असभ्यता का दौर चल रहा है।
असभ्यता सभ्यता पर भारी है।
असभ्यता को कौन कौन
शक्ति दे रहे हैं।
उनकी सूची बहुत बड़ी है।
आपका नाम उसमें है कि नहीं है।
यह मैं नहीं बता सकता।
लेकिन मेरा नाम उसमें नहीं है !
यह मैं जानता हूं।
असभ्यता से मुकाबला करना।
सभ्यता की जिम्मेदारी है।
धर्म और अधर्म की
पूंजीवाद की समाजवादी
संस्कृति में जगह कहाँ है।
सभ्यता में असभ्यता की ।
खोज करने की !
किसकी जिम्मेदारी है।
लड़ने चले हैं गद्दारों से गद्दार।
गद्दारों की कैसी मारामारी है।
यह किसके प्रति वफादार हैं।
यह पता करना आसान नहीं है।
यही तो नक़ली वफादारी है।
विचारधारा के प्रति गद्दारी है !
हौसलें टूट जाते है वफादारों के !
गद्दारों की पहचान भारी है!
-डॉ लाल रत्नाकर

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