्छे दिनों की चाह में !
लूट के सारे नियम, था वह गढ़ रहा।
कानून भी क्यों तब मौन था ?
क्या सो गया था न्याय गहरी नींद में।
जाहिल था पर था सन्त के वेश में।
झूठ, जुमले थे उसके सगल,
उसके बगल में एक शैतान था।
भक्त कहकर हो गया भगवान था।
किसको पता इतना बड़ा बेईमान है।
गढ़ दिया नफरती गुंडे धर्म के पंडाल में।
माबलिचिंग का पुजारी और व्यभिचारी भला।
झूठ का पुतला और नफरत का पुजारी।
आज इसका सच उजागर हो गया है !
राष्ट्र पूरा भयावह आपदा में घिर गया है।
त्राहिमाम कर जनता मर रही है।
मनुस्मृति का उच्चारण वह कर रहा है।
घंटी घंटा और थाली ताली बजा रहा।
आपदा में अवसर का स्लोगन दे रहा है।
मौत के मंजर में यह देश है समा रहा।
मन की बात करता तो है पर छुपाकर ।
चाल तो वह चल रहा है जाल लेकर।
हर शहर भटक रहा है, पूरी दुनिया घूमकर।
यह नफरती मंजर किसे दिखता !
बंगाल से लौटा है अभी अभी !
आखिर मुंह में कालिख पोतकर।
- डॉ लाल रत्नाकर

जुमले वाला दोषी है

  जुमले वाला दोषी है


ताली वाला दोषी है
थालीवाला दोषी है
दीया वाला दोषी है।
और सबसे बड़ा दोषी है
अस्पतालों को खत्म किया
आयुष्मान भारत के नाम पर
धोखा दिया।
आपदा में अवसर का नारा दिया
सब कुछ लूट लिया
खाली हाथ करके
आत्मनिर्भर भारत बना दिया।
समझ में आया दोषी कौन है।
और हां सबसे बड़े दोषी तो तुम हो।
तुम्हारी पत्रकार बिरादरी।
जिसको गोदी मीडिया कहा गया।
जुमले वाला दोषी है
ताली वाला दोषी है
थालीवाला दोषी है
दीया वाला दोषी है।
दोषी है,दोषी है,दोषी है।
डॉ लाल रत्नाकर

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

जिसमें बीजूका सिरमौर है

 


यह कैसा दौर है
जिसमें बीजूका सिरमौर है
सांसे बैठती जा रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट तक मौन है।
कहां है हमारा संविधान।
कहां है उसको मानने वाला इंसान।
अच्छे दिन का बहाना बनाकर।
देश को उल्लू बना कर।
कहां छुप गया है।
क्या बीजूके को उठा ले गया है।
बीजूका वोट मांग रहा है।
बीजूका आश्वासन दे रहा है।
बिजूका पूरी दुनिया में घूम रहा है।
पूरी दुनिया में बीजूके की .......!
थू थू हो रही है।
क्योंकि उसके देश में।
बीजूके से देश नहीं संभल रहा है।
जनता में हाहाकार मचा हुआ है।
सांस के लिए लाचार पड़ा हुआ है।
अस्पतालों में जगह नहीं है।
श्मसान घाट बनाने की बात कर रहा था।
बिजूका क्या जानता था
आने वाले दिनों में
श्मशान कि कमी पड़ जाएगी।
निश्चित तौर पर उसकी मंशा।
का बहुत बड़ा हिस्सा।
हैवान और श्मशान में ठहरा हुआ है।
गुजरात से लेकर देश तक।
लोगों की सांसें रूकती जा रही है।
यह कैसा दौर है
जिसमें बीजूका सिरमौर है
सांसे बैठती जा रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट तक मौन है।
कहां है हमारा संविधान।
कहां है उसको मानने वाला इंसान।
अच्छे दिन का बहाना बनाकर।
लोगों को फुसलाकर।
बिजूका वोट मांग रहा है।
देश चल नहीं रहा है।
बंगाल चलाने की कसम खा रहा है।
- डॉ लाल रत्नाकर

जब शहर शहर में एक पार्टी !

 


जब शहर शहर में
एक पार्टी !
अपने कार्यालय बनवा रही थी,
फाइव स्टार होटल जैसा।
क्या उसने एक भी अस्पताल बनवाएं
पूरे देश में शहर शहर तो छोड़िए।
शहरों के जो हॉस्पिटल थे
उनको खस्ताहाल करने के लिए।
उसने ऐसी नीतियां बनाई।
जिससे सरकारी हॉस्पिटल
अपने पूजी पतियों को बेचे जा सके
जैसे रेलवे और हवाई अड्डे
अपने पूजीपतियों को बेच दिए गए हैं।
जनता की गाढ़ी कमाई
उसके द्वारा दिए गए टैक्स
देश की राष्ट्रीय संपदा के निर्माण के लिए
उपयोग में लाए जाते हैं।
जैसे हर परिवार के श्रम से
एक सुंदर घर का निर्माण होता है
वैसे ही देश का निर्माण हरजन से होता है
जब घरों में कोई बेईमान कब्जा करता है
तब रण होता है।
जब देश का शासक निकम्मा होता है।
तो उसके खिलाफ जनआंदोलन होता है।
जन आंदोलन के लिए
जनता की भागीदारी जरूरी होती है
जब राजनीति में यह मजबूरी होती है
कि अपने परिवार को राजनीति में
राजा बनाने की परंपरा चल पड़े।
तब इसी तरह धोखेबाज और झूठे।
राजनीति को अपना हथियार बना लेते हैं
जनता को मक्कार और भक्त बना कर
दीवा स्वप्न दिखाकर जुमले सुनाकर
सत्य से बहुत दूर ले जाते हैं।
और इस तरह से काबिज हो जाते हैं
जैसे यह लोकतंत्र नहीं ?
राजतंत्र है और उनके बाप का राज रहा है।
वक्त है जनता के खड़े होने का।
लोकतंत्र के मूल्यों को आंदोलन में बदलने का।
आइए निकलिए।
नेत्रृत्व तो अपने आप निकल आएगा।
अगर बैठे हो इस उम्मीद में जो कुछ कब्जा किए हो।
वही तुम्हारा लक्ष्य है।
तो फिर तुम्हें मरने से कोई नहीं रोक सकता।
जिस तरह से तुम ने कब्जा किया है
दूसरा आएगा।
तुम्हें लतिआएगा।
और देश पर काबिज हो जाएगा।
तब तुम्हें असली गुलामी समझ में आएगी।
कश्मीर के बहाने तुमने पता नहीं क्या क्या दे दिया दुश्मन देश को।
क्या क्या छुपाओगे।
कब तक उल्लू बनाओगे।
सारा पोल खुल गया।
हाहाकार मचा हुआ है।
आयुष्मान भारत न जाने कहां गया हुआ है।
शब्दों के बाण अब काम नहीं आएंगे।
आपदा में अवसर।
क्रूरता की कला।
करुणा का बहाना।
क्या यही आत्मनिर्भर भारत है।
जहां इंसान मारा मारा फिर रहा है।
पशुओं की तरह मर रहा है।
कोरोना ने बहुत अच्छी तरह पहचाना।
लड़ो इससे।
इससे वैज्ञानिक लड़ सकता है।
इसे विज्ञान समाप्त कर सकता है।
ताली थाली घंटी रामायण और कुंभ!
जमाखोरी कालाबाजारी और दवाओं का अभाव ?
यह तुम्हारी उपलब्धि है।
इससे कब तक मूंह चुराओगे।
भाटो की तरह गीत कब तक गाओगे !
निगल रही है महामारी
बड़ी-बड़ी प्रतिभा हमारी।
मुफ्त के टीके बेच बेच कर
कब तक गाना गाओगे
मन की बात सुनाओगे।
क्या विश्व गुरु इसी तरह कहलाओगे।
बच्चा-बच्चा सुन रहा है
अपने मन में गुन रहा है।
क्या क्या उसे पढ़ओगे।
सचमुच घर बैठओगे।
कितना अपढ बनाओगे।
शूद्र दलित और स्त्री का अपमान।
यही तुम्हारी बाजीगरी है।
अब फिर से तुम इस देश को।
मध्यकाल में ले जाओगे।
मनुस्मृति को संविधान का कबर चढ़ाकर।
कितने स्मसान घाट बनाओगे।
जुमले में जुमले में निकल पड़ा है।
मन के भीतर का सच तेरे।
दाढ़ी पहनकर कैसे तुम रवींद्रनाथ बन जाओगे।
टैगोर अगर बनना है तुमको।
साड़ी पहनो चूड़ी पहनो।
चौराहों पर झाल बजाओ।
तृतीय लिंग के साथी तेरे।
साथ खड़े हो जाएंगे।
ताली खूब बजाएंगे।
आम आदमी को भरमाएंगे।
शान मटक्का मार मार कर।
सबसे माल उड़ाएंगे।
अब तुम उनके मुखिया बनकर।
असली जगह पहुंच जाओ।
विश्व गुरु का खिताब तुम्हें वह।
घर घर ले जाकर दिलवाएंगे।
आओ उतरो अब गद्दी से।
भक्त नहीं चिल्लाएंगे।
अब जनता शोर मचाएगी
धीरे धीरे फाइव स्टार महलों पर।
वह काबीज हो जाएगी।
--
डॉ लाल रत्नाकर

झांसे में डालने का ।

 


कोरोना का क्या रोना।
घर घर में पसरा है विषाणु।
किस पर कितना असर कर रहा है।
डर तो हर व्यक्ति रहा है।
बच्चे और बूढ़े स्त्रियां और नौजवान।
कैसे सुरक्षा करें ऐसे रोग से।
जिसके सहज कोई लक्षण,
नजर नहीं आते कहीं भी जरा सी भी
लापरवाही हो तो धरे जाते हैं
ऐसा रोग जिसका इलाज भी है
और लाइलाज भी है।
कोरोना का संकट।
सरकार को मौका दे दिया है
चारों तरफ से लोगों को
झांसे में डालने का ।
आपदा में अवसर का लाभ उठाने का।
संविधान को तहस-नहस कर डालने का।
संघ के अरमान पूरे करने का।
लोगों की तकदीर बदलने के बहाने।
लोगों को बर्बाद करने का।
कोरोना है या सरकारी षड्यंत्र है।
वैश्विक आपदा के नाम पर।
हर देश में गरीब को मारने का।
जैसे यह कोई मंत्र है।
सरकार के हाथ लग गया यंत्र है।
- डॉ लाल रत्नाकर

लोगों को ठगना और उल्लू बनाना

 एक प्रचारक


यदि झूठ ना बोले
जुमले ना बोले
तो कौन उसकी बात पर विश्वास करेगा
उसका तो काम ही होता है
अपना माल बेचना
ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना
लोगों को ठगना और उल्लू बनाना
यह प्रचारक आपको
बस अड्डों पर मिल जाएगा।
संघ के संगठनों में मिल जाएगा।
और आजकल तो देश के
सबसे ऊंचे पद पर मिल जाएगा।
समझ में आया और नहीं आया।
तो अपनी औलाद को एमबीए कराइए।
और बड़े-बड़े कंपनियों में।
झूठ परोसने के लिए रोजगार दिला दीजिए।
जब यहां पर नई शिक्षा आई थी।
शिक्षा को रोजगार परक बनाया जा रहा था।
और 12 वीं पास बच्चों को मैनेजर बनाया जा रहा था।
तब आपने क्या समझा था।
यह सब राष्ट्र निर्माता बनेंगे।
यह ट्रिपल क्यू वाले हैं।
जो स्टील की चीज को भी।
मिट्टी का बता कर बेच देते हैं।
आपकी जेब काटकर।
जेब सिलने का सामान
आप को पकड़ा देते हैं।
विश्व गुरु बनने का सपना।
उसने ऐसे ही थोड़े देखा है।
यह माना की नई शिक्षा नीति।
राजीव गांधी लेकर के आए थे।
ईवीएम का फैसला कांग्रेस ने किया था।
मगर जिस तरह की फौज भक्त बनी है।
उसने ऐसे ही विश्व गुरु के लिए।
अपना जीवन न्यौछावर किया है।
एक प्रचारक
यदि झूठ ना बोले
जुमले ना बोले
तो कौन उसकी बात पर विश्वास करेगा
उसका तो काम ही होता है
अपना माल बेचना
ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना
लोगों को ठगना और उल्लू बनाना
ही तो हैं।
डॉ लाल रत्नाकर

जो विश्वसनीय नहीं है।

 


जिस देश का प्रधान !
झूठे नारे गढ़ता हो
अवैज्ञानिक बातें करता हो
पाखंड को जनता पर थोपता हो।
संविधान की जगह
मनुस्मृति से चलता हो
ऐसे ही प्रधानमंत्री का
लोकतंत्र में विश्वास कितना होगा
यह विश्वसनीय नहीं है
जो विश्वसनीय नहीं है।
उसका संविधान में क्या रोल है।
संविधान हमारे लिए
बहुत सारे अधिकार देता है।
जबकि मनुस्मृति जाति वर्ग
के अनुसार व्यवस्था देती है।
आधुनिक युग में।
जब पूरी दुनिया विकास कर रही है।
हमारे देश को विनाश के गर्त में
डाल देने वाले जुमलेबाज।
जनता का गुलाम कहने वाले।
चौकीदार बनने वाले।
कान पकड़कर चौराहे पर
चार जूता मारने का वादा वाले।
ऐसे व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनने का
देश को बर्बाद करने का।
अधिकार संविधान नहीं देता।
मनुस्मृति में इस तरह का
तहस-नहस करने का।
अधिकार देता है।
जिसके अनुसार आज !
देश को बर्बाद करने का।
इतना बड़ा बीड़ा उठाया हुआ है।
चिंतामग्न जनता मौन है।
राजनीतिक दल डरे हुए हैं।
विपक्षी मरे हुए हैं।
कौन आएगा जो
इस व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का।
जनता के सामने प्रस्ताव करेगा।
मोलभाव नहीं सीधे हमला करेगा।
देश के किसानों!
देश के मजदूरों।
देश के कर्मचारियों।
देश के भ्रष्टाचारियों।
यह देश आपका है।
आइए एकजुट होकर।
आदम के हत्यारे को।
दौड़ा-दौड़ा कर उसके ।
कारनामे उजागर करते हुए।
बंगाल की खाड़ी में फेंक दीजिए।
या कश्मीर की वादियों में।
या ऐसी आबादी में।
जहां भक्त ना हो फेंक दीजिए।
वह हिसाब कर देंगे।
मौत के सौदागर का।
डॉ लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

अमीं रवींद्रनाथ टैगोर

 अमीं

रवींद्रनाथ टैगोर
नोबेल पुरस्कार विजेता
साहित्य संगीत कला के प्रणेता
की जगह और कौन लेता
मैं हूं आधुनिक भारत का।
अज्ञान और अंधकार का
चमत्कार के विज्ञान का
विनाश को विकास का
इस युग का बहुत बड़ा प्रनेता!
अज्ञान से अंधकार की ओर
मूर्खता से पाखंड की ओर
जन-जन को जुमलों से।
राष्ट्रवाद पढ़ाता।
संघ का गीत गाता।
भारत को हूं मिटाता।
नोबेल पुरस्कार की जरूरत नहीं
मैं नया पुरस्कार बनाता।
भारत विश्व गुरु बनेगा।
विश्व गुरु का गुरु मैं बनूंगा।
सबसे कठिन सवाल मेरे सामने है।
इसलिए विद्यार्थियों को हमने।
परीक्षा में सबसे पहले।
कठिन सवाल हल करने की राय दी है।
यह काम!
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने नहीं किया।
साहित्य कला संगीत का,
जितना सत्यानाश मैंने किया है!
यह काम भी उस गुरुदेव ने नहीं किया।
मैं देश को विश्व गुरु बनाने में लगा हूं।
स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालय
सब बंद करा करके।
बंगाल को बदलकर गुजरात बनाने में लगा हूं।
बंग भाषा की जगह।
भक्त भाषा लगाने में लगा हूं।
शरीर में जहां जहां से भी
सफेद बाल निकलते हैं
उन्हें बढ़ाने में लगा हूं।
आजकल बंगालियों को
भरमाने में लगा हूं।
डॉ लाल रत्नाकर
कोई चित्रण हो सकता है
Ajay Yadav, Shahid Khan और 3 अन्य लोग

सोमवार, 15 मार्च 2021

शराबी बेवड़े रात भर गलाफाडु प्रलाप कर रहे हैं

 

पूरी रात्रि भर रह रह कर जागरण के बाद प्रातः काल यह बाचक रो रहे थे ऐसे द्रवित हो रहे थे जैसे कृष्ण और राम का अंत हो रहा हो और वे दुखी हो रहे हो या उनके दुख का कारण और रहा होगा। पता नहीं लेकिन जिस तरह से दो दो तरफ से या यूं कहिए दोनों तरफ से मरी हुई आवाज में हरे कृष्णा हरे रामा का उद्घोष भाई सुनाई पड़ रहा है ऐसा लगता है कि जैसे कोई बड़ी विपत्ति आ गई हो।

 
******
अखण्ड पाखण्ड का पाठ
*****
हमारे गांव के समीप
कहीं पर अखंड पाखंड का
पाठ हो रहा है
ध्वनि विस्तारक यंत्र
के माध्यम से
आवाज कानों तक
आ रही है ।
कुछ पड़ोसियों ने
बताया की यादवों ने
नदी के किनारे
कोई मंदिर बनाया है
जिस पर यह
अखंड पाठ कराया जा रहा है।
आमतौर पर
जिस तरह से
ध्वनि विस्तारक यंत्र
बार-बार ध्यान
अपनी ओर खींच रहा है
उसमें जो कुछ
सुनाई पड़ रहा है
वह परंपरागत
प्रचलित ग्रंथों का
स-स्वर पाठ है।
हमने
अपने आसपास
लंबे समय से लोगों को
अच्छा साहित्य
पढ़ते नहीं देखा है
जिसमें
इन पाखंडों के खिलाफ
विस्तार से लिखा गया है।
ऐसा नहीं है कि
उनके पास
इस तरह का साहित्य
नहीं है और ना ही
ऐसा है कि वह
अब इन चीजों को
ढूंढ करके पढ़ ना सकें।
पर वो
महात्मा बुद्ध
रामास्वामी पेरियार
ज्योतिबा फुले सावित्रीबाई फुले
डॉ भीमराव अंबेडकर
ललई सिंह यादव
और रामस्वरूप वर्मा
के साहित्य को
पढ़ने से
इस समाज की आंखें
थोड़ा बहुत खुल सकती हैं।
परंतु इस तरफ
अभी किसी का भी
ध्यान नहीं जा रहा है
यही सबसे बड़ी
विडंबना है।
रामायण विषवृक्ष है।
और महाभारत ?
कुछ अज्ञानी
शराबी बेवड़े
रात भर गलाफाडु
प्रलाप कर रहे हैं
कुत्ते चिल्ला चिल्लाकर
उनका
प्रतिकार तो कर रहे हैं।
पर मनुष्य सोया हुआ है।
 
-डॉ. लाल रत्नाकर

पागलों की तरह चिल्ला रही होगी।

 

एक वर्ष पूर्व की घटना का पुर्नजिक्र यहां पर कर रहा हूं। होली आने वाली है और एक बार फिर से करोना कि याद दिलाने वाली है जो लोग मन के काले हैं और ऊपर से यह नाटक करने वाले हैं कि वह भीतर से बहुत खुश हैं और होली के रंगों के साथ सबको रंग रंग कर दूसरा रंग चढ़ाने वाले हैं।
*****
उनका रंग
उनके मन की कालिमां
सराबोर है
अज्ञानता के विकास के युग में
जब विकास जन्म
बेईमानी लेकर निकलता है
घूस और अपराध पर बड़ा होता है,
इस घूसखोर अपराधी को
ढूंढना कितना मुश्किल होता है
जो किसी के जीवन में
अंधकार भर के चला जाता है
अधिकार के नाम पर
अपना व्यापार करता है
और औरों को हक ढक कर
चला जाता है।
कसम गीता की
शपथ ईश्वर की
लेता है और झूठ का
वह भी ऐसे उत्सव मनाता है
खूब रंग लगाता है
अपने जीवन को झूठलाता है
पता लगाइए उसकी पीढ़ियां
जाहिल बन करके
भक्तों के रूप में
विचरण कर रही होगी
और झूठ का बड़बोलापन
और जुमले सुना रही होगी
देश बर्बाद हो रहा है
और होलिका को
आग लगा रही होगी।
आज भी होलीकाएं जल रही है,
समाज और सत्ता
दोनों उन्हें जलाने में
जश्न मनाने में मशगूल है
और विचारों से शून्य है ।
धूर्तत और झूठ को फैलाने में
कितनी मशगूल है।
कैसे निकल पाओगे
ऐसे धूर्तों के मकड़जाल से।
होली फिर आने वाली है।
यही कहानियां दोहराई जाने वाली हैं।
सत्य के पुजारी अपराध और दुराचार में माहिर।
होलिका को जला करके
मानवता को ठेंगा दिखा करके।
भंग और रंग का लेप लगाकर।
पाखंड फैलाकर सदियों से
गुलामों की तरह।
लहा लोट हो रहे होंगे।
अज्ञानता के गुमान में।
दो घूट भांग दो घूट शराब
पीकर।
होली के गीत गा रहे होंगे
जनता ढोल बजा रही होगी
सत्य से मुंह फुला रही होगी।
पागलों की तरह चिल्ला रही होगी।
बुरा न मानो होली है।
होली है भाई होली है।
 
- डॉ लाल रत्नाकर

 

चमत्कार

 


चारों तरफ हाहाकार है।
यह कैसी सरकार है।
जुमले वो कर आई थी।
जेबें काट रही है।
क्यों थूक कर चाट रही है।
भ्रष्टाचार,
महंगाई,
बेरोजगारी,
भूखमरी,
पाखंड,
अंधविश्वास,
चमत्कार
यह है कैसी सरकार!
देश बेच कर औने पौने
सब कुछ लूट रही है
गद्दी के खातिर यह सब कुछ
बेच रही है बेच रही है,
देश हमारा बेच रही है।
राष्ट्रवाद का नारा देकर
धोखा जुमला और झूठ का
कानून बनाकर लूट रही है।
यह कैसी सरकार।
 
- Dr.Lal Ratnakar

सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

हम तुम्हें सिखाएंगे। आजादी के गीत।

 

बिल तो वापस लेना पड़ेगा।
(विदेशी शासक का आतंक कैसा रहा होगा देसी शासक के आतंक से उसका अंदाजा लगाया जा सकता है निश्चित तौर पर मौजूदा समय में विचारधारा का जिस तरह से अनुपालन हो रहा है वह बहुजन समाज के नेताओं सहित समाज को भी विचार करना चाहिए कि संघ मूलतः राष्ट्र विरोधी मानसिकता का संगठन है तभी तो उसने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों का साथ दिया था!)
तुम हमारे खिलाफ!
कितने भी कड़े कानून ला दो।
हम तुम्हारे कानूनों को नहीं मानेंगे।
तुम हमारी बात मानो या ना मानो।
हम तुम्हारी बात मानेंगे।
मगर हम तुम्हारा कानून नहीं मानेंगे।
तुम्हें हमने चुना है।
तुम्हारे जुमले सुना है।
तुम्हारी लफ्फाजिया सुनी है।
तुम्हारे झूठ और नाकारा पन देखे हैं।
हम तुम्हें जानने में जरूर देर किए हैं।
लेकिन अब हम तुम्हें पहचान लिए हैं।
हम ही नहीं पूरा देश कह रहा है।
कराह रहा है अफसोस कर रहा है।
तुम्हारे निकम्मेपन से देश रो रहा है।
फिर भी तुम्हारा सम्मान कर रहा है।
अपने सम्मान को बचाओ।
काले कानून
अपने पूजीपतियों के यहां भेजवाओ।
हमें नहीं चाहिए तुम्हारा यह कानून।
हम अपने हूकुक के लिए।
अब कूच करेंगे दिल्ली को।
तुमने हमें क्या समझ रखा है।
हमने तुम्हें समझ रखा है।
पूजीपतियों का दलाल।
क्योंकि तुमने देश को गिरवी ही नहीं।
बेच दिया है औने पौने में।
देशद्रोही पूजीपतियों के हाथ।
तुम हमारा मजाक उड़ा रहे हो।
अपने काले कानूनों पर इतरा रहे हो।
हम तुम्हें घसीट कर लाएंगे।
अपने खेतों तक।
और तुम्हारे पूजीपतियों को।
पकड़ कर इन्हीं लाठियों से।
उनका स्वागत करेंगे।
और अपनी जमीनों पर उन्हें कुछ दिनों।
हल फावड़े और कुदाल के साथ।
अतिथि बनाकर काम लेंगे।
और उनके निकम्मे पन को।
हम नाप लेंगे उनकी मेहनत से।
सबका साथ सबका विकास।
का तुम्हारा नारा हमारे काम आएगा।
उन दिनों के साथ आराम फरमाएगा।
जब तुम्हारे पूंजीपति हमारे खेतों में।
घास चुन रहे होंगे।
और हम सुन रहे होंगे
तुम्हारे नफरत के गीत।
तुम हमारे खिलाफ
कितने कड़े कानून ला दो।
हमने तुम्हें बनाया है।
हम तुम्हें उतार कर जमीन पर लाएंगे।
ईवीएम की नहीं सुनेंगे।
हाथ उठाएंगे और लाठियां बरसाएंगे।
इन लाठियों से मान जाते हैं।
बहुत बड़े-बड़े सूरमा।
तुम हमारे ही नौजवानों का
डर हमें दिखाते हो।
हमारे न्यायालयों में
अपने बेईमान बैठाते हो।
हम तुम्हें सिखाएंगे।
आजादी के गीत।
आजादी के लिए लड़े हुए
सूरवीरों के संगीत।
कल आएंगे तुम्हारे तहखाने में।
ढूंढने तुम्हारे पुरखों का इतिहास।
तुम तब भी बेईमान थे।
और आज महाबेईमान हो।
कभी नहीं मानेंगे तुम्हारे काले कानून।
(किसान आंदोलन के लिए किसानों का चित्र बनाते समय मेरे मन में जो भाव रहा होगा उसी की संदर्भ को यहां पर लिख रहा हूं यह मेरा चित्र बहुत पुराना है मुझे ऐसा लगा था कि किसान मजबूर नहीं है लेकिन आज जिस तरह से किसान को मजबूर किया गया है उसके पीछे जो शक्तियां काम कर रही हैं जिस सीधे-साधे किसान ने उसके जुमलों पर बगैर गौर किए उसे चुन लिया था उसका असली रूप आज दिखाई दे रहा है तभी तो हमने इन संगठित किसानों के शक्ति का चित्रण यहां पर किया है।)
डॉ लाल रत्नाकर

 
 
 
 

सरकार का कहर जाति विशेष पर बरप रहा है।

 


जंगलराज की इंतहा है
योगी और मोदी सरकार
का कहर जाति विशेष पर
बरप रहा है।
कहां गए वह लोग जो
यादव राज यादव राज
करते हुए चिल्ला रहे थे।
कहां गई वह पत्रकारिता जो
जंगलराज कहते हुए नहीं थकती थी।
कहां गए समाज के
जागरूक लोग।
अपने को बुद्धिजीवी
कहने वाले वे लोग ।
जो इस बात से निश्चिंत हैं
कि यह मौजूदा सत्ता
देश को आगे ले जाएगी।
जहां पर सत्ता का घिनौना रूप
आए दिन दिखाई दे रहा है।
पुलिस का इस तरह का आचरण
हमारी न्यायपालिका को
नजर क्यों नहीं आ रहा है।
स्वत: संज्ञान लेकर के 
इस तरह के निरंकुश कर्मचारियों को
फांसी की सजा देने का
काम क्यों नहीं किया जा रहा है।
अगर समाज का जागरूक नागरिक
अब भी सोता रहा तो ।
निश्चित तौर पर चुन-चुन कर
वह लोगों को मारेंगे ।
और आतंकवाद का साम्राज्य
बनाने से इन्हें रोका नहीं जा सकता।
शर्मसार करती हुई घटनाएं घट रही है।
योगी और मोदी सो रहे हैं।
सज रहे हैं और झूठ बोल रहे हैं।
यह देश के शासक नहीं हो सकते।
इनमें कतई निरपेक्षता नहीं है।
राष्ट्रवाद राष्ट्रवाद करके 
राष्ट्र के लोगों को ही नष्ट कर रहे हैं।
नाम दे देंगे अपराधी था।
बहुत कुछ कहने को इनके लिए मीडिया मौजूद है।
स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का गला घोट चुकी सत्ता 
कोई ना कोई अपराध इस नीरीह व्यक्ति पर मढ़ देगी ।
 
- डॉ लाल रत्नाकर

क्या तुम सुरक्षित हो !

 लोग मारे जा रहे हैं।
मारे जाने वाले लोगों की जातियां
चिन्हित है और खास करके एक ही है।
यह सब जानबूझकर किया जा रहा है।
या स्वत: हो रहा है।
बहुत सारे लोग पाखंड के
शिकार तो हो ही रहे हैं।
कुछ पता नहीं है ?
कब किसकी बारी आ जाए।
यह कैसा आतंकवाद है।
अपराध है या अपराध से बाहर है।
निरापराधी को पकड़ कर के
बिना अपराध के मार डालना।
यह पुलिस को अधिकार।
कहां से मिल गया है।
यही तो हुआ है जो हमारे
जौनपुर के नौजवान के साथ।
कल ही तो किया है।
यह खबर आग की तरह,
फैल भी गई लोग इकट्ठा भी हो गए।
सड़क जाम हो गई।
अफरा तफरी फैल गई।
प्रशासन के हाथ पांव फूल गए।
मगर हुआ क्या?
हमारा तंत्र किस कदर?
शातिर हो गया है।
लोग मारे जा रहे हैं।
क्या तुम सुरक्षित हो !
 
- डॉ लाल रत्नाकर