जन्नत दे दूँ क्या ?
समझते क्यों नही हो ।
जन्नत और मन्नत भ्रम है ।
श्रम से हासिल जितना है ?
बेईमान की बेईमान की !
मिशाल मत देना ?
जानते हो राजनीति में,
इमानदारी चली गई है,
भ्रमण करने जंगल में है।
शहर में बसोगे ?
यह ख़याल तो आता है।
पर शहरी बन पायेंगे ?
जन्नत यहॉ नहीं है।
मन्नत जैसी भी हो ?
पर बेईमानी से नहीं ?
जिसे धर्म कह रहे हो ।
अधर्म धर्म तो नहीं हो जाता ?
तुम्हारे लिये !
-डॉ लाल रत्नाकर

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