रविवार, 8 अप्रैल 2018

धूम धाम से ..........


जब तुम आये थे धूम धाम से !
हमने भी सोचा था कुछ बात तो होगी !
और तुम धूम धडामे से कुछ कर रहे थे !
ढोल नगाड़े सब फीके लग रहे थे ?
जब तुम गरज रहे थे, हुंकार भर रहे थे !
और धीरे धीरे यह समझ में आने लगा है  !
गांव की नौटंकी में जैसे राजा रात में ?
हुंकार रहा था और सुबह सो गया था !
तुम वैसे ही लगने लगे हो मसखरा !
रूप रंग ढंग सब वैसे ही लगने लगा है !
जैसे कोई रात की नौटंकी में !
चिल्ला चिल्ला के कह रहा है ?
और पड़ोस के घर से ताला तोड़कर !
सारा माल चोर और उसका गिरोह !
उसी समय उड़ाकर ले गया है !
और दिन का सन्नाटा रात की नौटंकी !
सब एक साथ सुनाई पड़ रही है !
की तुम क्यों आये थे धूम धाम से !

- डॉ. लाल रत्नाकर 

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

क्या सचमुच यह देश !

डॉ.लाल रत्नाकर 

क्या तुम राजा हो !
तो क्रूर दुश्मन को क्या कहेंगे ?
सचमुच अगर तुम राजा हो ?
और भ्रष्ट नहीं हो !
तो फिर चोर को क्या कहेंगे ?
या तुम राजा हो !
तो फिर धूर्त को क्या कहेंगे ?
क्या तुम धार्मिक हो !
तो विधर्मी को क्या कहेंगे ?
यदि तुम राष्ट्रभक्त हो !
तो राष्ट्रद्रोही को क्या कहेंगे ?
यह सब इतना हाचपाच !
क्यों हो गया है ?
क्या सचमुच यह देश !
बे पनाह हो गया है !
क्योंकि राजा की पहचान !
कहीं खो गयी है !
हर बेईमान राजा की तरह !
क्या सचमुच दिख रहा है ?

शुक्रवार, 30 मार्च 2018

अफवाहों का दौर समाप्त न हो जाय !

हम और हमारे लोग--------------!

समझते हैं तुम्हारे खोखलेपन को !
सदियों से चली आ रही परम्परा को !
और आगे भी जारी रहेगी इसीलिए तो।
समझते हुए इस बात को मानकर कि ?
नहीं बदलोगे अपने धार्मिक भाव को।
धर्म का प्रयोग तुमने हथियार की तरह।
अब तक तुमने सवर्णों के लिए किया है ।
तभी तो वह गिर गया है तुम्हारे चरणों में।
हम भी इंतजार कर रहे हैं उस पतन तक।
जब ये भक्त तुम्हारे लिए एक भी बचे हैं।
इंतज़ार करेंगे तब तक जब तक यह !
अफवाहों का दौर समाप्त न हो जाय !
-डॉ.लाल रत्नाकर

गुरुवार, 29 मार्च 2018

नहीं तुम धार्मिक नहीं हो ?

हम तुम्हें सलाम नहीं कर सकते।
तुम्हें प्रणाम भी नहीं कर सकते हम।
इसलिए नहीं की तुम इंसान नहीं हो।
इसलिए कि तुम मुसलमान नहीं हो ।
क्योंकि तुम क्रिश्चियन भी नहीं हो।
और तुम जो नहीं हो वह होने का।
नाटक कर रहे हो।तुम किसे हिंदू बना रहे हो।
जिसे तुम हिंदू ही नहीं मानते हो।
क्या है हिंदू जानते हो ?
क्या उन्हें तुम जानते हो ?
जो जैन हो गए हैं।
तो उन्हें भी जानते होंगे ?
जो सिख हो गए हैं।
या जो बौद्ध हो गए हैं।
क्यों तुम उन्हें हिंदू नहीं बनाए रख सके।
अब किसे हिंदू बना रहे हो।
उन्हें जो लिंगायत धर्म बना रहे हैं।
हम सोच रहे हैं।
हम भी अपना एक धर्म बना लें।
मगर कैसा धर्म ?
जिसका मतलब वह तो नहीं ?
जिसे तुम धर्म के नाम पर कर रहे हो।
किसी को गाय के नाम पर !
किसी को जाति के नाम पर !
कम से कम हम ऐसे किसी धर्म को।
धारण कर धार्मिक होने की स्थिति में नहीं है।
भगत सिंह नास्तिक क्यों हो गए थे।
शायद तब भी इसी तरह का धर्म।
कथित धर्माचार्यों के चलते !
कहीं प्रभावी तो नहीं हो रहा था।
और !
वह व्यक्ति जो नास्तिक था ।
देश के लिए शहीद हो गया।
क्या तुममें देश के लिए कुर्बानी का।
कोई जुनून है।
नहीं तुम धार्मिक नहीं हो ?
महाभ्रष्ट और जातिवादी हो ?
दुराचारी और व्यापारी हो ?
-डॉ.लाल रत्नाकर

रविवार, 25 मार्च 2018

क्यों कबाड़ बना रहे हो मुल्क को !

डॉ.लाल रत्नाकर 

जब तमाम चीजें पुरानी हो रहीं हैं
फिर तुम कैसे पुराने नहीं पड रहे हो !
क्या तुम बदल रहे हो अपने को नित ?
या तुम पुराने कबाड़ से ही निकले हो !

क्या तुम्हे नहीं पता उस कबाड़ को लोग !
फेंक चुके हैं तो फेंकी हुयी चीज हो तुम !
फेंकी हुयी चीजें कईबार काम आ जाती है !
क्योंकि और विकल्प नहीं होता तब ?

यानी फेंकी हुयी सामग्री को यह भ्रम नहीं होता !
वह जानता है की उसकी उम्र ख़त्म हो चुकी है !
कई बार उसकी कमिया जानते हुए लोग !
उसका इस्तेमाल कर लेते हैं कबाड़ से निकालकर!

कबाड़ में रह चुके लोग या तुम जैसे !
क्यों कबाड़ बना रहे हो मुल्क को !
  

मंगलवार, 20 मार्च 2018

बहादुरों बढ़े चलो

बहादुरों बढ़े चलो
बढ़े चलो बढ़े चलो
बढ़े चलो बढ़े चलो
बहादुरों बढ़े चलो!

अभी तो यह पुकार है
बहादुरों तुम्हारे यार की
खड़े हो अपने पांव पर
अडो तुम इस पडाव पर
कि हक हमारा छोड़ दो
इतिहास को अब छोड़ दो
बहुत गलत हो लिख लिये
जमीर अपनी बेचकर।
बहादुरों बढ़े चलो
आन शान बान तक
बेईमान के गिरेबान तक
पकड़ के उसको खींच लो
चुनाव के मियान से।
संविधान के लिए
बढ़े चलो बढ़े चलो।
मनु का चोला ओढ़कर
राम राम बोल कर
हड़प रहा है देश को
लूटकर के संपदा
भगा रहा विदेश को
कहां सो रहे हो तुम
पीला वस्त्र ओढ़कर।
स्वदेश के अभिमान में।
अपनों के अपमान में।
उठो खड़े हो दोस्त अब
सम्मान व स्वाभिमान में
वह हमें ललकारता है
मान और अपमान में
हमारे स्वाभिमान में।
खोजता अपमान है।
-डॉ.लाल रत्नाकर 

बुधवार, 7 मार्च 2018

शहंशाह

- डॉ.लाल रत्नाकर
ओ शहंशाह !
तुम अंधे हो या तेरी आंखें पथराई हैं।
ओ शहंशाह यह तेरा मुकुट मुखौटा !
असली है या नकली है ऐ शहंशाह !
जो भी है वह तो तुम जानो!
पर जनता तुमसे डरी हुई है!
ओ शहंशाह यह रूप तुम्हारा कैसा !
क्या सचमुच वाजिब है यह पहनावा !
क्या फबता है तुम पर !
यह तो तुम जानो !
तुम शहंशाह हो!
यह तो मानो !
तुम रोते हो।
तुम हंसते हो।
और ठिठोली करते हो।
पर झूठ बोलते कभी नहीं थकते हो !
तुम सचमुच के शहंशाह हो !
कुछ भी कहना !

तुम्हें कभी भी नागवार नहीं लगता !
क्योंकि तुम शहंशाह हो!


क्या मैं भी ऐसा ही ?
कभी शहंशाह बन पाऊंगा।
रंगों का !
रेखाओं का।
आकारों और विचार का।
जो तुमको रंग पाऊंगा।
ओ शहंशाह।
कैसे पहचानूं ।
कैसे मानूं ?
तुम शहंशाह हो ?
रंग तुम्हारे !
ढंग तुम्हारे !
शक्ति तुम्हारी !
लोकतंत्र में ?
भक्ति हो कैसी !
क्योंकि तुम शहंशाह हो।
वह भक्त तुम्हारे!

तुमको हमने !
शहंशाह सा बनता देखा
सुंदर और असुंदर देखा।
आंखों में एक सपना देखा।
रेखाओं में अपना देखा।
रंगों में नहीं सादगी तुम्हारे।
इसका मतलब।
जो भी निकाले।
ओ शहंशाह।
भृकुटि तुम्हारी ?
तुम कैसी कृति हो ?
ओ शहंशाह।

शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

हवा में आग के तासीर !

चित्र ; डॉ.लाल रत्नाकर (डिजिटल)

हवा चल रही है ।
उस हवा में आग के, 
तासीर लिपटे हुए हैं !
जो हमें डराती हुई,
निकल रही है ।
यह कितना सही है
और कितना गलत।
इसका आकलन करना।
और भयभीत हो जाना।
मुस्तकिल इंसानियत के
खिलाफ एक परचम है।
जिसे फहराते हुए।
नौजवां निकल रहा है।
आग जलाते हुए।
दिल लगाते हुए।
वक्त बदल रहा है।
अरमान लुटाते हुए।
हवा चल भी रही है।
सहला भी रही है।
गर्म थपेड़ों से।
यह कैसी बयार है।
-डा. लाल रत्नाकर

उनसे भी उतनी ही मोहब्बत है।

चित्र ; डॉ.लाल रत्नाकर 

हमें उनसे भी उतनी ही मोहब्बत है।
जो हम से जी भर कर नफरत करते हैं।
आपको नहीं लगता नफरत करने वाला ।
मोहब्बत करने वाले से ज्यादा याद करता है।
मोहब्बत तो मोहब्बत होती है।
नफरत भी कोई चीज होती है।
जो ऐसे ही नहीं हो जाया करती।
हम ऐसे किसी व्यक्ति से
नफरत नहीं करते।
जो नफरत के लायक नहीं है।
जो नफरत के लायक है।
उससे मोहब्बत करने का माद्दा?
कम से कम सब में नहीं है।
क्योंकि उसकी नफरत में ऐसी आग है।
जो उसे तो जलाती रहती है।
मगर उसे यह नहीं लगता कि वह जल रहा है।
झूठ और फरेब के तमाम कूड़ा करकट उसे ढके हुए हैं।
तभी तो वह धूं-धूं करके जल रहा है।
और उसकी आंच से न जाने कितने हाथ सेंक रहे हैं।
हम उसे मोहब्बत नहीं सिखा सकते।
वह हमें नफरत नहीं सिखा सकता।
क्योंकि उसकी जमीर उसे इजाजत नहीं देती शराफत की।
हमें हमारी जमीर इजाजत नहीं देती नफरत की।
उसे इंसान बनाने का जिम्मा 
हम नहीं ले सकते 
क्योंकि उसमें इंसानियत का लेशमात्र भी लक्षण नहीं है।
तभी तो हमेशा वह व्यापारी रहता है।
और यह भ्रम पाले रहता है।
कि वह बहुत भला इंसान है।
डॉ.लाल रत्नाकर

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

क्या कभी वो कोई डिग्री भी पाए हैं !



चलिए हम मान लेते हैं की वह बहुमत से जीतकर आये हैं !
क्यों न माने की उन्होंने झूठे वादे और झूठे सपने दिखाए हैं !

कौन करेगा इनकी जांच की इन्होने देश को कितना लूटा है !
देश की सारी एजेंसियों पर इन्होने अपने पहरुए बिठाये हैं !

और तो और इन्होने संविधान के खिलाफ जब देश चलाये हैं !
कौन कहेगा सच ! जब यह सब (चारों खम्भों) को धमकाए है !

कैसे बचेगा देश और कौन बचाएगा कौन आवाज़ लगाएगा !
जब सभी के मुहँ पर ताले लगाकर चाभियाँ उनको पकड़ाएं हैं !

जो मुज़रिम हैं कातिल हैं सभ्यता के उनके खौफ से वो भी थर्राये हैं !
जिन्हे उनको फांसी की सज़ा देनी है कानून से वह भी दुम दबाये है !

वर्बादियों के इस दौर में तकनीकियों ने अपने परचम फहराए हैं !
जुबान बंद हैं उँगलियों ने दिमाग को खोलकर जो बटन दबाये हैं !

यही तो कह रहा हूँ डिज़िटल दौर है स्कूलों में भासन सुनाये हैं !
जिनको यह नहीं पता की क्या कभी वो कोई डिग्री भी पाए हैं !

-डॉ.लाल रत्नाकर 

मानेगा तू लट्ठ से ......


घूम घूम कर थक गए भैया देश विदेश !
किसको कहाँ बिठाएंगे लुटे हैं जो देश !

पोल यहाँ पर खुल गयी राष्ट्रवाद का ढोंग !
मोदी संग मोदी दिखा दाबोश प्रवास में  !

जाँच यहाँ पर चल रही वहां जमा है माल !
वो बैठा परदेश में उड़ा लिया सब माल !

कैसा किया कमाल कमल तू देश हुआ बेहाल !
चप्पा चप्पा खोल रहा है अच्छे दिन का हाल !

पगले अंदर से तू खोखला बाहर से बलवान !
मानेगा तू लट्ठ से जब जनता ले तुम्हे दौड़ाय !

डॉ.लाल रत्नाकर 

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

कुर्सी रही तो बहुत कुछ करेगा ।



हवाओं में तुमने जो खुशबू बिखेरी।
वही अब महकने चमकने लगी है ।
जिसने भी तुम पर भरोसा किया ।
उसी को समेटे लपेटे चपेटे हुए हो ।
कहां पटकनी दे के मारोगे उसको।
खबर उसकी आने की नौबत नहीं है।

चलो साथियों मिलकरके हमसब ।
उससे बचा लें मुलुक और तुमको !
गफलत में मारे गए हो सभी जन !
भक्तों को उस पर भरोसा बहुत है !
पाखंड का जो पुरोधा है बनकर ।
वतन बेचने को निकला है तनकर ?
चमन बेच देगा वतन बेच देगा।
शातिर बहुत है वह धर्म बेच लेगा।

कुर्सी रही तो बहुत कुछ करेगा ।
वादे पे वादे वह तो झूठे ही करेगा।
हवाओं में तुमने जो खुशबू बिखेरी।
वही अब महकने चमकने लगी है ।
वतन लूटने की नियत अब तुम्हारी।
हर एक को अब चुभने लगी है।

-डा.लाल रत्नाकर

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

सपनों के सौदागर !

चित्र ; डॉ लाल रत्नाकर 

सपनों के सौदागर !
हम सपने बेचते हैं उनके लिए !
जिन्होंने सपने सजोए हुए हैं ।
खुशहाली की और अपने भविष्य के।
मेरे सपने उन पर कारगर होते हैं।
जिन्हें सपने में ही खुश रहने की आदत है।
हम सपने बेचते हैं उनको।
जिन्हें विश्वास है वह जो सपने देखते हैं।
कभी न कभी सच होता होगा।
हम सपने उन्हें नहीं बेचते जो जानते हैं।
सपनों का सच और सपने नहीं देखते।
हम सपने उन्हें भी नहीं बेचते जो ।
संविधान सम्मत विधान मानते हैं।
हम सपने उन्हें बेचते हैं ।
जो मंदिरों में मठों में माथा टेकते हैं।
हम सब को सपने नहीं बेचते।
सपने उन्हें बेचते हैं जो बेरोजगार हैं ।
यह मेरे सपनों की एक नई फेहरिस्त है।
जिसे समझने की जरूरत नहीं है।
इसे केवल सपने की तरह देखिए।
और अपने की तरह वोट दीजिए।
इन सपनों को देखने के लिए ?
हम आपसे कोई पैसा नहीं लेते ?
केवल इतना चाहते हैं कि आप।
समय-समय पर मेरे "मन की बात"
सुनते रहे और अपने सपने गुनते रहे।
सपनों का सौदागर होना भी।
रोजगार देना होता है।
तभी तो आप सपने देख पाते हैं।

- डॉ. लाल रत्नाकर

हत्यारे को मत हत्यारा कह।


एक कहानी हम लिखते हैं
चित्र ; डॉ. लाल रत्नाकर 
एक कहानी तू भी लिख।

राजा रानी हम लिखते हैं
असली हत्यारे तो तुम लिख।

आज जमाना ही ऐसा है
हत्यारे को मत हत्यारा कह।

दादागिरी गुंडागर्दी की ऐसी तैसी
मजहब और हिफाजत की भी ।

गलिओं से तो निकल न पाएं
जबकि सत्ता वही चलाएं

देश और दौलत की सरहद तक ।
झूठ फरेब का नाटक करके।

नौजवान को
और किसान को
धोखे का सबक सिखा कर
भारत का सम्मान बढ़ा कर।

उसकी कहानी अब मत लिख
बहुत हो गया जुमला मेरा ?

सबकी जुबानी साहस औ दुस्साहस
करने का माद्दा भी तो आ !

अब तू अपनी सोहरत का
और समय तक तू मत सुन।

-डॉ. लाल रत्नाकर 
(यह कविता उन लड़कियों के नाम समर्पित हैं जो खो जाती हैं हमारे मुल्क के शहंशाहों और आतताइयों के अहंकार और वासना में)

सोमवार, 29 जनवरी 2018

पकौड़ा बेचने की राय ?

डॉ.लाल रत्नाकर 

पकौड़ा बेचने की राय ?
कितनी सही है इसपर बहस नहीं करना है।
क्योंकि यह आवाहन है उस व्यक्ति का ?
जिसे छह सौ करोड़ वोट मिले हैं
एक सौ तीस करोड़ आवादी से ?
"प्रधानसेवक" पद के लिए !

हम तो दूध बेचते थे !
अब ज्ञान बेचते हैं रचना के !
क्योंकि अब पढ़ने आने वाले वो लोग ?
जिन्हे पढ़ाने के लिए हमारे वेतन से !
सालभर के वेतन से कम से कम ?
तीन माह का वेतन टैक्स के रूप में ?
काट लिया जाता है ?

पाठ्यक्रम में पकौड़ा जोड़ा जाना है
जिससे डिग्री लेने के बाद ?
पकौड़े बेचने की दुकान खोलने के लिए
तैयार किया जाना है ?
पर खरीदेगा कौन इन पकौड़ों को ?
क्योंकि कारपोरेट के पकौड़े ?
डिब्बा बंद आ गए होंगे।

वैसे तो हम सदियों से
सब्जियां, चूड़ियां, वर्तन और
छोटे मोटे घरेलु सामान बेचते ही रहे हैं
चाट, पकौड़े पर जीवन काटते रहे हैं
आपकी अच्छेदिन की कामना पाले ?
पकौड़े बेचने की राय ने डरा दिया है।
आप ने यहाँ भी कम्पटीशन बढ़ा दिया है ?

चित्र ; डॉ.लाल रत्नाकर 


वह तो ख़ुशी बेचते हैं

चित्र : डॉ. लाल रत्नाकर 


वह तो ख़ुशी बेचते हैं
जो वतन बेचते हैं
उन पर तोहमत लगा रहे हैं !
यह कैसा वक्त है ?
जो उनपर आरोप लगा रहे हैं !

बेईमानियों से हड़प कर
मुल्क की दौलत !
हमारे ऊपर कानून चला रहे हैं
जो संविधान नहीं मानते ?
हमें कानून बता रहे हैं ?
यह कैसा वक्त है ?
जो हमपर आरोप लगा रहे हैं !

हमारे बनाये हुए देश पर
जो अपना लेबल लगा रहे हैं
हम तो आहत अपने नेताओं से
जिन्हे वे हर तरह से डरा धमका रहे हैं
उनकी आदत उनकी हिफाजत
करने वाले उन्हें कातिल बना रहे हैं !
यह कैसा वक्त है ?
वही उनपर आरोप लगा रहे हैं !
 
-डॉ. लाल रत्नाकर 



बुधवार, 3 जनवरी 2018

वह कौन है ? ............................


यह कैसी क्रांति है ?
वो क्रांन्ति करेंगे !
झूठ बोलकर
गप मारकर !
झांसा देकर
और संविधान बदलकर !
ये माना देश गरीब है
और कर्ज में डूबा हुआ है
लेकिन यहां का
हर वह आदमी अमीर है ?
जो सरकारी मोहकमें में
कम से कम वेतन पर
कमाऊं पद पर तैनात है।

-डा.लाल रत्नाकर


शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

क्या मैं मानव हूँ ?


मैं मानव हूँ !
मुझे राक्षस की तरह क्यों ?
देखा जा रहा है सदियों से !
मानवता के सारे मानदण्ड !
तभी तो तोड़े जा रहे हैं ?
दानवता के विकास के लिए !
पर जिन्हें उठाना है हथियार ?
उन लोगों के लिए ?
जो दानवता के ख़िलाफ़ !
खडे होने का साहस कर रहे हैं !
और उन्हें बंद कर दिया जाता है !
इसलिए कि वे दानवता के विरुद्ध
आवाज़ उठा रहे है ?
कि वह मानव नहीं दानव है ।
क्योंकि आजकल दानवो को ही !
मानव के रूप में स्थापित किया जा रहा है !
तभी तो अच्छा ख़ासा मानव !
दानवीय प्रवृत्तियों की तरफ़ बढ़ रहा है !
यह कैसा समय आ गया है ?
जब कोई भी मानव बने रहने के लिए !
न तो संघर्ष कर रहा है !
और न ही मुँह खोल रहा है !
यह जानते हुए भी कि सब कुछ !
तहस नहस हो रहा है !
मानवता के विरूद्ध ।
-डॉ.लाल रत्नाकर

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

ऐसा समाज बदल दो !

रस्मों रिवाज बदल लो !
अपनी आवाज़ बदल लो !
आततायियों का दौर है !
सुनना दुश्वार है !
बहुजन लाचार है !

पाखण्ड का चमत्कार है !
सदियों से जिनके चेहरे !
चमक रहे हैं उन कारणों से !
उन कारणों को ? 
क्या वे समझ पायेंगे !
जो इनके पाखण्ड में आकंठ !
जकड़े हुये हैं सदियों से ?
क्या अपनी आवाज़ उठा पायेंगे !
तभी तो कह रहा हूँ !
रस्मों रिवाज बदल लो !
अपनी आवाज़ बदल लो !
आततायियों का दौर है !
रस्मों रिवाज बदल लो !
ऐसा समाज बदल दो !

-डॉ.लाल रत्नाकर
(आरेखण एवं चित्र : डॉ.लाल रत्नाकर)

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

विभीषण की ही तरह


जब जब हमारे बीच वक़्त बेवक़्त !
कोई आकर खड़ा हो जाता है !
वह दुश्मन की तरह नजर रखता है !
मेरी खुशहाली पर और अपनी बदहाली पर 
लेकिन मुंह नहीं खोलता !
खुलता नहीं है किसी भी तरह की 

अपनी मानसिकता पर कभी नहीं 
क्योंकि वह जानता है अपनी मानसिकता
जो उसको सदियों से याद भी नहीं है !

क्योंकि !
सत्य और तथ्यों से वह सदा सदा 

छेड़छाड़ करता आया है अपने लिए !
हम तो परेशान हो जाते हैं कि यह मेरा दोस्त है ?
तो यह मेरा दुश्मन क्यों लगता है ?

हम जिसे दोस्त बनाने की जुगत करते है !
वह दुश्मन बनता या बनाता जा रहा है !
किस वजह से वे दुश्मन ज्यादा बढ़ा रहे है।

दोस्त बनाने के नाम पर !
क्योंकि ?
ठग बाबाओं ने लोगों को खूब लूटा है
और तो और बदसूरत किया है 

जिसे वो समझते हैं उन्हें खूबसूरत किया है 
क्योंकि वे यह नहीं समझते !
कि किस तरह उनका शोषण किया है ?
लेकिन जो उनके भक्त बने हुए हैं
उनका नाम लेने की जरूरत नहीं है ।
विभीषण और विभीषण की ही तरह
खड़े रहना है।


-डॉ लाल रत्नाकर