संकट के कारण। अकारण नहीं है। यह संकट प्रायोजित है। जानबूझकर। देश की परिस्थितियों को। इस तरह का । तैयार कर दिया गया है जिसमें । आमजन उलझा हुआ है। और जिस तरह की मौजूदा राजनीति हो रही है। वह ना ही संवैधानिक है। और ना ही लोकतांत्रिक। जिसे जनता को। जुमला से जुमलेबाजी से। लपेट करके धर्म के नाम पर। हजारों साल बाद फिर से परोसा जा रहा है। जिससे वह सदियों सदियों तक। गुलाम बनी रहे। और पाखंड सर पर चढ़कर। चमत्कार और अंधविश्वास का। तांडव करता रहे। और वह इसी तांडव में। तन्मय होकर। निरंतर आत्ममुग्ध। भक्त बन कर के। गोते लगाता रहे। और वह माल खाता रहे। अपनों को खिलाता रहे। -डॉ लाल रत्नाकर
सोमवार, 29 जून 2020
अकारण नहीं है।
संकट के कारण। अकारण नहीं है। यह संकट प्रायोजित है। जानबूझकर। देश की परिस्थितियों को। इस तरह का । तैयार कर दिया गया है जिसमें । आमजन उलझा हुआ है। और जिस तरह की मौजूदा राजनीति हो रही है। वह ना ही संवैधानिक है। और ना ही लोकतांत्रिक। जिसे जनता को। जुमला से जुमलेबाजी से। लपेट करके धर्म के नाम पर। हजारों साल बाद फिर से परोसा जा रहा है। जिससे वह सदियों सदियों तक। गुलाम बनी रहे। और पाखंड सर पर चढ़कर। चमत्कार और अंधविश्वास का। तांडव करता रहे। और वह इसी तांडव में। तन्मय होकर। निरंतर आत्ममुग्ध। भक्त बन कर के। गोते लगाता रहे। और वह माल खाता रहे। अपनों को खिलाता रहे। -डॉ लाल रत्नाकर
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें