शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

यही वक़्त की हकीकत है।

यह अलग अलग समय लिखी गयी रचनाएँ जो फेसबुक से यहां ट्रांसफर नहीं की गयी हैं उन्हें एकसाथ यहां ले रहा हूँ हो सकता कोई रिपीट भी हो गयी हो उसे हटा देंगे। 

वह सब समय समय पर हिंदू बनते रहते हैं।

आप मुस्लिम हो सकते हैं?
बौद्ध बन सकते हैं?
क्रिस्चियन बन सकते हैं?
सिख बन सकते हैं?
जैन हो सकते हैं ?
लेकिन!
क्या आप***********
नीचे जो लिखा है वह बन सकते हैं?
क्या कभी आप किसी को !
हिंदू कन्वर्ट (बनते) होते सुना ?
और यदि नहीं तो?
जो नया जुमला चल रहा है?
सबको हिंदू बनाया जा रहा है?
यह कितना सही है?
क्या वास्तव में बहन जी?
हिंदू ही हैं ?
हम हजारों उनके अनुयायियों से ?
यही तो पूछते हैं ?
लेकिन वह कभी नहीं बताते ?
कि वह हिन्दू हैं या दलित हिंदू हैं ?
जबकि बाबा साहब भी !
हिंदू ही थे ?
लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म ?
क्यों स्वीकार किया था ?
क्योंकि वह हिंदू होते हुए भी !
हिंदू होने पर गर्व नहीं कर पाए !
हां हमने देखा है ?
तमाम पिछडों को हिंदू बनते हुए ।
शादी ब्याह में ?
सत्यनारायण की कथा में ?
मंदिरों में ?
या व्रत धारण करने में ?
भूत प्रेत निवारण में ?
भाग्यवाद में विश्वास करने में ?
यात्रा करने में ?
कुआं खोदने में ?
कार पर सवारी करने में ?
गृह प्रवेश में ?
उठते बैठते हुए ?
पांव छूते हुए ?
और सबसे ज्यादा तो !
मृत्युभोज में ?
हिंदू बनते देखा है ?
जिन्हें कभी वह हिंदू नहीं मानते !
हिंदू उन्हें अपने बराबर नहीं मानते।
उनके अधिकार नहीं देते।
वह सब समय समय पर हिंदू बनते रहते हैं।

-डा.लाल रत्नाकर 


अब समाजवाद की जगह 
पूंजीवादियों का देश बनाया है। 

जिन्हें गुजरात मॉडल !
कभी अच्छा लग रहा था। 
आज पूरा देश गुजरात हो गया है ? 
देश का किसी प्रदेश में सिमट जाना ? 
और प्रदेशों को कितना शर्मसार करता है ? 
भारत का एक प्रांत गुजरात है । 
जैसे और प्रांत है, और उनकी खूबिया ?
वह सब समा गयी हैं गुजरात में। 
गुजरातियों की बाढ़ आ गयी है !
और प्रदेशों के भीतर ?
यू पी बिहार बंगाल और 
उन तमाम प्रदेशो में 
जहाँ गुजरातियों को 
जाने की जरुरत नहीं थी।  
गुजरात ने दिखा दिया है कि उसके नेता। 
कारोबारी भी हैं और माफिया भी !
जो अपने ही महान नेताओं से 
कितनी नफरत करते हैं। 
सबसे पहले गांधी जी को लेते हैं। 
गांधी जी के हत्यारे से !
उनके क्या ताल्लुक हैं ? 
यह सवाल आप सब के सामने है 
और उत्तर खुद ढूढ़िये !
बताने की कहाँ जरुरत है । 
इसके बाद सरदार पटेल हैं। 
सरदार पटेल ने 
संघ पर प्रतिबंध लगाया था? 
यह बात तो सबको पता है। 
इन्होंने पटेल के नाम पर 
व्यापार चलाने के लिए 
उनके स्टेट्यू को वेश बनाया है। 
अपनी राजनीति चमकाने के लिए।
उनके नाम को भुनाया है। 
अब समाजवाद की जगह 
पूंजीवादियों का देश बनाया है। 

- डॉ लाल रत्नाकर



चोर चोरी से जाए 
सीना जोरी से न जाए।
इतना बड़ा फ्रॉड 
लोगों की आंखों के सामने 
देश में संविधान के चलते 
जिनको यह ओहदा मिला है 
जरा उनको ठीक से पहचानिए 
इनका धर्म क्या है 
उनकी जाति क्या है 
इनका कम क्या है? 
सब कुछ वर्तमान के सच को खोल देता है। 
यह कितने बेशर्म है 
इनके कारण। 
हजारों लड़कियों के साथ 
क्या शुलूक किया जा रहा है 
किसी से छुपा है क्या?

-डॉ लाल रत्नाकर

तानाशाह 

तुम !
तानाशाह नहीं हो ,
हम नहीं मानते ?
सारे बच्चे चिल्ला रहे हैं।
दिल्ली की सड़कों पर !
जहॉ तुमने लगा रखा है?
वह देश की पुलिस नहीं है ।
तानाशाह होश में आओ।
ज्ञानेश गुप्ता को हटाओ।
सोनल पूंछ रही हैं 
तुम्हारा बैच कहां है ।
मीडिया से हिसाब मांगते हो।
अमित को भगवान मानते हो।
पुलिस वालो होश में आओ।
यह पुलिस नहीं शायद गुण्डे है।
मीडिया चिल्ला रही है।
पुलिस पीट रही है बेरहमी से।
व्यवस्था फेल हो गई है।
भाजपाई गुण्डे पुलिस वर्दी में 
आन्दोलनकारी चिल्ला रहे हैं।
कोई सुनने वाला नहीं है।

-डॉ लाल रत्नाकर


दो व्यक्तियों की जोड़ी ।

मेरे बचपन में 
यह बहुत ही प्रचलित 
और लोकप्रिय निशान 
हुआ करता था। 
इसको दलित बस्तियों में 
उस समय के प्रधान जी 
बहुत ज्यादा पसंद करते थे। 
पोलिंग स्टेशनों पर 
तब इतनी सुरक्षा नहीं होती थी 
और ईवीएम चलन में नहीं थी
बैलट पेपर से चुनाव होते थे
हमें याद है तब 
यह बैलों की जोड़ी 
नमूने के बैलट पेपर में
जगह-जगह बिखरे होते थे। 
यह धीरे-धीरे बदलता गया 
इसकी जगह पर।
गाय और बछड़ा आया 
फिर हाथ का पंजा।
धीरे-धीरे एक उत्कर्ष 
फिर ह्रास आया और 
राजनीति में बदलाव आया 
बदलाव की शुरुआत होने से पूर्व 
नियति बदल गई ।
जो नेता हुए उनकी छवि 
आज तक नहीं सुधरी ।
उन्होंने जिससे समझौता किया 
उन्होंने हड़प लिया 
लोकतंत्र और संविधान 
खोखला कर दिया देश ।
जुमलों की तरह ।
दो व्यक्तियों की जोड़ी ।

-डॉ लाल रत्नाकर 



फिर तुम्हारे प्रतीकों पर।
भरोसा कर लेंगे।

तुम्हारे प्रतीकों का अर्थ?
कितने लोग समझते हैं 
यह तो नहीं पता ?
लेकिन हमें अच्छी तरह 
समझ में आता है। 
तुम्हारे प्रतिकों में और 
तुम्हारे असली चेहरे में। 
दिन और रात का फर्क है। 
श्वेत और श्याम का फर्क है। 
काले और सफेद का फर्क है। 
फर्क है मनुष्यता का, 
हैवानियत का, जलालत का 
और इंसानियत का। 
तुम किसी भी तरह से 
इंसान नहीं हो सकते। 
भगवान बनने के चक्कर में। 
भगवान नहीं हो सकते। 
भगवान !
भूमि गगन वायु और नीर से बनता है। 
नर तो हो पर नारायण नहीं! 
प्रकृति सबकी जननी है 
उनकी भी जो मुंह से पैदा हुए हैं। 
या जैविक रूप से पैदा नहीं हुए हैं।
एक दिन बिना पानी,
बिना अग्नि बिना वायु,
जिंदा रहकर दिखा दो।
फिर तुम्हारे प्रतीकों पर।
भरोसा कर लेंगे।

-डॉ लाल रत्नाकर
(5 ओक्टुबर 2026 )


यही वक़्त की हकीकत है। 

हमें नहीं पता कल क्या होगा ?
शायद आपको पता हो ?
सारे परदे हटा दिए गए हैं 
मर्यादा के, नैतिकता के, 
संविधान और लोकतंत्र के ?
तत्कालीन व्यवस्था से 
अखंड पाखण्ड में 
धकेल दिया गया है मुल्क को !
उनकी पूजा हो रही है 
जिन्होंने नैतिकता के,
चरित्र और शालीनता के 
सारे मानदंड तोड़ दिए हैं 
समाज की नज़रों में !
न्याय संगत नहीं है 
उसका शासन उसका आचरण ?
कैसा है जगज़ाहिर है ।
पर आज वही पूज्यनीय है ।
क्योंकि उनके लिए ?
पर उनके लिए ही क्यों ?
जिनका वह नाश किया है !
और नाश कर रहा है !
वहीं उनके भक्त भगवान 
मान रहे हैं ।
यही वक़्त की हकीकत है। 
शायद यही नया भारत है !

-डॉ लाल रत्नाकर
(5 ओक्टुबर 2026 )


41026 
किस किस पर 
विश्वास करूँ !
युवाओं पर या 
उनके आकाओं पर 
कैसे विशवास करूँ ?
सचमुच उसका आचरण !
उसका व्यवहार विश्वसनीय 
नहीं लगता है ?
कौन कहाँ से कितना 
धूर्त देशद्रोही है ?
कैसे माप करूँ ?
वह मेरे आस्तीन में 
बैठा है। 
या मैं उसके जाल में 
फास गया हूँ ?
यह किससे कहूं !
कैसे कहूं !
-डॉ लाल रत्नाकर



250926 
अंधायुग इस समय का  ?
कितना सही है यह कैसे तय होगा !
यह बात बतानी होगी आमजन को !
लेकिन कौन बताएगा ?
इस समय के महान हत्यारे के हथकंडे को !
जो कितना मज़बूत है इस लोकतंत्र में ?
जहाँ कोई सुरक्षित नहीं है ?
उसके हथकंडे से ?
लोकतंत्र के हत्यारे को कौन सजा देगा ?
-डॉ लाल रत्नाकर

शायद उन्हें इसी बात में खुशी है 
कि वह आधी आबादी को 
ऐसे श्याह परिवेश में धकेल दे 
उनके विकास के नाम पर 
जिसमें उनकी हिस्सेदारी बिल्कुल ना हो ।
क्योंकि वह जानते हैं 
हजारों साल से?
उन्होंने उनकी जिंदगी को 
किस हालात में रखा है।
जो नहीं जानती अपने अधिकार 
उनके संवैधानिक हक। 
मारने के लिए निरंतर प्रयास 
करते रहते हैं। 
उनके पास है इसकी किताब 
जिसका नाम है मनुस्मृति। 
मनुस्मृति समाज को बताता है 
समाज में बटवारा कैसे किया गया है। 
कौन किस तरह से पैदा हुआ है 
किसको किस तरह से जीने का हक है 
कौन किसके लिए पैदा हुआ है। 
और उसकी हिस्सेदारी क्या है। 
हमारे समाज को यह अच्छा लगता है। 
लेकिन संविधान सबको 
बराबर का हक देता है। 
जिसके बारे में वह बिल्कुल नहीं जानती।
कि उसके दुश्मन कौन है? 
बाबा साहब ने उसके अधिकारों को 
संविधान में लिखा हुआ है। 
इसीलिए वह संविधान को 
खत्म करना चाहता है। 
उसकी जगह मनुस्मृति को लाना चाहता है। 
बल्कि यह कह सकते हैं कि ला भी दिया है।
भक्त जिसकी प्रशंसा करते हैं।
भक्तिनियां उसका गुणगान करती हैं। 
शायद वह जानती हैं कि
कहीं वह आम औरतें 
उनके साथ न खड़ी हो जाए। 
जिनका बचा हुआ है अस्तित्व। 
चरित्र और आचरण। 
आधी आबादी के रूप में।
- डॉ लाल रत्नाकर


200926 
आम और ख़ास की सोहबत न देख !
देखना है तो वक़्त की नफरत को देख!
आदमी और आदमी की फ़ितरत को देख ।
भुखमरी के दौर मे लाभार्थियों की तादाद।
रोज़गार के वादे और सरकार के इरादे !
इसको अकल की आँख से देख !
स्कूलों की बंदी और पूंजीवादी व्यवस्था!
संविधान की खूबियाँ और पाखंड की मज़बूरी ।
सरकारी लफ़्फ़ाज़ी हर जगह धोखेबाज़ी।
घरों घरों में लाभार्थी कितने हो गए हैं स्वार्थी?
फिर भी वह महान है आचरण में जो जितने बड़े बेईमान है।
कौन कह रहा है सब कुछ सामान्य है और कहां ?
किसी बस्ती में चले जाइए वहां कौन मिलेगा। 
जो हर तरह से थका हारा परिस्थितियों का मारा।
वह शायद नहीं जानता संविधान के हक और हुकुक को।
जो बेईमान है और बदतमीज भी 
वही बैठना चाहता है सत्य और निष्ठा के ओहदे पर।
- डॉ लाल रत्नाकर 

"दिमागी नक्सल"
कहां से निकलते हैं यह शब्द?
चाहे वह करोना काल रहा हो !
आपदा में अवसर ,
करूणा में क्रूरता,
आत्म निर्भर भारत।
न लाशों की गिनती 
न कोई इंतजाम 
टीकाकरण और 
उनकी तस्वीर।
जिसे हम ढोते रहे
और आज भी ढो रहे हैं।
उनके 5 किलो के अन्न के बैग।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ।
हजारों स्कूल कालेज बंद।
विश्वविद्यालय से नफ़रत।
अज्ञानता के आनंदलोक 
में मग्न ?
संघ के प्रचारक 
और दिमागी नक्सल।
-डॉ लाल रत्नाकर

130926 
यह चिंता कितनी वाजिब है 
यही निरंतर चिंतित किए रहती है 
इधर कुछ दिनों से बहुत सारी चिंताओं में :
एक प्रमुख चिंता है 
आने वाले 2027 के 
उत्तर प्रदेश के चुनाव की।
कुछ लोग सरकार बना रहे हैं। 
जो सरकार में बैठे हुए हैं 
वह अपनी सरकार बनाए रखने की 
पूरी ताकत से प्रदेश में 
विविध जज्बात को बढाए हुए हैं।
इधर युवराजों की फौज !
अपने लोगों को ही रौंद रही है।
मगर हमारी चिंता में युवराज नहीं है। 
क्योंकि लोकतंत्र में,
युवराज नहीं हुआ करते। 
लोकतंत्र में सेवक होते हैं। 
सेवक के साथ साथ 
जनसेवक भी कहे जा सकते हैं। 
लेकिन युवराज बनाकर संविधान को धता बताना है।
लोकतंत्र की मर्यादा बचाना है। 
आगामी चुनाव निष्पक्ष कराना है। 
क्योंकि मध्य प्रदेश हरियाणा महाराष्ट्र बिहार और बंगाल।
बाकी के तो और राज्य हैं? 
लेकिन उनके अनुभव ,
लोकतंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं ?
चुनाव आयोग और उसके क्रियाकलाप? 
न्यायालय और उनकी चिंता? 
रात दिन यह सवाल खड़ा करती है। 
उत्तर प्रदेश का चुनाव निष्पक्ष होगा। 
हो भी सकता है। 
यदि योगी को हटाना होगा। 
और देश को बताना होगा? 
कि अभी चुनाव निष्पक्ष होते हैं। 
चुनाव आयोग में बैठे ज्ञानेश। 
अब वह ज्ञानेश नहीं है जिन पर। 
पक्षपात का आरोप लगता है। 
नाम तो मेरा भी एक ही जगह है। 
पता नहीं नई लिस्ट आएगी? 
तो उसमें होगा कि नहीं? 
क्योंकि नाम काटने की प्रक्रिया। 
प्रक्रियागत तरीके से 
चक्कर काट रहा है ?
कार्यकर्ता बम बम कर रहा है। 

120926 

तकनीक और समाज 
जिसकी सहायता से।
अदृश्य को सादृश्यमान कर दे 
यह कला भी अपने आप में 
आधुनिक दौर की देन है।
समाज में इसका उपयोग 
बहुत तेजी से हो रहा है। 
मर्यादित उपयोग ही।
असली उपयोग होता है।
मगर यह तो हतप्रभ कर रहा है।
युवराज सपोलों की तरह फैल रहा है।
सपोले युवराज हो रहे हैं।
विष के प्रभाव को कम करने के लिए 
यहां विशेषज्ञ भेजे जा रहे हैं ।
राजनीतिक जहर को कम करने के लिए। 
सामाजिक विद्वेश को घटाने के लिए।


12 
रचना प्रक्रिया और जीवन का सच सब साथ-साथ चलते हैं।
उनके लिए भी और उनके लिए भी।
जो बहुत शातिर है और जो बहुत सज्जन है।
लेकिन एक और है जो न सज्जन है और न शातिर है।
और एक और है जो दिखते तो सज्जन है पर बहुत शातिर हैं।
और दूसरे वह भी हैं शातिर तो है पर रहते सज्जनों की तरह है।
अब इनके लिए और उनके मध्य की रचना प्रक्रिया कैसी होगी।
अगर जिंदगी यही है तो फिर मौत कैसी होगी?
मरने से पहले वह जिंदगी के हर आनंद ले लेना चाहते हैं।
जब कि उन्हीं के शास्त्रों में 
नैतिकता आदर्श सत्य अहिंसा 
और वर्ण व्यवस्था इत्यादि का ऐसा प्रावधान है
जो दूसरों पर तो लागू होता है लेकिन उन पर नहीं।
वह एक बार भी नहीं सोचते कि 
यदि चरित्र परिवर्तन हो जाए 
और एक दूसरे की जगह दूसरा आ जाए तो उन पर क्या गुजरेगी ।
गुजर जाएंगे मगर साथ क्या ले जाएंगे इस पर कोई विचार नहीं करते।
अहंकार में अंधे होकर सच से प्यार नहीं करते।

- डॉ लाल रत्नाकर 


11 
मेरे प्यारे देश वासियों!
देश निर्माण की जिम्मेदारी
जब हमें दे रहे थे तब क्या सोचा था
क्या मेरी सीवी देखी थी
हमारे बारे में क्या जानते थे
फिर क्यों परेशान हो
हम जिस लिए आये थे
अपना काम कर रहे हैं
कितनी इमानदारी से
इसके जवाबदेह आप नहीं हो
जवाबदेही मेरी है
शिक्षा की बात कर रहे हो
मेरी शिक्षा  तो जानते हो
दिमाग की जरूरत होती है
दिमागी नक्सल
आज तक किसी के दिमाग में
क्यों नहीं आया
यह बात नेहरू जी को
गाॅधी,पटेल,अम्बेडकर को
पता थी क्या?
विश्व के गहन भ्रमण से
ढूढ़कर लाया हूॅं
घबराईए मत,बंगाल,बिहार
तक में दिमाग लगाया हूॅं
देश ऐसे ही थोड़े हथियाया हूं
आगे आगे देखते जाईए
होता है क्या?
मेरे प्यारे देश वासियों!
-डाॅ.लाल रत्नाकर

जो अभिशप्त हैं अपने अपने चरम पाखंड से


 जो अभिशप्त हैं 
अपने अपने चरम पाखंड से 
अंधविश्वास और चमत्कार से। 
उनको समझना और समझाना 
बहुत मुश्किल है। 
उनको देख करके 
उनकी इच्छा का भान होता है 
जब उन्हें सुन लो 
तो उनके धर्म का ज्ञान होता है। 
साथ-साथ अज्ञानता का भी 
बेहतरीन एहसास होता है।
95% का यही हाल है ‌।
परिवर्तन का शंखनाद हो रहा है 
लेकिन वह शंख बजाने में 
मश्गूल है।
वह अभिशप्त नहीं है,
जड़ हैं चेतन से सुदूर। 
महिमा - मण्डन से भरपूर !
हाँ वह अभिशप्त हैं। 

-डा लाल रत्नाकर

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

एक विल्डर रो रहा था ?


एक विल्डर रो रहा था ?
वर्तमान राजनीती के पक्ष में !
और प्रायश्चित कर रहा था 
विपक्ष को गालियाँ देते हुए ?
वह नहीं चाहता लोकतंत्र बचा रहे  
विरोधी शक्तियों को !
सत्ता से हटाने की कोई बात करे ?
क्योंकि उसका मानना है 
मनुस्मृति से देश चलाना चाहिए !
आश्चर्य तो इस बात का 
कि उसकी संपत्ति बिक नहीं रही है 
उसकी प्रॉपर्टी में उछाल नहीं है 
क्योंकि आम आदमी की 
खरीदने की शक्ति ख़तम हो गयी है। 
फिर यह बात समझ में आती है 
कौन खरीद रहा है तस्वीरें ?
क्या आप को पता है ?
हमें पता है सब डरे हैं !
नए भारत में या नई अर्थ व्यवस्था में 
आम आदमी की जिंदगी में ?
खुशियों का रास्ता बंद किया जा रहा है। 
जैसे वोट का अधिकार ?
पता नहीं वह बिल्डर क्यों रो रहा है !

-डॉ लाल रत्नाकर 

हमें नहीं पता कल क्या होगा ?


हमें नहीं पता कल क्या होगा ?
शायद आपको पता हो ?
सारे परदे हटा दिए गए हैं 
मर्यादा के, नैतिकता के, संविधान और 
लोकतंत्र के ?
तत्कालीन व्यवस्था से 
अखंड पाखण्ड में 
धकेल दिया गया है मुल्क को !
उनकी पूजा हो रही है 
जिन्होंने नैतिकता को 
चरित्र और शालीनता के 
सारे मानदंड तोड़ दिए हैं 
समाज की नज़रों में !
न्याय सांगत नहीं है 
उसका शासन उसका आचरण ?
पर आज वही पूज्य्नीय है 
क्योंकि उनके लिए ?
पर उनके लिए क्यों ?
जिनका वह नाश किया है !
नाश कर रहा है !
यही वक़्त की हकीकत है। 
शायद यही नया भारत है !

-डॉ लाल रत्नाकर 

रविवार, 4 अक्टूबर 2026

किस किस पर विश्वास करूँ !


किस किस पर 
विश्वास करूँ !
युवाओं पर या 
उनके आकाओं पर 
कैसे विशवास करूँ ?
सचमुच उसका आचरण !
उसका व्यवहार विश्वसनीय 
नहीं लगता है ?
कौन कहाँ से कितना 
धूर्त देशद्रोही है ?
कैसे माप करूँ ?
वह मेरे आस्तीन में 
बैठा है। 
या मैं उसके जाल में 
फास गया हूँ ?
यह किससे कहूं !
कैसे कहूं !

-डॉ लाल रत्नाकर 
 

बुधवार, 30 सितंबर 2026

आइये यह विचार करें कि भविष्य की राजनीती किस करवट बैठेगी ?


आइये यह विचार करें कि 
भविष्य की राजनीती किस करवट बैठेगी ?
देश को जिस झंझवात में डाल दिया गया है 
उससे निकलना या निकालना कितना संभव है ?
यह तय नहीं हो पा रहा है वर्तमान में ?
यही भारतीय राजनीती का चक्रव्यूह है। 
यह चक्रव्यूह कौन तोड़ेगा प्रश्न यह है ?
आपके लिए, हमारे लिए और उनके लिए !
जो संविधान के साथ हैं और लोकतंत्र बचाना चाहते हैं। 
या वे जो गलतफहमी में है की वह राजा है ?
राजनीति में राजतन्त्र और लोकतंत्र का युद्ध है। 
कोई जरुरी नहीं विपक्ष सत्तापक्ष के खिलाफ हो ?
हो सकता है अपनी सत्ता के इंतज़ार में ?
बहुत सारे समझौते कर रहा हो ?
आइये यह विचार करें कि 
भविष्य की राजनीती किस करवट बैठेगी  

-डॉ लाल रत्नाकर 


सोमवार, 14 सितंबर 2026

यह चिंता कितनी वाजिब है


यह चिंता कितनी वाजिब है 
यही निरंतर चिंतित किए रहती है 
इधर कुछ दिनों से बहुत सारी चिंताओं में :
एक प्रमुख चिंता है 
आने वाले 2027 के 
उत्तर प्रदेश के चुनाव की।
कुछ लोग सरकार बना रहे हैं। 
जो सरकार में बैठे हुए हैं 
वह अपनी सरकार बनाए रखने की 
पूरी ताकत से प्रदेश में 
विविध जज्बात को बढाए हुए हैं।
इधर युवराजों की फौज !
अपने लोगों को ही रौंद रही है।
मगर हमारी चिंता में युवराज नहीं है। 
क्योंकि लोकतंत्र में युवराज नहीं हुआ करते। 
लोकतंत्र में सेवक होते हैं। 
सेवक के साथ साथ 
जनसेवक भी कहे जा सकते हैं। 
लेकिन युवराज बनाकर 
संविधान को धता बताना है।
लोकतंत्र की मर्यादा बचाना है। 
आगामी चुनाव निष्पक्ष कराना है। 
क्योंकि मध्य प्रदेश, हरियाणा 
महाराष्ट्र बिहार और बंगाल।
बाकी के तो और राज्य हैं? 
लेकिन उनके अनुभव 
लोकतंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं ?
चुनाव आयोग और उसके क्रियाकलाप ? 
न्यायालय और उनकी चिंता? 
रात दिन यह सवाल खड़ा करती है। 
उत्तर प्रदेश का चुनाव निष्पक्ष होगा। 
हो भी सकता है। 
यदि योगी को हटाना होगा। 
और देश को बताना होगा? 
कि अभी चुनाव निष्पक्ष होते हैं। 
चुनाव आयोग में बैठे ज्ञानेश। 
अब वह ज्ञानेश नहीं है जिन पर। 
पक्षपात का आरोप लगता है। 
नाम तो मेरा भी एक ही जगह है। 
पता नहीं नई लिस्ट आएगी? 
तो उसमें होगा कि नहीं? 
क्योंकि नाम काटने की प्रक्रिया। 
प्रक्रियागत तरीके से 
चक्कर काट रहा है ?
कार्यकर्ता बम बम कर रहा है।

-डाॅ.लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

मेरे प्यारे देश वासियों!


मेरे प्यारे देश वासियों!

देश निर्माण की जिम्मेदारी
जब हमें दे रहे थे तब क्या सोचा था
क्या मेरी सीवी देखी थी
हमारे बारे में क्या जानते थे
फिर क्यों परेशान हो
हम जिस लिए आये थे
अपना काम कर रहे हैं
कितनी इमानदारी से
इसके जवाबदेह आप नहीं हो
जवाबदेही मेरी है
शिक्षा की बात कर रहे हो
मेरी शिक्षा  तो जानते हो
दिमाग की जरूरत होती है
दिमागी नक्सल
आज तक किसी के दिमाग में
क्यों नहीं आया
यह बात नेहरू जी को
गाॅधी,पटेल,अम्बेडकर को
पता थी क्या?
विश्व के गहन भ्रमण से
ढूढ़कर लाया हूॅं
घबराईए मत,बंगाल,बिहार
तक में दिमाग लगाया हूॅं
देश ऐसे ही थोड़े हथियाया हूं
आगे आगे देखते जाईए
होता है क्या?
मेरे प्यारे देश वासियों!

-डाॅ.लाल रत्नाकर

गुरुवार, 3 सितंबर 2026

जन्नत दे दूँ क्या ?




जन्नत दे दूँ क्या ?
समझते क्यों नही हो ।
जन्नत और मन्नत भ्रम है ।
श्रम से हासिल जितना है ?
बेईमान की बेईमान की !
मिशाल मत देना ?
जानते हो राजनीति में,
इमानदारी चली गई है,
भ्रमण करने जंगल में है।
शहर में बसोगे ?
यह ख़याल तो आता है।
पर शहरी बन पायेंगे ?
जन्नत यहॉ नहीं है।
मन्नत जैसी भी हो ?
पर बेईमानी से नहीं ?
जिसे धर्म कह रहे हो ।
अधर्म धर्म तो नहीं हो जाता ?
तुम्हारे लिये !

-डॉ लाल रत्नाकर

सब कुछ ठीक नहीं है ।



सब कुछ ठीक नहीं है ।
क्यों ? क्योंकि आज,
अंधसंस्कृति का बोल-बाला है !
जिसका मन काला है ।
सीना चौड़ा है पर दिलविहिन है।
हड़पने की नीति मे निपुण है।
देश लोक कृषि सम्पदा ।
जो बेच रहा है ।
उसका निर्माण जिसने किया ?
गाली दे रहे है और हड़प रहे है।
सब कुछ ठीक नही है।
बल्कि कुछ भी ठीक नहीं है।

-डॉ.लाल रत्नाकर 

बुधवार, 19 अगस्त 2026

एक झूठे आख्यान को


एक झूठे आख्यान को 
सुनते सुनते दिल भर गया है 
हर बार वह वही सुनाता है।
कभी इसके बहाने से। 
कभी उसके बहाने से? 
किसको किसको वह
गालियां दे जाता है ।
लोग बहुत प्रेम से सुनते हैं। 
कुछ लोग तो तालियां भी बजाते हैं। 
जो लोग तालियां बजाते हैं। 
वह जानते हैं कि वह इमानदारी से
संविधान के खिलाफ अड़ा है 
और मनु के पक्ष में खड़ा है।
मनु हमारे समाज को छिन्न भिन्न 
करके खंड-खंड कर रखा है। 
आज से नहीं हजारों साल से। 
जिसे अंबेडकर ने चुनौती दी थी 
और हमारा संविधान ।
उसी बाबा की सोच का कवच है।
जिसे वह समाप्त करने की 
हमेशा बात करता है।
संविधान की कसम खाकर। 
उसी झूठे आख्यान को।
वह बार-बार सुनाता है।

-डॉ लाल रत्नाकर 

रविवार, 9 अगस्त 2026

परिसीमन क्यों?

 
(1)
परिसीमन क्यों?
देश में जितने सांसद हैं
उनकी भूमिका क्या है?
कोई लेखा जोखा है ?
यह देश पर बोझ हैं ?
और बोझ क्यों ?
इसका विरोध जनता को
करना होगा ?
कितने सांसदों को 
क्यों बर्दास्त करना होगा ?
क्या आप जानते हैं,
ऐसे किसी सांसद को 
जिनका देश के लिए या 
समाज के लिए कोई योगदान हो  ?
उनके योगदान को बताएं ?
कृपया इसपर विचार करें  ?
कितने तो पागलों को !
सदनों में भेज दिया गया है ?
क्योंकि उनके पिता या आका ?
ऐसा चाहते हैं।  
यह कब तक चलेगा 
और यदि यही चला तो !
यह देश नहीं रहेगा। 
देश बचाना है तो सबको 
मिलकर खड़ा होना होगा !
(2)
अब आइये !
जाती जनगणना की बात करें !
क्या यह सही सही की जानी है ?
इसमें गङबङ किया जा रहा है ?
कैसे आपको पता चलेगा ?
पिछली जाती जनगणना ?
जो जाती जनगणना ही नहीं थी ?
इन्होने ही कहा था हम उसे जारी करेंगे ?
क्या हुआ ?
आगे कहीं ऐसा ही न हो जाए ?

-ताकि सनद रहे ?

- डॉ लाल रत्नाकर 

मंगलवार, 14 जुलाई 2026

मैं नहीं कहता उसको टिकट मत दो ।

 


मैं नहीं कहता उसको टिकट मत दो ।
मैं केवल इतना कहूँगा कि यह?
हमारे जनप्रतिनिधि के लायक़ नहीं है ।
यह पूरे क्षेत्र को बर्वाद कर रहा है ।
यह क्षेत्र विकास के रास्ते से भटक गया है ।
मगर इसमें कौन सी खूबियाँ दिखाई देती हैं ।
यह बात हमारी समझ नहीं आती ।
जिसको आप समझ रहे हैं या देख रहे हैं ।
हो सकता है आप मेरी बात न माने ।
मगर मैं यह जानता हूँ परिणाम आने पर 
शायद यह कहें की उसकी जगह 
किसी और को लड़ाया होता तो जीत जाता ?
ऐसा इसलिए होता है कि उसकी बुराईयां 
समय से नज़र नहीं आती ॥
मैं कह रहा हूं ऐसा चयन जनता को आश्वस्त नहीं करेगा ॥
जनता की हताशा बहुत खतरनाक होती है।
शायद यह भ्रम कहीं घर कर गया है।
कि यह वक्त अब भले लोगों का नहीं रहा ?

- डॉ लाल रत्नाकर

मेरी आने वाली इस किताब में उसका ज़िक्र जरूर होगा :


मेरी आने वाली इस किताब में
उसका जिक्र जरूर होगा .
जो बदतमीज, घमण्डी,अनुभवहीन 
और बदतमीज क्यों है?
इसका मूलभूत कारण परिवारवाद है !
वह परिवार कोई भी हो सकता है !
व्यापारी का परिवार हो !
पुजारी का परिवार हो !
दुराचारी का परिवार हो !
चोर का परिवार हो !
डकैत का परिवार हो !
गद्दारी वही होती है जहां 
नासमझ और मक्कारी होती है !
उनकी मुफ्तखोरी होती है !
जिनकी जिम्मेदारी नहीं होती !
विचारधारा कोई भी हो !

-डा.लाल रत्नाकर

मौन की शक्ति बहुत तगड़ी है।


मौन की शक्ति बहुत 
तगड़ी है।
जो अपने को कहते हैं कि,
वह समझ में अगड़े हैं।
वह विचारों में बहुत पिछड़े हैं। 
मौन रहने का यह मतलब नहीं होता। 
कि हम सच से वाकिफ नहीं है। 
मगर इतनी पेचों में जकड़े हैं।
न जाने क्यों इतने
अकड़े हैं।
हो सकता है कोई नया 
राह खोज रहे हों !
जब कानून कानून की तरह 
काम नहीं करता
तब तब अवाम कानून ख़रीदती है।

- डॉ लाल रत्नाकर 

पहले इंसान फिर ज्ञान !

 


पहले इंसान
फिर ज्ञान !
फिर रोज़गार 
राजनीति 
समाजवाद
जनकल्याण 
मुक़ाबला
बेईमानों से
संगत 
ईमानदार से
हौसला 
सच कहने का 
काले को 
मुँह पर काला कहना
धर्म को धर्म की तरह मानना
अधर्म के ख़िलाफ़ खणा होना
अखंड पाखंड अंधविश्वास
को समझना और समझाना
जब आपका वसूल बन जाए
तब राजनीति में आना
और संविधान लोकतंत्र
सामाजिक न्याय
पर बात करना।
अंदर से पाखंडी 
स्वभाव से घमंडी 
कैसी राजनीति करोगे
पार्टनर।

- डॉ लाल रत्नाकर

असभ्यता का दौर चल रहा है।

 

असभ्यता का दौर चल रहा है। 
असभ्यता सभ्यता पर भारी है। 
असभ्यता को कौन कौन
शक्ति दे रहे हैं। 
उनकी सूची बहुत बड़ी है। 
आपका नाम उसमें है कि नहीं है। 
यह मैं नहीं बता सकता। 
लेकिन मेरा नाम उसमें नहीं है !
यह मैं जानता हूं। 
असभ्यता से मुकाबला करना।
सभ्यता की जिम्मेदारी है। 
धर्म और अधर्म की
पूंजीवाद की समाजवादी
संस्कृति में जगह कहाँ है।
सभ्यता में असभ्यता की ।
खोज करने की !
किसकी जिम्मेदारी है। 
लड़ने चले हैं गद्दारों से गद्दार।
गद्दारों की कैसी मारामारी है। 
यह किसके प्रति वफादार हैं।
यह पता करना आसान नहीं है।
यही तो नक़ली वफादारी है। 
विचारधारा के प्रति गद्दारी है !
हौसलें टूट जाते है वफादारों के !
गद्दारों की पहचान भारी है!

-डॉ लाल रत्नाकर 

सोमवार, 6 जुलाई 2026

कौन समझ रहा है उनका सच जो जहर है

गांधी स्मृति में संघ का आदमी बैठाया गया है .
-----------------------------


कौन समझ रहा है 
उनका सच जो जहर है 
जिसे वह पी रहा है 
मगर मर नहीं रहा है 
लोगों को मार रहा है 
जहरीले आचरण से।
हजारों साल की विरासत को ।
बाट रहा है साझी
संपदा को।
उसे शर्म नहीं आती!
वह जहर समेटे है।
पूरे आचरण में।
वह नहीं जानता?
विरासत क्या है।
उसकी विरासत चरित्रहीनता का है।
कौन नहीं जानता।
यह भी एक वैज्ञानिक 
विश्लेषण है।
इसलिए मर नहीं रहा है।

-डॉ लाल रत्नाकर 

गुरुवार, 18 जून 2026

फ़ॉर्मूले पुराने हैं !


धंधे में जो अंधा है
वह कौन बहादुर बंदा है
आओ उसके बारे में
चर्चा और परिचर्चा करें ।
डरो नहीं मरो नहीं, 
ज़िंदा रहकर लड़ो नहीं !
गफलत में तुम पड़ो नहीं,
बेईमानी की राह पर चलते रहो 
राह बदलने को हम नहीं कह रहे
चलते रहो, चलते रहो !
कहॉ तक चलोगे !
जब ऊपर चले जाओगे !
सब यहीं पर रह जाएगा।
तुम्हें कोई याद भी नहीं करेगा !
क्योंकि याद के लिए!
फ़ॉर्मूले पुराने हैं !
चरित्र
ईमानदारी 
कर्तव्य परायणता 
निष्ठा
सत्य!
शांति, 
सहयोग और 
मानवीय सहायता  
मनुष्यता 
का सम्मान करता है।
बेईमानी की राह पर चलते रहो 
राह बदलने को हम नहीं कह रहे
चलते रहो, चलते रहो !
कहॉ तक चलोगे !
-डॉ. लाल रत्नाकर 

मंगलवार, 9 जून 2026

किसने तोड़ा उस तार को ढूढ़िये ज़रा ? औरतों ने ?


किसने तोड़ा उस तार को ढूढ़िये ज़रा ?
औरतों ने  या उनके बहाने तुम्हारी चालाकी ने 
केवल तुम किरदार थे उस परिवार के 
जिसे गढ़ा था त्याग और तपस्या से उस संत ने 
जिसने हमारे लिए सपने बुने थे सदाचार के 
आदर्श और ज्ञान के, गौरवशाली अभिमान के 
जिसे उसने निगल लिया सुरा के गिलास में 
और निर्वासित कर दिया उस युवा को 
जिससे उसको डर था वह खड़ा हो जाएगा 
उसके सामने,मैं देख रहा था उसकी शातिर 
नियति और चालबाजियां, पर लाचार था !
उसके कुकर्मों से मर्यादा बचाये रहने में !
भविष्य को गढ़ने में और अपने गहनों में। 
अंधा समाज मौन था यह कहने में शातिर !
कौन था ?

-डॉ. लाल रत्नाकर