मंगलवार, 9 जून 2026

जो सपने बुने थे आज साकार हो रहे हैं


जो सपने बुने थे आज साकार हो रहे हैं। 
हमें बनवास मिला था जो बाज़ार हो रहा हैं। 

दिन के खूबसूरत लमहे और रात की वीरानगी 
बाज़ार की आहट बेरोजगार की कड़वाहट। 

धोखेबाज़ों की तिज़ारत और हमारी ईमानदारी 
बेचारगी की हालत और परिवारों की जलालत 

समाजों की टूट और परम्पराओं की लूट 
जो खोखला कर चुकी है रवायतों का रसूख। 

भरोसे का भरोसा देकर धोखेबाज़ी के कारनामें 
नज़रों में ही नहीं नज़ारों में तब्दील हो गए है। 

जहाँ प्यार मोहब्बत का सरोकार होना था 
वहां सम्बन्ध उधार के व्यापार हो गए हैं। 

-डॉ लाल रत्नाकर 

कोई टिप्पणी नहीं: