यह अलग अलग समय लिखी गयी रचनाएँ जो फेसबुक से यहां ट्रांसफर नहीं की गयी हैं उन्हें एकसाथ यहां ले रहा हूँ हो सकता कोई रिपीट भी हो गयी हो उसे हटा देंगे।
वह सब समय समय पर हिंदू बनते रहते हैं।
बौद्ध बन सकते हैं?
क्रिस्चियन बन सकते हैं?
सिख बन सकते हैं?
जैन हो सकते हैं ?
लेकिन!
क्या आप***********
नीचे जो लिखा है वह बन सकते हैं?
क्या कभी आप किसी को !
हिंदू कन्वर्ट (बनते) होते सुना ?
और यदि नहीं तो?
जो नया जुमला चल रहा है?
सबको हिंदू बनाया जा रहा है?
यह कितना सही है?
क्या वास्तव में बहन जी?
हिंदू ही हैं ?
हम हजारों उनके अनुयायियों से ?
यही तो पूछते हैं ?
लेकिन वह कभी नहीं बताते ?
कि वह हिन्दू हैं या दलित हिंदू हैं ?
जबकि बाबा साहब भी !
हिंदू ही थे ?
लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म ?
क्यों स्वीकार किया था ?
क्योंकि वह हिंदू होते हुए भी !
हिंदू होने पर गर्व नहीं कर पाए !
हां हमने देखा है ?
तमाम पिछडों को हिंदू बनते हुए ।
शादी ब्याह में ?
सत्यनारायण की कथा में ?
मंदिरों में ?
या व्रत धारण करने में ?
भूत प्रेत निवारण में ?
भाग्यवाद में विश्वास करने में ?
यात्रा करने में ?
कुआं खोदने में ?
कार पर सवारी करने में ?
गृह प्रवेश में ?
उठते बैठते हुए ?
पांव छूते हुए ?
और सबसे ज्यादा तो !
मृत्युभोज में ?
हिंदू बनते देखा है ?
जिन्हें कभी वह हिंदू नहीं मानते !
हिंदू उन्हें अपने बराबर नहीं मानते।
उनके अधिकार नहीं देते।
वह सब समय समय पर हिंदू बनते रहते हैं।
क्रिस्चियन बन सकते हैं?
सिख बन सकते हैं?
जैन हो सकते हैं ?
लेकिन!
क्या आप***********
नीचे जो लिखा है वह बन सकते हैं?
क्या कभी आप किसी को !
हिंदू कन्वर्ट (बनते) होते सुना ?
और यदि नहीं तो?
जो नया जुमला चल रहा है?
सबको हिंदू बनाया जा रहा है?
यह कितना सही है?
क्या वास्तव में बहन जी?
हिंदू ही हैं ?
हम हजारों उनके अनुयायियों से ?
यही तो पूछते हैं ?
लेकिन वह कभी नहीं बताते ?
कि वह हिन्दू हैं या दलित हिंदू हैं ?
जबकि बाबा साहब भी !
हिंदू ही थे ?
लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म ?
क्यों स्वीकार किया था ?
क्योंकि वह हिंदू होते हुए भी !
हिंदू होने पर गर्व नहीं कर पाए !
हां हमने देखा है ?
तमाम पिछडों को हिंदू बनते हुए ।
शादी ब्याह में ?
सत्यनारायण की कथा में ?
मंदिरों में ?
या व्रत धारण करने में ?
भूत प्रेत निवारण में ?
भाग्यवाद में विश्वास करने में ?
यात्रा करने में ?
कुआं खोदने में ?
कार पर सवारी करने में ?
गृह प्रवेश में ?
उठते बैठते हुए ?
पांव छूते हुए ?
और सबसे ज्यादा तो !
मृत्युभोज में ?
हिंदू बनते देखा है ?
जिन्हें कभी वह हिंदू नहीं मानते !
हिंदू उन्हें अपने बराबर नहीं मानते।
उनके अधिकार नहीं देते।
वह सब समय समय पर हिंदू बनते रहते हैं।
-डा.लाल रत्नाकर
अब समाजवाद की जगह
पूंजीवादियों का देश बनाया है।
आज पूरा देश गुजरात हो गया है ?
देश का किसी प्रदेश में सिमट जाना ?
और प्रदेशों को कितना शर्मसार करता है ?
भारत का एक प्रांत गुजरात है ।
जैसे और प्रांत है, और उनकी खूबिया ?
वह सब समा गयी हैं गुजरात में।
गुजरातियों की बाढ़ आ गयी है !
और प्रदेशों के भीतर ?
यू पी बिहार बंगाल और
उन तमाम प्रदेशो में
उन तमाम प्रदेशो में
जहाँ गुजरातियों को
जाने की जरुरत नहीं थी।
गुजरात ने दिखा दिया है कि उसके नेता।
कारोबारी भी हैं और माफिया भी !
जो अपने ही महान नेताओं से
कितनी नफरत करते हैं।
सबसे पहले गांधी जी को लेते हैं।
गांधी जी के हत्यारे से !
जाने की जरुरत नहीं थी।
गुजरात ने दिखा दिया है कि उसके नेता।
कारोबारी भी हैं और माफिया भी !
जो अपने ही महान नेताओं से
कितनी नफरत करते हैं।
सबसे पहले गांधी जी को लेते हैं।
गांधी जी के हत्यारे से !
उनके क्या ताल्लुक हैं ?
यह सवाल आप सब के सामने है
और उत्तर खुद ढूढ़िये !
यह सवाल आप सब के सामने है
और उत्तर खुद ढूढ़िये !
बताने की कहाँ जरुरत है ।
इसके बाद सरदार पटेल हैं।
सरदार पटेल ने
इसके बाद सरदार पटेल हैं।
सरदार पटेल ने
संघ पर प्रतिबंध लगाया था?
यह बात तो सबको पता है।
इन्होंने पटेल के नाम पर
यह बात तो सबको पता है।
इन्होंने पटेल के नाम पर
व्यापार चलाने के लिए
उनके स्टेट्यू को वेश बनाया है।
अपनी राजनीति चमकाने के लिए।
उनके नाम को भुनाया है।
अब समाजवाद की जगह
उनके स्टेट्यू को वेश बनाया है।
अपनी राजनीति चमकाने के लिए।
उनके नाम को भुनाया है।
अब समाजवाद की जगह
पूंजीवादियों का देश बनाया है।
- डॉ लाल रत्नाकर
चोर चोरी से जाए
सीना जोरी से न जाए।
इतना बड़ा फ्रॉड
लोगों की आंखों के सामने
देश में संविधान के चलते
जिनको यह ओहदा मिला है
जरा उनको ठीक से पहचानिए
इनका धर्म क्या है
उनकी जाति क्या है
इनका कम क्या है?
सब कुछ वर्तमान के सच को खोल देता है।
यह कितने बेशर्म है
इनके कारण।
हजारों लड़कियों के साथ
क्या शुलूक किया जा रहा है
किसी से छुपा है क्या?
-डॉ लाल रत्नाकर
तानाशाह
तुम !
तानाशाह नहीं हो ,
हम नहीं मानते ?
सारे बच्चे चिल्ला रहे हैं।
दिल्ली की सड़कों पर !
जहॉ तुमने लगा रखा है?
वह देश की पुलिस नहीं है ।
तानाशाह होश में आओ।
ज्ञानेश गुप्ता को हटाओ।
सोनल पूंछ रही हैं
तुम्हारा बैच कहां है ।
मीडिया से हिसाब मांगते हो।
अमित को भगवान मानते हो।
पुलिस वालो होश में आओ।
यह पुलिस नहीं शायद गुण्डे है।
मीडिया चिल्ला रही है।
पुलिस पीट रही है बेरहमी से।
व्यवस्था फेल हो गई है।
भाजपाई गुण्डे पुलिस वर्दी में
आन्दोलनकारी चिल्ला रहे हैं।
कोई सुनने वाला नहीं है।
तुम !
तानाशाह नहीं हो ,
हम नहीं मानते ?
सारे बच्चे चिल्ला रहे हैं।
दिल्ली की सड़कों पर !
जहॉ तुमने लगा रखा है?
वह देश की पुलिस नहीं है ।
तानाशाह होश में आओ।
ज्ञानेश गुप्ता को हटाओ।
सोनल पूंछ रही हैं
तुम्हारा बैच कहां है ।
मीडिया से हिसाब मांगते हो।
अमित को भगवान मानते हो।
पुलिस वालो होश में आओ।
यह पुलिस नहीं शायद गुण्डे है।
मीडिया चिल्ला रही है।
पुलिस पीट रही है बेरहमी से।
व्यवस्था फेल हो गई है।
भाजपाई गुण्डे पुलिस वर्दी में
आन्दोलनकारी चिल्ला रहे हैं।
कोई सुनने वाला नहीं है।
-डॉ लाल रत्नाकर
दो व्यक्तियों की जोड़ी ।
मेरे बचपन में
यह बहुत ही प्रचलित
और लोकप्रिय निशान
हुआ करता था।
इसको दलित बस्तियों में
उस समय के प्रधान जी
बहुत ज्यादा पसंद करते थे।
पोलिंग स्टेशनों पर
तब इतनी सुरक्षा नहीं होती थी
और ईवीएम चलन में नहीं थी
बैलट पेपर से चुनाव होते थे
हमें याद है तब
यह बैलों की जोड़ी
नमूने के बैलट पेपर में
जगह-जगह बिखरे होते थे।
यह धीरे-धीरे बदलता गया
इसकी जगह पर।
गाय और बछड़ा आया
फिर हाथ का पंजा।
धीरे-धीरे एक उत्कर्ष
फिर ह्रास आया और
राजनीति में बदलाव आया
बदलाव की शुरुआत होने से पूर्व
नियति बदल गई ।
जो नेता हुए उनकी छवि
आज तक नहीं सुधरी ।
उन्होंने जिससे समझौता किया
उन्होंने हड़प लिया
लोकतंत्र और संविधान
खोखला कर दिया देश ।
जुमलों की तरह ।
दो व्यक्तियों की जोड़ी ।
-डॉ लाल रत्नाकर
फिर तुम्हारे प्रतीकों पर।
भरोसा कर लेंगे।
तुम्हारे प्रतीकों का अर्थ?
कितने लोग समझते हैं
यह तो नहीं पता ?
लेकिन हमें अच्छी तरह
समझ में आता है।
तुम्हारे प्रतिकों में और
तुम्हारे असली चेहरे में।
दिन और रात का फर्क है।
श्वेत और श्याम का फर्क है।
काले और सफेद का फर्क है।
फर्क है मनुष्यता का,
हैवानियत का, जलालत का
और इंसानियत का।
तुम किसी भी तरह से
इंसान नहीं हो सकते।
भगवान बनने के चक्कर में।
भगवान नहीं हो सकते।
भगवान !
भूमि गगन वायु और नीर से बनता है।
नर तो हो पर नारायण नहीं!
प्रकृति सबकी जननी है
उनकी भी जो मुंह से पैदा हुए हैं।
या जैविक रूप से पैदा नहीं हुए हैं।
एक दिन बिना पानी,
बिना अग्नि बिना वायु,
जिंदा रहकर दिखा दो।
फिर तुम्हारे प्रतीकों पर।
भरोसा कर लेंगे।
कितने लोग समझते हैं
यह तो नहीं पता ?
लेकिन हमें अच्छी तरह
समझ में आता है।
तुम्हारे प्रतिकों में और
तुम्हारे असली चेहरे में।
दिन और रात का फर्क है।
श्वेत और श्याम का फर्क है।
काले और सफेद का फर्क है।
फर्क है मनुष्यता का,
हैवानियत का, जलालत का
और इंसानियत का।
तुम किसी भी तरह से
इंसान नहीं हो सकते।
भगवान बनने के चक्कर में।
भगवान नहीं हो सकते।
भगवान !
भूमि गगन वायु और नीर से बनता है।
नर तो हो पर नारायण नहीं!
प्रकृति सबकी जननी है
उनकी भी जो मुंह से पैदा हुए हैं।
या जैविक रूप से पैदा नहीं हुए हैं।
एक दिन बिना पानी,
बिना अग्नि बिना वायु,
जिंदा रहकर दिखा दो।
फिर तुम्हारे प्रतीकों पर।
भरोसा कर लेंगे।
-डॉ लाल रत्नाकर
(5 ओक्टुबर 2026 )
यही वक़्त की हकीकत है।
हमें नहीं पता कल क्या होगा ?
शायद आपको पता हो ?
सारे परदे हटा दिए गए हैं
मर्यादा के, नैतिकता के,
संविधान और लोकतंत्र के ?
तत्कालीन व्यवस्था से
अखंड पाखण्ड में
धकेल दिया गया है मुल्क को !
उनकी पूजा हो रही है
जिन्होंने नैतिकता के,
चरित्र और शालीनता के
सारे मानदंड तोड़ दिए हैं
समाज की नज़रों में !
न्याय संगत नहीं है
उसका शासन उसका आचरण ?
कैसा है जगज़ाहिर है ।
पर आज वही पूज्यनीय है ।
क्योंकि उनके लिए ?
पर उनके लिए ही क्यों ?
जिनका वह नाश किया है !
और नाश कर रहा है !
वहीं उनके भक्त भगवान
मान रहे हैं ।
यही वक़्त की हकीकत है।
शायद यही नया भारत है !
-डॉ लाल रत्नाकर
(5 ओक्टुबर 2026 )
41026
किस किस पर
विश्वास करूँ !
युवाओं पर या
उनके आकाओं पर
कैसे विशवास करूँ ?
सचमुच उसका आचरण !
उसका व्यवहार विश्वसनीय
नहीं लगता है ?
कौन कहाँ से कितना
धूर्त देशद्रोही है ?
कैसे माप करूँ ?
वह मेरे आस्तीन में
बैठा है।
या मैं उसके जाल में
फास गया हूँ ?
यह किससे कहूं !
कैसे कहूं !
-डॉ लाल रत्नाकर
250926
अंधायुग इस समय का ?
कितना सही है यह कैसे तय होगा !
यह बात बतानी होगी आमजन को !
लेकिन कौन बताएगा ?
इस समय के महान हत्यारे के हथकंडे को !
जो कितना मज़बूत है इस लोकतंत्र में ?
जहाँ कोई सुरक्षित नहीं है ?
उसके हथकंडे से ?
लोकतंत्र के हत्यारे को कौन सजा देगा ?
-डॉ लाल रत्नाकर
शायद उन्हें इसी बात में खुशी है
कि वह आधी आबादी को
ऐसे श्याह परिवेश में धकेल दे
उनके विकास के नाम पर
जिसमें उनकी हिस्सेदारी बिल्कुल ना हो ।
क्योंकि वह जानते हैं
हजारों साल से?
उन्होंने उनकी जिंदगी को
किस हालात में रखा है।
जो नहीं जानती अपने अधिकार
उनके संवैधानिक हक।
मारने के लिए निरंतर प्रयास
करते रहते हैं।
उनके पास है इसकी किताब
जिसका नाम है मनुस्मृति।
मनुस्मृति समाज को बताता है
समाज में बटवारा कैसे किया गया है।
कौन किस तरह से पैदा हुआ है
किसको किस तरह से जीने का हक है
कौन किसके लिए पैदा हुआ है।
और उसकी हिस्सेदारी क्या है।
हमारे समाज को यह अच्छा लगता है।
लेकिन संविधान सबको
बराबर का हक देता है।
जिसके बारे में वह बिल्कुल नहीं जानती।
कि उसके दुश्मन कौन है?
बाबा साहब ने उसके अधिकारों को
संविधान में लिखा हुआ है।
इसीलिए वह संविधान को
खत्म करना चाहता है।
उसकी जगह मनुस्मृति को लाना चाहता है।
बल्कि यह कह सकते हैं कि ला भी दिया है।
भक्त जिसकी प्रशंसा करते हैं।
भक्तिनियां उसका गुणगान करती हैं।
शायद वह जानती हैं कि
कहीं वह आम औरतें
उनके साथ न खड़ी हो जाए।
जिनका बचा हुआ है अस्तित्व।
चरित्र और आचरण।
आधी आबादी के रूप में।
- डॉ लाल रत्नाकर
200926
आम और ख़ास की सोहबत न देख !
देखना है तो वक़्त की नफरत को देख!
आदमी और आदमी की फ़ितरत को देख ।
भुखमरी के दौर मे लाभार्थियों की तादाद।
रोज़गार के वादे और सरकार के इरादे !
इसको अकल की आँख से देख !
स्कूलों की बंदी और पूंजीवादी व्यवस्था!
संविधान की खूबियाँ और पाखंड की मज़बूरी ।
सरकारी लफ़्फ़ाज़ी हर जगह धोखेबाज़ी।
घरों घरों में लाभार्थी कितने हो गए हैं स्वार्थी?
फिर भी वह महान है आचरण में जो जितने बड़े बेईमान है।
कौन कह रहा है सब कुछ सामान्य है और कहां ?
किसी बस्ती में चले जाइए वहां कौन मिलेगा।
जो हर तरह से थका हारा परिस्थितियों का मारा।
वह शायद नहीं जानता संविधान के हक और हुकुक को।
जो बेईमान है और बदतमीज भी
वही बैठना चाहता है सत्य और निष्ठा के ओहदे पर।
- डॉ लाल रत्नाकर
"दिमागी नक्सल"
कहां से निकलते हैं यह शब्द?
चाहे वह करोना काल रहा हो !
आपदा में अवसर ,
करूणा में क्रूरता,
आत्म निर्भर भारत।
न लाशों की गिनती
न कोई इंतजाम
टीकाकरण और
उनकी तस्वीर।
जिसे हम ढोते रहे
और आज भी ढो रहे हैं।
उनके 5 किलो के अन्न के बैग।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।
हजारों स्कूल कालेज बंद।
विश्वविद्यालय से नफ़रत।
अज्ञानता के आनंदलोक
में मग्न ?
संघ के प्रचारक
और दिमागी नक्सल।
-डॉ लाल रत्नाकर
130926
यह चिंता कितनी वाजिब है
यही निरंतर चिंतित किए रहती है
इधर कुछ दिनों से बहुत सारी चिंताओं में :
एक प्रमुख चिंता है
आने वाले 2027 के
उत्तर प्रदेश के चुनाव की।
कुछ लोग सरकार बना रहे हैं।
जो सरकार में बैठे हुए हैं
वह अपनी सरकार बनाए रखने की
पूरी ताकत से प्रदेश में
विविध जज्बात को बढाए हुए हैं।
इधर युवराजों की फौज !
अपने लोगों को ही रौंद रही है।
मगर हमारी चिंता में युवराज नहीं है।
क्योंकि लोकतंत्र में,
युवराज नहीं हुआ करते।
लोकतंत्र में सेवक होते हैं।
सेवक के साथ साथ
जनसेवक भी कहे जा सकते हैं।
लेकिन युवराज बनाकर संविधान को धता बताना है।
लोकतंत्र की मर्यादा बचाना है।
आगामी चुनाव निष्पक्ष कराना है।
क्योंकि मध्य प्रदेश हरियाणा महाराष्ट्र बिहार और बंगाल।
बाकी के तो और राज्य हैं?
लेकिन उनके अनुभव ,
लोकतंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं ?
चुनाव आयोग और उसके क्रियाकलाप?
न्यायालय और उनकी चिंता?
रात दिन यह सवाल खड़ा करती है।
उत्तर प्रदेश का चुनाव निष्पक्ष होगा।
हो भी सकता है।
यदि योगी को हटाना होगा।
और देश को बताना होगा?
कि अभी चुनाव निष्पक्ष होते हैं।
चुनाव आयोग में बैठे ज्ञानेश।
अब वह ज्ञानेश नहीं है जिन पर।
पक्षपात का आरोप लगता है।
नाम तो मेरा भी एक ही जगह है।
पता नहीं नई लिस्ट आएगी?
तो उसमें होगा कि नहीं?
क्योंकि नाम काटने की प्रक्रिया।
प्रक्रियागत तरीके से
चक्कर काट रहा है ?
कार्यकर्ता बम बम कर रहा है।
120926
तकनीक और समाज
जिसकी सहायता से।
अदृश्य को सादृश्यमान कर दे
यह कला भी अपने आप में
आधुनिक दौर की देन है।
समाज में इसका उपयोग
बहुत तेजी से हो रहा है।
मर्यादित उपयोग ही।
असली उपयोग होता है।
मगर यह तो हतप्रभ कर रहा है।
युवराज सपोलों की तरह फैल रहा है।
सपोले युवराज हो रहे हैं।
विष के प्रभाव को कम करने के लिए
यहां विशेषज्ञ भेजे जा रहे हैं ।
राजनीतिक जहर को कम करने के लिए।
सामाजिक विद्वेश को घटाने के लिए।
12
रचना प्रक्रिया और जीवन का सच सब साथ-साथ चलते हैं।
उनके लिए भी और उनके लिए भी।
जो बहुत शातिर है और जो बहुत सज्जन है।
लेकिन एक और है जो न सज्जन है और न शातिर है।
और एक और है जो दिखते तो सज्जन है पर बहुत शातिर हैं।
और दूसरे वह भी हैं शातिर तो है पर रहते सज्जनों की तरह है।
अब इनके लिए और उनके मध्य की रचना प्रक्रिया कैसी होगी।
अगर जिंदगी यही है तो फिर मौत कैसी होगी?
मरने से पहले वह जिंदगी के हर आनंद ले लेना चाहते हैं।
जब कि उन्हीं के शास्त्रों में
नैतिकता आदर्श सत्य अहिंसा
और वर्ण व्यवस्था इत्यादि का ऐसा प्रावधान है
जो दूसरों पर तो लागू होता है लेकिन उन पर नहीं।
वह एक बार भी नहीं सोचते कि
यदि चरित्र परिवर्तन हो जाए
और एक दूसरे की जगह दूसरा आ जाए तो उन पर क्या गुजरेगी ।
गुजर जाएंगे मगर साथ क्या ले जाएंगे इस पर कोई विचार नहीं करते।
अहंकार में अंधे होकर सच से प्यार नहीं करते।
- डॉ लाल रत्नाकर
11
मेरे प्यारे देश वासियों!
देश निर्माण की जिम्मेदारी
जब हमें दे रहे थे तब क्या सोचा था
क्या मेरी सीवी देखी थी
हमारे बारे में क्या जानते थे
फिर क्यों परेशान हो
हम जिस लिए आये थे
अपना काम कर रहे हैं
कितनी इमानदारी से
इसके जवाबदेह आप नहीं हो
जवाबदेही मेरी है
शिक्षा की बात कर रहे हो
मेरी शिक्षा तो जानते हो
दिमाग की जरूरत होती है
दिमागी नक्सल
आज तक किसी के दिमाग में
क्यों नहीं आया
यह बात नेहरू जी को
गाॅधी,पटेल,अम्बेडकर को
पता थी क्या?
विश्व के गहन भ्रमण से
ढूढ़कर लाया हूॅं
घबराईए मत,बंगाल,बिहार
तक में दिमाग लगाया हूॅं
देश ऐसे ही थोड़े हथियाया हूं
आगे आगे देखते जाईए
होता है क्या?
मेरे प्यारे देश वासियों!
-डाॅ.लाल रत्नाकर



















