रविवार, 18 नवंबर 2018

परम्परायें


गॉव की शहर आ गयी हैं
'छठ' बिहारियों के पुत्र, पति
की रक्षा का पर्व है।

बहुतेरे त्योहार पहले से ही
यहॉ जमे बैठे हैं, जैसे महानगरों में
व्यापारी जमे बैठे हैं, उन्होंने छठ का
एक स्टाल और लगा लिया है।

हमारी नज़र में ये पर्व
मात्र बाज़ार के क्रियेशन हैं
पति पर पत्नि का इतना बोझ है
कि वह सारी परम्परायें तोड़कर
पर्व मनाने का जो बोझ ढो रहे है।

ये सारे भाषणों पर
पाखंड की निंदा कर रहे होते हैं
और इधर वही छठ मना रहे होते है
पाखंड को परवान चढ़ा रहे हैं ।

-डॉ लाल रत्नाकर

रविवार, 11 नवंबर 2018

काठ का नाम बदलो !

चेहरे : डॉ लाल रत्नाकर 

नाम बदलना है तो
काठ का नाम बदलो
काठ को लोहा कर दो !
और लोहे को काठ।
पानी को हवा कर दो।
हवा को पानी ?
मोदी को अडानी और
अम्बानी को अमित ..!
राम को रावण और
कृष्ण को ईशा मसीह !
मस्जिद को मंदिर !
मंदिर को मस्जिद या गिरजाघर !
                   
                        -डा.लाल रत्नाकर

हिसाब अभी बाक़ी है ?



हिसाब अभी बाक़ी है ?
जवाब अभी बाक़ी है !

सलामती का वक़्त कहॉ !
ख़ुराफ़ात अभी बाक़ी है !

लड़ना है जिससे हमें !
वह बिगड़ा हुआ मदारी है !

जुमले में बात करता है !
जुमलों का खिलाड़ी है !

हिसाब अभी बाक़ी है ?
जवाब अभी बाक़ी है !

-डॉ.लाल रत्नाकर






उम्मीद बाक़ी है ?


धूप्प अँधेरा है।
उम्मीद बाकी है।
तेल की धार !
घी में उतर गयी है !
और घी देसी घी में !
पेट्रोल की कीमत जोड़ दी गयी है।
आम आदमी की जिंदगी !
उत्सवमय हो गयी है !
हर हाथ को काम और घर की चाभी।
इन विगत कुछ सालों में।
रसोई गैस घर घर पहुंचा दी गयी है।
बुलेट ट्रेन से !
इसमें कुछ भी झूठ नहीं है !
क्या धूप्प अन्धेरा नहीं है।
कितने दिए जलाओगे !
इंसानों के खून से !
सरजू के तीरे और गुजरात में।
दिए जलाकर और मूर्ति लगाकर।
फिर झुठला दिया है !
अपनी नाकामियों को।
राम को ओढ़ा दिया है।
एक दिया राम के नाम का।
और बाकी दिए ?
धूप्प अन्धेरा है।
कितने दिए जलाओगे !
-डा.लाल रत्नाकर
(-सांस्कृतिक साम्राजयवाद के खिलाफ !)

रविवार, 4 नवंबर 2018

दिवाली

मैं जानता हूँ मेरे विचार मेरे ही लोगों को रास नहीं आयेंगे ! लेकिन मेरा विश्वास है कि यदि एकबार हम भावनाओं और समाज की रूढ़ियों से किनारा कर ले तो हम समाज को बदल सकते हैं ! कईबार हमारा समाज रूढ़ियों को अन्यमनस्क भाव से इसलिये ढो रहा होता है क्योंकि उसके पास अपना कहने को कुछ भी नहीं बचा है जिसके कारण अपने खिलाफ बनाये गए उसके त्योहारों और परम्पराओं को वह उस समाज से बढ़ चढ़ कर अपने को  विकसित दिखाने के चक्कर में उनकी परम्पराओं का शिकार हो रहा है जिन्होंने उससे ठगी करने के लिये सदियों से यह परम्परायें गढ़ी है । और यही कारण है की वह हर लड़ाई उससे हार जाता है। 


परम्परा कैसी कैसी ?
दशहरा,दिवाली,होली,छठ !
जन्माष्टमी जैसे त्योहार की परम्परा !
कब से चली चली आ रही है ?
और कब तक चलती रहेगी ?
इसी तरह ?

क्या कभी आपने सोचा ?
शायद नहीं, और न ही सोचने की
ज़रूरत ही समझा/समझी आपने !
किसी त्योहार के दिन को क्या ?
आपने उसे नकारा या नकारी ?
ज़रा विचार करिये ?
क्या खोया क्या पाया आपने ?

मिठाईयॉ ड्राई फ़्रूट नये परिधान !
या और कुछ !
पर आपने खोया अपना विश्वास !
वशीभूत कर लिया आपको उसने
अगले साल के इस उत्सव के लिये !
यह कौन है जो आपको डरा रहा है ?
कभी सोचा आपने !

उसका व्यापार और
उसका पाखण्ड मिलकर !
रोज़ रोज़ नये नये परिवर्तन कर रहा है ।
मगर आपको समझ में ही नहीं आ रहा है !
उसका षड्यन्त्र !
यही तो है जिसके बल पर
आप उसके गुलाम हो सदियों से !

आज भी समय है विचार करने का !
क्या कभी आपने इसपर सोचा ?
सही सही आकलन करिये अपने मन और
मन में पैठे परम्परा के नाम पर विराजमान !
अपने अंदर के शत्रु को !


डा.लाल रत्नाकर

रविवार, 28 अक्तूबर 2018

ठग !



सत्ता ठगों के हाथ में है !
देश कहॉ जा रहा है ?
किसको पता है चुनाव आयोग को !
जनता जनार्दन को या वोटर को !
नहीं किसी को नहीं भक्तों को ?
अब भक्तों को गारण्टी दी जा रही है ।
श्रद्धालुओं के नाम पर ?
भक्तों के महागुरू महाठग महान हैं !
क्योंकि सत्ता ठगों के हाथ है ।

डा लाल रत्नाकर

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2018

लुटेरे !





दिख रहे है सन्त जैसे !
लूटकर यह देश को !
बहुरूपिये !
पहचानो इन्हें !
झूठे और मक्कार हैं!
पकड़ो इन्हें यह भाग जायेंगे !

लोकतंत्र के कलंक हैं यह !
पाखण्ड के पुतले हैं यह !
झूठ और जुमलों के पुल !
बॉध रहे हैं गंदी ज़ुबान से !
भगवान और शैतान की तरह !
क्या लगते हैं इंसान यह !
बेईमान बेईमान कह रहे हैं !
बेईमानी ही तो कर रहे हैं !

दौड़ाओ नही तो यह भाग जायेंगे !
अमन चैन सम्पत्ति सबको लूटकर !
क़ानून का चोंगा पहनकर बहुरूपिये !
सेंध ही तो मार रहे हैं !
कह रहे व्यापारी हैं यह हमारा काम है !

दिख रहे है सन्त जैसे !
लूटकर यह देश को !
बहुरूपिये !
पहचानो इन्हें !
झूठे और मक्कार हैं!
पकड़ो इन्हें यह भाग जायेंगे

-डॉ.लाल रत्नाकर "


बुधवार, 24 अक्तूबर 2018

चलो एक गीत लिखते हैं।

चलो एक गीत लिखते हैं।
जिसमें जीवन की सच्चाईयां हो।
जो सच को उजागर करता हो।
चलो एक गीत लिखते हैं।
बहुत हो गया झूठे झूठे।
वादे और इरादे सुनते सुनते।
चलो एक गीत लिखते हैं।
जो झूठ को झूठ की तरह।
समझा सके और झूठ को।
सत्य से मिटा सके ऐसा गीत।
चलो एक गीत लिखते हैं।
झूठे गीत गाने वाले।
कौन हैं इनको सुनने वाले कौन हैं।
हमारा गीत उन्हें समझा सके।
चलो ऐसा गीत लिखते हैं।
सच को सच की तरह सिखा सके।
चलो हम भी एक गीत लिखते हैं।
-डा.लाल रत्नाकर

रविवार, 7 अक्तूबर 2018

चरवाहा

चरवाहा
@ डा.लाल रत्नाकर

चरवाहा कैसा और किसका उनका जिनके पेट भरे हैं
जिनके दिमाग़ में अपराध ने जडवत जगह बना रखी है
जिन्हें वास्तव में प्रकृति के सुकोमल तंतुवों की चाह है
घास भूसे से मेरा भी भण्डार भरा पड़ा है जिसकी चाभी,
उसने रख रखी है जिसने ज्ञान की ठेकेदारी ले रखी है।

ज्ञान के तंतुओं को मारकर हमने व्यापारी की ही तरह
जड़ता !
सजा रखा है तिजोरियों में ज्ञान को आज के युग में!
जितना चाहता हूँ उतना ही तो खोलता हूँ क्योंकि मैं
चरवाहा ही नहीं हूँ
सारे वह काम जानता हूँ जो जो मेरे बस के नहीं है
आजकी व्यवस्था में !
रंग ढंग दुष्ट पुष्ट भ्रान्ति भेद भाव कटुता में शान्ति के
संदेश की तरह ?

पर मैं चरवाहा क्यों नहीं हो सकता  हूँ ?
क्योंकि चरवाहा जानता है चोरी की आदतें, छिछोरी हरकतें
प्रकृति के तंतुओं पर उसका कभी भी अधिकार नहीं होता,
अधिकार होता है उसका और उसकी चापलूसी का धूर्तता का,
कपट और कुटिलता का जो हासिल किया जाता है सदियों से
इस मुल्क में हमेशा षड्यन्त्र से ।

मंगलवार, 2 अक्तूबर 2018

एक दर्जन पेंटिंग !


मेरी एक दर्ज़न तस्वीरें !
तुम्हारी हज़ारों इमारतों से !
कैसे बड़ी हैं यही तो समझाना है ?
जिसे समझने में बडे से बडे 
गफ़लत में फँस जाते हैं।

इमारतें तुम्हारी हैं ज़रूर
पर इन्हें तुम्हारी अंगुलियों ने रचा नहीं है ?
जिन्होंने इन्हें बनाया है ।
उन्होंने इसपर हस्ताक्षर नहीं किया है ?
क्योंकि उन्हें रोज़ की दिहाडी पर !
लगाया गया था !

पर वे नहीं चाहते कि उनके हस्ताक्षर हों !
क्योंकि इमारत के बनाने के लिये !
जितने लोग लगाये गये हैं !
उनके हस्ताक्षर कहीं नहीं हैं ?
इसीलिये यह इमारतें आकार में !
जितनी भी बडी हों पर !
मेरी तस्वीरों से बडी नहीं हैं ।

-डा.लाल रत्नाकर 

सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

वह कौन है ?


वह कौन है जो !
क्या हमें मारने आया है ?
वह कौन है ज़रा पहचानो ?
क्या सचमुछ हमने इसका ?
हाँ इसका हमने भला किया था !
और भूल गया था। 

यह याद दिलाने आया है 
मारने के बहाने से !
क्योंकि अब उसे हमारी मदद की 
जरुरत नहीं रह गयी है !
यह छुपाने  बहाने आया है। 
या यह भुलाने आया है !

जब उसे पहचानने की ?
कोशिस किया तब वह !
छुपता हुआ अपने हथियार 
फेककर भाग गया था ?
उस हथियार को !
अखबार वालों ने !
उसदिन की मुख्य खबर के रूप में !
प्रकाशित कर दिया !

वह मुझे तो नहीं मार पाया !
पर मेरे चरित्र पर उसके हथियार !
खरोंच लगाने की कोशिस में !
सदा सदा के लिए ?
भोथरे साबित हो गए !
बाद में उसके किसी साथी ने बताया !
और कई लोग उस अपराध में !
शहीद हो गए !

अभी जो बचे हैं !
उनकी आत्मा मर गयी है। 
क्योंकि वे हत्यारे हैं ?
चरित्र से और चाल से !
सदियों से लोगों को ?
इसी तरह से मारे हैं ?
वह कौन है जो !
क्या हमें मारने आया है ?
वह कौन है ज़रा पहचानो ?
क्या सचमुछ हमने इसका ?
हाँ इसका हमने भला किया था !
और भूल गया था। 

डॉ. लाल रत्नाकर 




रविवार, 30 सितंबर 2018

सदी का महासमर ।


चित्र : डॉ.लाल रत्नाकर (संग्रह सी सी एम बी हैदराबाद ) 
महासमर है
  महासमर है  
ग़द्दारी मत करना !
अभी तुम्हें बहलाया जायेगा 
फुसलाया जायेगा !
आपस के भेदभाव से 
तुम्हें घुमाया जायेगा ?
यह कह कर ?
वह सारा हक़ खा गया तुम्हारा ?
दिल तेरा सहलाया जायेगा !
यदि तुम सो गए !
ग़द्दारों की लोरी से !
फिर तुम्हें 
गहरी नींद की गोली देकर ?
सदियों सदियों सदियों तक !
दास बनाया जाएगा !
महासमर है 
महासमर है 
ग़द्दारी मत करना !

डा.लाल रत्नाकर

रविवार, 23 सितंबर 2018

झूठ सिखाती है !


यह सरकार जो झूठ सिखाती है ।
कैसी और  किसकी सरकार है ?
जनता को जो झूठ सिखाती है !
हमेशा बहकाती है !

हमसे यह झाड़ू लगवाती है।
और हमें यह ख़ूब गप सुनाती है।
अपनों को लूटपाट करके बाहर भगाती है।
हमको बेवक़ूफ़ बनाती है !

शिक्षा के अनुदान को यह ख़ूब घटाती है ।
यह मंत्री कैसा मंत्री है जो भीख मँगाता है ?
अनुदान को कटोरा लेकर आना बताता है।
मेरे ही पैसों पर इतराता है ?

शिक्षा के सभी अनुदानों को रोककर !
यह शिक्षा का जनाजा उठवाता है !
अब यह पढ़ाई लिखाई की जगह !
सर्जिकल डे का ढोंग रचाता है !

विश्वविद्यालयों में अपना उल्लू बैठाता है !
यह सब करके सबको वह बेवक़ूफ़ बनाता है!
यह कैसी और  किसकी सरकार है ?
जो जनता को झूठ सिखाता है !


डॉ.लाल रत्नाकर

रविवार, 16 सितंबर 2018

नरभक्षी


सकून जिंदगी का मगर तो जरुरी है
दौड़भागकर पहुंचना तो एक मज़बूरी है
कभी इत्मीनान से बैठो और ज़रा गौर करो
वास्तव में अपनी यात्रा कितनी अधूरी है..
यही तो बात है जो बैठने नहीं देती ?
जिंदगी आग है धुआं तो गुबार है उसका।
गुमान की भी कोई सीमा है सियासत की भी।
पता करो हिरासत में हो या हिफाजत में !
आवाज तो आवाज है कोयल और कौवे की भी
हमें तो गैरत बचानी है अपनी भूखे खूंखार और
रवायती बदमिजाज़ बिगड़े हुए सियारों से !
उलझ के रह गए जो सोहरत के सवालों में !
मुझे पता ही नहीं कीमत हमारी कितनी है ?
वो तो बिक रहे हैं रहमत की फ्री स्टालों पे ?
उनसे बराबरी का क्यों इरादा पाले हो पगले ?
क़ीमत पर सकूं जिंदगी का क्यों बर्बाद करना है !
हमारी हार या जीत का हिसाब तू मत करना !
तुम्हारी जीत से नफरत की बू आ रही मुझको !
सियासत में सियासत है हिफाज़त तो बहाना है।
तुम तो फलसफा हो अभी उसकी हिफाज़त में !
उसने तो निगला है सियासत के निवाले में हज़ारों !
इन्सांनों की रवायत है उसे पता और क़ीमत भी !
तुम्हारा शौक है पूरा करो ज़रा हिफाज़त से !

डॉ.लाल रत्नाकर

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

कौन आ गया है ?


हमारे तुम्हारे मध्य ?
कौन आ गया है ?
पहचानते हो उसे ?
वह जाती छुपाकर,
धर्म को ढंककर,
मर्यादा को तिलांजलि देकर !
तुम्हारे रहस्य जानने के लिए !
भेष बदलकर आया है !
अब उसका सम्मान !
या अपमान करने की !
कुवत किसमें है ?
तुममें या तुम्हारे नेता में ?
क्योंकि उसकी पैनी नज़र !
से बच निकलना कठिन है ?
अभी तक तो यही देखने में आया है !

डॉ.लाल रत्नाकर

कैसे लड़ेंगे ?


कैसे लड़ेंगे ?
गरीब गरीब की तरह लड़ेगा उनसे !
और अमीर अमीर की तरह अत्याचार करेगा।
अब सवाल यह है की हम इस युद्ध में किसके साथ खड़े हों ?
गरीब मेरी नहीं सुनेगा अमीर विश्वास नहीं करेगा ?
फिर हम कहाँ खड़े हों न इधर न उधर ?

जातियाँ भी इसी तरह से बँटी हुई हैं ?
जैसे गरीब और अमीर !
वे जातियाँ  जिन्हे आरक्षण मिला था !
और वे जातियां जो आरक्षण के लिए लड़ रही थीं !
और वे जातियां जो सो रही थीं और सो रही हैं !
उनसे जो हड़प कर काबिज हैं सारे संसाधनों पर ?
हम कैसे लड़ेंगे उनसे ?

आज नए युद्ध का आगाज खड़ा हो गया है ?
जिससे लड़ना है उसका साम्राज्य खड़ा हो गया है ?
झूठ
फरेब
लफ़्फ़ाज़ी
जालसाज़ी
और
अपराध का ?
क्योंकि वह पेशेवर राजनीतिज्ञ की तरह !
राज्य करने की बजाय राज्य हड़पने में लगा है ?
संविधान को उसकने बौना बनाकर सामने कर दिया है !
सारे खम्भों को हड़प लिया है !
गिड़गिड़ाहट की आहट से सन्नाटा पसरा हुआ है !
हर तरफ उसका एक दलाल लगा हुआ है !
कैसे लड़ोगे।

--डॉ.लाल रत्नाकर 

मंगलवार, 11 सितंबर 2018

देश

चित्र ; महात्मा बुद्धा (नेट से लिया गया)  

सवाल तेरा ही नहीं है सवाल हम सबका है ।
देश तुम्हारा ही नहीं है यह देश हमारा भी है ।

संविधान की करामात है कि तुम यहॉ बैठे हो 
और तुम संविधान पर ही सवाल उठा रहे हो !

तुम्हारा सदियों से गढा जो पाखंड का पोथा है 
उसको फिर से चलाने की साजिश बना रहे हो !

हमको सदियों से मालूम है तुम्हारी साजिश 
तुम हमे बॉटकर हमको ही बेवकूफ बना रहे हो !

सवाल तेरा ही नहीं है सवाल हम सबका है ।
देश तुम्हारा ही नहीं है यह देश हमारा भी है ।

-डॉ.लाल रत्नाकर




शनिवार, 8 सितंबर 2018

पंगु

(अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगाया जा रहा अंकुश इसलिए भी लगाया जा रहा है क्योंकि)



पंगु हो गए समाज में
लंगड़े,अपराधी,मवाली
बवाली,साधु,सन्यासी
राजा हो गये हैं !

राजा बनकर ये
सब वही कर रहे हैं !
जो ऊपर वाले आजकल ही नहीं
सदियों से वह यही कर रहे हैं ।

बहुत सारे लोग इन्हें
जो कुछ कह रहे हैं वह
इनसे डरे हुये हैं !
क्योंकि उनमें दम नहीं है !

डॉ.लाल रत्नाकर

बुधवार, 5 सितंबर 2018

वक़्त


वक्त कैसा भी हो !
वक्त ही होता है।
यही वक्त !
सही भी होता है ?
और गलत भी!
इसलिये नहीं की
वह किसके लिए है
और इसलिए भी नहीं 
कि वह वक्त है।
और यह वक्त ही है !
जिसमें गधे घोड़े
और घोड़े गधे !
बनाऐ जा रहे हैं।
वक्त कैसा भी हो !
वक्त ही होता है।
यही वक्त की पहचान है !
जो सही भी होता है ?
और गलत भी ।

डॉ. लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

हिफाज़त !

चित्र ; हि.गौ.पूर्व छात्रा (चित्रकला विभाग)

हिफाज़त ! का आश्वासन दिया था चौकीदार ने !
नोटबंदी हो या न्यायपालिका संविधान या सीमा !

कहीं भी तो वह चौकीदारी की होती ईमानदारी से !
जुमले और जगलरी वाले चौकीदार ने क्या किया !

जब ज़माना कह रहा है क्यों तुम्हे झूठा और फरेबी !
क्या सचमुच यह सच है या वह भी झूठ कह रहा है !

मुझे नहीं लगता की तुम्हारे झूठ का यहॉ असर नहीं है !
अब हुआ है खूब और खूब झूठे हो गए हैं तुम्हारे भक्त !

तुम हिफाज़त के नाम पर किसको लूट की दी है छूट !
अब हिसाब मांग रहा है देश तुमसे देश के चौकीदार  !

डॉ.लाल रत्नाकर