वह समझ में अगड़े हैं।
वह विचारों में बहुत पिछड़े हैं।
मौन रहने का यह मतलब नहीं होता।
कि हम सच से वाकिफ नहीं है।
मगर इतनी पेचों में जकड़े हैं।
न जाने क्यों इतने
अकड़े हैं।
हो सकता है कोई नया
राह खोज रहे हों !
जब कानून कानून की तरह
वह विचारों में बहुत पिछड़े हैं।
मौन रहने का यह मतलब नहीं होता।
कि हम सच से वाकिफ नहीं है।
मगर इतनी पेचों में जकड़े हैं।
न जाने क्यों इतने
अकड़े हैं।
हो सकता है कोई नया
राह खोज रहे हों !
जब कानून कानून की तरह
काम नहीं करता
तब तब अवाम कानून ख़रीदती है।
तब तब अवाम कानून ख़रीदती है।
- डॉ लाल रत्नाकर

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