शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

आग और पानी : आग और पानी सी दिल की कहानी

आग और पानी दिल की कहानी 
कितनी पुरानी यादें हैं हमें गिनानी।
जो गुजारी है हम पर और उनपर।  
किसकी कहानी है कितनी बतानी 
और कितनी छुपानी अपनों से परायों से 
आज की पीढ़ी को, सीढ़ी को उठानी है 
जहाँ चाहें लगानी है वहां से हटानी है। 





हमारी पीढ़ियां उलझी है विवादों में !
उनकी नफ़रत की सीमा नहीं होती !
दिल के झटके को करीने से बचाना है 
वो शातिर है बहुत माहिर सभी को जलाने में 
नहीं मरता अभी वह तो खतरा बहुत ही है 








आग और पानी सी दिल की कहानी। 
कितनी भी पुरानी यादें गिनानी हमें हैं। 
उनकी धारा हमारी धारा से धरासाई।
 

- डॉ लाल रत्नाकर 

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

जो दौर गुजर जाते हैं ……!



जो दौर गुजर जाते हैं ……!
तब वह याद नहीं आते। 
उनकी स्मृतियों से ही ।
काम चला लेते हैं हमलोग !
उनकी स्मृतियां नहीं होती। 
क्योंकि स्मृतियाँ स्मृतियॉ होती हैं !
स्मृतियों पर ?
बहुत लंबी बहस हो सकती है।
पर स्मृतियां स्मृतियां हो तब न।
स्मृतियों को ढाल बनाकर ,
उनकी प्रतिमा लगाकर 
नहीं बनाया जा सकता !
इतिहास ?
जिनका इतिहास देशद्रोह का रहा !
बहाना नहीं बनाया जा सकता। 
स्मृतियों को समझना !
सपने की तरह ही है !
भुलाया नहीं जा सकता।
भूला जा सकता है कुछ समय के लिए ।
बहाना नहीं बनाया जा सकता ।
की इतिहास उन्हें माफ़ कर दिया है। 
क्योंकि उन्होंने उस सत्य की ह्त्या की है ?
जो दौर गुजर जाते हैं ……!
तब वह याद नहीं आते। 
उनकी स्मृतियों से ही ।
काम चला लेते हैं हमलोग !



















डॉ लाल रत्नाकर

सुनिए और भूल जाईए।


सुनिए और भूल जाईए।
वक्त गुजर जायेगा और ?
कुछ भी समझ नहीं आएगा।
वह लूटने को तैयार है 
और आप ?
बचाना भी नहीं जानते?
या बचाना ही नहीं चाहते ?

उसके पास भोथरा हथियार है।
और आप में धार भी नहीं ?
विचार भी नहीं।
कोई सरोकार है भी तो लाचार है। 
एक दूसरे की टांग खींचने में,
कामयाब हो हड़पने में लगे हो।
क्योंकि सच से डरे हो।

सच किसी की जागीर नहीं है।
सच सच है और यह नंगा करेगा।
झूठ का सम्राट बनकर !
कब तक ठगेगा वह तू कब जगेगा ढोर !



















-डा. लाल रत्नाकर

कब-तक ! ठगेगा?


कब-तक ! ठगेगा?
सवाल किससे करें!
जो ठग रहा है!
या उससे करें जो ठगा जा रहा?
कैसे करें?

अंधभक्ति में मरा जा रहा है।
पाखंड में ठगा जा रहा है।
बुद्ध की सुनता नहीं।
पेरियार को जानता नहीं है।
जोतिबा की बात नहीं मानता ।

कुकर्मो में जकड़ा है।
सुकर्म की बात करता है ।
अदृश्य से डरता है ।
पाखंड करता है ।
सत्य से डरता नहीं है। 



















-डॉ लाल रत्नाकर

विविध समाजों के बच्चे !











विविध समाजों के बच्चे !
कैसे बर्बाद हों यह योजना है !
यही मेरे संघटन का काम है।
यह जिम्मेदारी आज मेरा संगठन। 
बहुत सलीके से उठा रहा है। 

अमीरों के लिए अलग व्यवस्था। 
गरीबों के स्कूल बंद करा रहा है !
उन बंद किए हुए स्कूलों में। 
किसके बच्चे पढ़ते थे। 
इन लाभार्थियों के या और किसी के। 
अब उनकी पढ़ाई लिखाई नहीं होगी। 
उन्हें 5 किलो राशन का झुनझुना। 

और आने वाले दिनों में गुलामी की जिंदगी। 
न जाने फिर ज्योतिबा फुले आएंगे कि नहीं। 
गुलामीगिरि पर कुछ लिखेंगे कि नहीं। 
भक्त तो तुम्हें गुलाम बना कर रखेंगे।

-डॉ लॉल रत्नाकर

तुम्हारे मन में ज़हर भरा है ।















तुम्हारे मन में ज़हर भरा है ।
शहर में आकर बेचैन हैं जो ?
अश्क में उनके रश्क भरा है।
यही मनु ने हमें दिया है। 

आज तक जो उनको नहीं जानते हैं।
उनके नियमों को मानते हैं !
बाबा ने उस किताब को जला दिया था ,
जिसको हमने बचा लिया था !
उसको आज तक मानते हैं। 

बाबा ने अपनी प्रतिज्ञा में। 
क्या-क्या कहा है?
क्या पढ़े नहीं हो लिखे नहीं हो। 

कैसे जानोगे नफरत की धारा।
चलो बढ़ें और संविधान पढ़ें?
क्योंकि सबसे ज्यादा खतरा 
इसी पर बढ़ा है।
समाजवादियों का यह दौर ? 
क्या संविधान को जानता है। 
अगर जानता है तो क्यो नहीं मानता है? 
मैंने देखा है घर-घर में मनुस्मृति को पूजता है।

यह कैसा समाजवाद है अगर अब भी चुप हो।
और चुप रहे तो मरोग खुद ही !
चमत्कार अन्धविश्वास में। 
विचारधारा मरेगी पाखंड के प्रकोप से। 
अगर अब भी डरे तो। 
जल्दी मरोगे मनु की विचारधारा से।

-डॉ लाल रत्नाकर 
------
अश्क - दया
रश्क - नफ़रत

उस फेहरिस्त में किसका-किसका नाम लिखूं।



उस फेहरिस्त में 
किसका-किसका नाम लिखूं।
अवसरवादियों का? 
मददगारों का ?
गद्दारों का? 
वफादारों का?
निकम्मों का ?
सदाचारियों का ?
दुराचारियों का ?
निहत्थे गरीब का ?
चलिए शुरू करता हूं -
1
2
3
4
5
6
7
पर सात ही क्यों ?
नौ क्यों नहीं ?
यह भी कोई बात है 
आजकल सात भी नहीं है।
बाकी सब तो डरपोक है?
है तो वह अकेला ही। 
बाकी सब उसके दोस्त है। 
पता नहीं दोस्त है या दुश्मन है। 
हम तो बस एक को ही जानते हैं। 
पर उसका नाम नहीं लिखेंगे ।

-डॉ लाल रत्नाकर

चकमक चकमक जीवन का.


चकमक चकमक जीवन में
ख्वाब बहुत बुनता है वह।
दिखता है जैसा, वैसा होता नहीं।
जीवन के आदर्श नहीं है।
आदर्शों की वह हत्या ही करता है।
लूट खसोट में रहता है।
प्रचार वह पुरे समाज में ऐसा
वह करता है जिससे दीखता
लगता लेकिन संत की तरह।
जबकि रात दिन लूट खसोट में।
लूटपाट से उसका ?
जनम जनम का नाता है।
यही उसे भाता है।
सत्य अहिंसा औरों के खातिर।
अपनी तो बेईमानी है।
उसकी यही कहानी है।
बातें जानी पहचानी है।

-डॉ.लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 9 जनवरी 2026

ओ शहंशाह हम गुण्डे नहीं है ?













ओ शहंशाह 
हम गुण्डे नहीं है ?
हमें तुमसे डर नहीं लगता।
तुम हमसे क्यों डरते हो?
हम अवाम हैं ।
संवैधानिक लोकतांत्रिक मुल्क के।
हम बचपन से देश को
जन्नत की तरह प्यार करते हैं।
तुम शहंशाह हो।
और हड़प रहे हो मेरे मुल्क को।
किसके लिए?
तुम्हें मोहब्बत है अंधेरे से।
प्रकाश तुम्हें सुहाता नहीं है।
सुना है तुम्हें हर रंग भाता नहीं ।
सत्य तुम्हें सुहाता नहीं है।
इंसाफ में विश्वास नहीं है।
संस्थाएं सुदृढ़ हो।
यह तुम चाहते नहीं।
शहंशाह तुम।
शहंशाह कैसे हो।
तुम तो संविधान की शपथ लिए थे।
संविधान पर चलते नहीं हो।
क्या?
शहंशाह बनने के लिए !

-डॉ लाल रत्नाकर 

शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

उसने ! फोन करना ही बंद कर दिया।

 

उसने !
फोन करना ही बंद कर दिया। 
इससे पहले भी !
कई बार बंद किया था। 
पर फिर करने लगा था। 
उससे फोन पर जो जो ....
बातें होती हैं। 
उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता? 
बहुत सारे लोग उसकी बातें सुनकर !
होशो हवास खो देते हैं।
और उसके मुरीद हो जाते हैं।
मैंने उसे बार-बार कहा है। 
मैं एक आदमी हूं। 
और ऐसा आदमी!
जो आदमी को आदमी ही...
समझता है। 
वह बार-बार यह ?
समझाने की कोशिश करता है! 
हर आदमी ! 
आदमी नहीं होता? 
आदमी के रूप में उसके कथनानुसार !
जो जो होता है ?
उसे सार्वजनिक !
नहीं किया जा सकता!
फिर भी वह जब फोन करता है! 
जब वह फोन करता था! 
तब मुझे उसकी !
वही प्रवृत्ति स्मरण हो आती थी !
या तो यह आदमी नहीं है? 
या उस आदमी की तरह है ?
जिसे वह जो जो नाम देता है। 
या देता रहता है !
मैं छांट नहीं पाता कि ?
इस बार उसे किस वर्ग में रखूं।
फिर भी जब बात खत्म होती है। 
तो काफी राहत होती है। 
इसलिए फोन करने की सावधानी। 
के चक्कर में फोन करना ही। 
कम होता जा रहा है।
अब तो वह लोग भी फोन नहीं करते !
जो दिन में कई बार किया करते थे। 
सुबह शाम तो करते ही थे। 
कई बार उसकी बात सही लगती है। 
लेकिन अक्सर गलत लगती है। 
सबसे गलत तब लगी थी। 
जब वह नए-नए संबंध ! 
गढ़ रहा था।
और पुराने संबंधियों को? 
न जाने क्या समझ रहा था? 
काश वह अब फोन 
बंद ही रखता।
क्योंकि अब डर लगता है। 
कहीं उसका फोन फिर न आ जाए !
-डॉ लाल रत्नाकर

आतंकवाद !

 

आतंकवाद ! 
की बहस रुक गयी है क्या ?
सुनाई नहीं पड़ता अब आतंकवाद ! 
कौन है वह आतंकी या आतंकवादी ! 
कहाँ चले गए वह देश छोड़ कर ? 
उनकी पहचान धर्म, जाति, राष्ट्रवाद ! 
हुआ करती थी, जो पृष्ठभूमि में चली गई है 
और उसे डरावना बना दिया गया है !
परंतु वह छाया आम आदमी की 
स्मृति में कायम है अखण्ड पाखण्ड की तरह ! 
जिन्हें डरा दिया गया है क्यों ? 
क्या उनका इस देश के संविधान में 
इस देश की खुशहाली में 
इस देश के उद्योग धंधे में 
या सांस्कृतिक विरासत बचाने में 
अपने लिए श्रम से रोटी कमाने में 
कोई विश्वास नहीं है 
या कोई योगदान नहीं है !
क्योंकि जो अपराधी और 
सीनाजोरी से परोस रहे हैं 
ऐसा अवैज्ञानिक आतंकवाद 
ऐसा पाखण्डवाद, अन्धविश्वास 
और चमत्कार ।
पाखण्डवाद और आतंकवाद में क्या फर्क है ? 
फर्क तो समझने का विचार है ? 
जो बाबा साहब और बुद्ध का आचार है ! 
वही स्वतंत्रता का विचार हमारा संविधान। 
धर्म, जाति, मज़ हब, मानवता के खिलाफ है |
- डॉ लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

बात इतनी सी ही है, जो समझ आ जाए तो।


बात इतनी सी ही है, 
जो समझ आ जाए तो। 
तब बात बन जाएगी, 
यदि बिगड़ जाए तो! 
बात कितनी भी बड़ी हो !
यदि समझ ना आए तो।
वह तो यही चाहते हैं। 
वो जो बेईमानी कर रहे हैं।
जो हम कह रहे हैं। 
वह नहीं चाहते वह,
जो जो सच कह रहे हैं।
उनको दुश्मन लग रहे हैं।
जिनका हक मारना, 
बन गया धर्म है उनका !
बात कैसे बनेगी ?
अब तो समझ जाइए।
बात इतनी सी है ।
जो समझ आ जाए तो।
समय रहते बात बन जाये।

-डा.लाल रत्नाकर

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

जब कहीं मूर्खों की जमात इकट्ठा हो जाए तो !



जब कहीं मूर्खों की जमात
इकट्ठा हो जाए तो !
उसे एक नाम दिया जाता है!
जो सहजतयॉ स्वीकार्य ही नहीं होता॥
बल्कि उस पर वह थिरक रहे होते हैं।
क्योंकि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी
अपने पाठ्यक्रम में!
ऐसे-ऐसे कोर्स शामिल करती है !
जिसे केवल फॉरवर्ड करना होता है॥
जैसे आज कल के प्रकाशन ?
परीक्षा उत्तीर्ण करने के बुकलेट तैयार करते हैं?
मूर्खों की जमात तैयार करने के लिए !
क्योंकि अब पढ़ने की ज़रूरत नहीं रही ! 
इसलिए पढ़ने की ज़रूरत नहीं रही !
जिसे फॉरवर्ड करने से पहले पढ़ लिए जाते !
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के संदेश !
काश हमारी समझ ?
नासमझी में न बदल गयी होती !
जब कहीं मूर्खों की जमात
इकट्ठा हो जाए तो !

-डॉ लाल रत्नाकर

मेरे शुभचिंतकों एवं अशुभ चिंतकों!


मेरे शुभचिंतकों !
एवं अशुभ चिंतकों! 
मुझे नहीं पता कि 
मैं यह सवाल !
आपसे क्यों कर रहा हूं? 
क्या अब सोचना बंद कर देना चाहिए?
अच्छे बुरे का भेद भूल जाना चाहिए? 
या आंख मूंदकर 
यह मान लेना चाहिए। 
कि समाज को किसी की जरूरत नहीं है। 
पिछले दिनों मैंने कोशिश की थी! 
आज भी निरंतर कोशिश करता रहता हूं। 
एक ऐसी सोच का जो !
सांस्कृतिक समाजवादी हो !
उसका विस्तार हो। 
मैंने देखा है वह विस्तार कैसे !
विनाश की लंबी यात्रा कर चुका है। 
अब कहां है कुछ पता नहीं। 
किसके साथ है यह भी पता नहीं। 
उसकी पहचान क्या है कुछ पता नहीं। 
यदि उसके नेता होते तो ! 
क्या वह ऐसा करते?
मानवतावादी विचार को छोड़कर! 
अखंड पाखंड के जुलूस में शामिल होते? 
तो इतिहास की इस बड़ी ग़लती पर !
वह मौन रहते !
यह सवाल आपसे करते हुए। 
अपने से डरते हुए। 
जवाब चाहता हूं। 

-डॉ.लाल रत्नाकर

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

एक अदद आदमी ही बचा था


एक अदद आदमी ही बचा था 
दुकानों में सजे सामान की जगह!
बड़ी बड़ी दुकानों के सामानों में 
अब सुमार है आदमी ।
डरा हुआ आदमी चुपचाप 
बोलता हुआ आदमी, अनायास ?
नौकरी करता हुआ वह आदमी भी
जो इमानदार है, कर्मठ आदमी !
जातियों में विभाजित, धार्मिक आदमी?
व्यापारी, अधिकारी, वैज्ञानिक, नेता !
भीड़तंत्र की मंडी का व्यापारी !
बहुत डरावना है यह दौर ?
आदमी की विविधता, विशेषता, सोच 
के टैग देखकर कीमत चुकाना !
परम्परागत मूल्यों के गिरते जाना !
सब कुछ हो गया है बाज़ार के हवाले !
जो समझ नहीं आता ?

-डॉ.लाल रत्नाकर

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

अजंता एलोरा और एलिफ़ेंटा खजुराहो, ताजमहल!


अजंता एलोरा 
और एलिफ़ेंटा 
खजुराहो, ताजमहल!
सब पर बहस 
करना बाक़ी है 
अभी तो बंदेमातरम् ?
को उठाऐ हैं!
अभी आपके 
रिश्तों में आग लगाएंगे।
प्रतीकों को 
हथियार बनाकर।
आपके घर तक आएंगे।
सावधान रहिए। 
उनकी इस तरह की 
वारदातों से सावधान रहिए !
बेईमानों से ।


-डॉ लाल रत्नाकर

उन्हें मेरी शक्ति का ? शायद एहसास नहीं है।


उन्हें मेरी शक्ति का ?
शायद एहसास नहीं है।
वर्तमान समय में धारा का !
जिस तरह से परिवर्तन हो रहा है ।
उसकी उम्मीद तो नहीं थी।
वादा तो विकास का था!
नकेल विनाश की !
कैसे पकड़ में आ गई ?
यह समझना भी बहुत मुश्किल है।
पर वह है कि मानता ही नहीं!
ऐसा लगता है जैसे जानता नहीं है !
कि विकास की वह धारा !
कितनी मुश्किल से 
यहाँ तक पहुँची थी ।
जन जन के विकास से 
उसको जैसे नफरत हो !
उसको लगता है 
सब कुछ समेट कर !
दोस्तों में ही लपेटकर
वह वहाँ जाना चाहता है !
जहाँ से वापस नहीं आया जाता ?
परन्तु यह देश तो यहीं रहेगा ।
और संस्थाएं फिर से ज़िंदा होगी।
अहंकार मर जाने के बाद ।
जिसको वह लेने में लगा है।
लुटेरों के सरगना की तरह !
लूट के लिए चिल्ला रहा है !
सबका साथ सबका 
विकास बता रहा है 


-डॉ.लाल रत्नाकर

आज के समय में जिस तरह के संकट खड़े किए जा रहे हैं।


आज के समय में 
जिस तरह के संकट 
खड़े किए जा रहे हैं। 
उन्हें संकट की बजाय, 
उपकार बताया जा रहा है। 
नौकरी लेकर लाभार्थी 
बनाया जा रहा है।
लाभार्थी को तरह-तरह से 
फुसलाया जा रहा है।
संविधान मिटाने के लिए। 
निष्पक्ष चुनाव कराने की बजाय। 
उनका वोट -
₹10000 में खरीदा जा रहा है। 
चुनाव आयोग समाप्त हो जाए। 
इसके लिए चुनाव आयुक्त 
पूरी तरह से आमादा है। 
ऐसा लगता है !
जैसे सरकार का प्यादा है।
यह लड़ाई केवल धर्म की नहीं है। 
धर्म की कम जातियों की ज्यादा है। 
यह देश की मर्यादा के खिलाफ है। 
पर इसको चलाने वाले !
अपने को देशभक्त कहते हैं। 
लड़ने की ताकत नहीं है। 
पर सत्ता में बने रहते हैं।
जो लोग सत्ता में  हैं !
वह क्यों सत्ता में हैं !
उन्हें नहीं पता वह किसके साथ हैं !


-डॉ लाल रत्नाकर

वक़्त तेज़ी से बदलता है बदलते हुए वक़्त में हम भूल जाते हैं वास्तविकता जीवन की !


वक़्त तेज़ी से बदलता है 
बदलते हुए वक़्त में 
हम भूल जाते हैं 
वास्तविकता जीवन की !

जीवन को जार-जार कर रहे होते हैं 
वह ठग समाज के 
जो सफल हो गए हैं 
ठगी के मायाजाल में !
उनको लगता है जीवन के मूल्य 
श्रम में नहीं ठगी में मौजूद है।

वो नहीं जानते बसावन कौन है
उनको यह भी नहीं पता है 
कि दुखी राम कौन है !
क्योंकि वह डी आर को जानते हैं 
और जानते हैं अक़बर को 
अकबर जानते थे बसावन कौन है 
और हम जानते हैं दुखी राम कौन है!

वक़्त बहु तेज़ी से बदल रहा है 
बदलते हुए वक़्त में 
तड़ीपार शासक हो गया है 
और चाय वाला !
प्रधान सेवक !
अगर यह सच है तो 
यह बदलता हुआ वक़्त है !

जो अब तक बाबा साहब को 
नहीं मानते थे 
अब उन्हें उनकी याद आ रही है 
वो ठग जो 50 से ज़्यादा वर्षों तक!
संविधान के नियमों को 
ताक पर रखकर राज कर रहे थे !
ठगो की जमात के साथ 
मूलतः तो वह भिखारी थे ?

जो आज अपनी संपदा 
बचाने के लिए शरणागत हो गए हैं !
बदलते हुए वक़्त के साथ !
वक़्त तेज़ी से बदलता है 
बदलते हुए वक़्त में 
हम भूल जाते हैं 
वास्तविकता जीवन की !

-डॉ लाल रत्नाकर 

चित्कार से मुक्त शक्ति की खोज


चित्कार से मुक्त 
शक्ति की खोज 
प्रकृति के नियम से युक्त शक्ति!
तवाह कर देगी !
उसकी नियति और नीति। 
जो प्रकृति के विधान को। 
सत्य और असत्य के 
संकुल से छेड़छाड़ करेगा। 
यदि तुम्हें गुमान है
की, तुम शक्तिमान हो। 
तो खबरदार यह बात समझ लो। 
प्रकृति से तुम छेड़छाड़ कर रहे हो। 
यह तुम्हारी प्रकृति है !
जो तुम्हें अनाचार की। 
अत्याचार फैलाने की,
और अंदर से डरे होने की।
अनुभूति कराता रहता है।
डर इस बात का भी रहता है !
कि तुम बौखला जाते हो। 
यह संविधान का ही विधान है !
कि तुम्हारी बौखलाहट 
नजर आने लगती है। 
प्रकृति उसे बहुत सलीके से 
उजागर कर देती है। 
अन्यथा तुम्हारे मन का 
चोर बाहर नहीं आता !
बाहर आती है बार बार 
तुम्हारी चोरी। 
मैं नहीं जानता चोरी के खिलाफ। 
संविधान के कानून क्या करेंगे। 
लेकिन इतना जरुर जानता हूं। 
प्रकृति के विधान तुम्हारा !
सत्यानाश कर देंगे। 
तब तुम बौखलाकर 
अनाप-सनाप बकने लगोगे।
यही है प्रकृति का प्रकोप !
प्रकृति का विधान।


-डॉ.लाल रत्नाकर