शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

इलाज क्या है


जिस अवाम को यह पता ही नहीं है !
कि उसका इलाज क्या है 
इस लाइलाज आवाम का 
इलाज जो कर रहा है 
उसका इलाज वक्त आने पर 
यही लाइलाज अवाम करेगी
जब उसे अपना मर्ज
समझ में आ जाएगा
हमें तब तक इंतजार करना है
इस मूर्ख अवाम का
क्योंकि इनको यह नहीं पता
जो यह बता रहे हैं कि
तुम्हारा हक फला खा गया है
अब इनको पता चल रहा होगा
यही तो है जो सब खा गया
जो अब तक हमने हासिल किया था।
यह मूर्ख मगर बहुत चतुर
आवाम लौटेगी जरूर
तब जब वे लूट लिया होगा
और जब वह,
वह सब कुछ लूटा चुकी होगी ।
जिस अवाम को यह पता ही नहीं है !
डा.लाल रत्नाकर

शातिराना दौर

शातिराना दौर
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हम कितने शातिराना दौर से 
मुखातिब हैं !
हालाँकि यह कोई नई बात नहीं हैं !
यह सदियों सदियों से पूरी दुनिया में !
एक वर्ग करता आ रहा है !
जब उसे आसानी से पहचाना जा रहा है !
हम कितने शातिराना दौर से
मुखातिब हैं !

अफसोश यह है की इस आदत के
शिकार वो हो गए हैं !
जिन्हें हमने उन शातिरों के खिलाफ ?
खड़ा होने के लिए अवसर दिया था !
लेकिन उन्होंने अपने को उनके अनुसार
ढाल लिया है जिनकी वजह से ?
हम कितने शातिराना दौर से
मुखातिब हैं !

डॉ.लाल रत्नाकर

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

ईमानदारी और बेईमानी

य 
यह जरुरी नहीं है कि वे ईमानदार हैं।
पर यह जरुरी है की वह बेईमान न हों !
ईमानदारी
और
बेईमानी
इनका फर्क कौन करेगा ?
यह सवाल नहीं जवाब है !
जब दो बेईमान लड़ रहे हों ईमानदार के लिए !
या दो ईमानदार लड़ रहे हों किसी बेईमान के लिए !
आजकल कुछ कुछ ऐसे ही नज़र आता है !
लोगों की मुखालफत और समर्थन देखकर !
ईमानदार बेईमान के लिए लड़ रहा होता है !
बेईमान ईमानदारी का नाटक कर रहा होता है !
यह जरुरी नहीं है कि वे ईमानदार हैं।
पर यह जरुरी है की वह बेईमान न हों !
--डॉ.लाल रत्नाकर 

मंगलवार, 30 मई 2017

इतिहास का धर्म

इतिहास का धर्म
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-डॉ.लाल रत्नाकर
डॉ. लाल रत्नाकर का चित्र 

अगर मैं इतिहास लिखूं तो लिखूं किसके लिए
क्या वह मेरा लिखा इतिहास पढेंगे ?
क्योंकि वह तो पाखंडियों का लिखा हुआ
इतिहास पढ़ने के आदी हो गए हैं
जिसमें उनके खिलाफ लिखा गया है
और जानबूझ कर लिखा गया है
कि यह अपराधी हैं
दरअसल इतिहास लिखने वाले ही
असली अपराधी थे
जिन्होंने सही इतिहास नहीं लिखा
जिससे आने वाली पीढ़ियां
यह न जान सके कि
उनका वास्तविक इतिहास क्या था
और उसे वह गुमराह कर सके
जिसे वह निरंतर अपना इतिहास मानता रहे
मेरे यहाँ के इतिहास के एक प्रोफेसर ने कहा कि
मेरठ की क्रांति का इतिहास ही गलत है
मंगल पांडे को न जाने कहां से लाकर वहां बैठा दिया
जबकि वह तो पूरा आंदोलन ही गुर्जरों का था।
मैं तो इतिहास का विद्यार्थी नहीं हूं
कला का विद्यार्थी होने के नाते
मैं ऐसे कला इतिहासकारों को जानता हूं
जिन्हें कला के इतिहास का ABCD नहीं आता
और वह कला पर शोध और शोध कराते जा रहे हैं
उन शोधार्थियों का क्या होगा
जो उनके साथ कला पर शोध कर रहे हैं
ऐसे लोग एक दो नहीं पूरे इस महामंडल पर
व्याप्त हैं जिनकी शोध कथाएं
न देखी जीती हैं ना पढ़ी जाती हैं
जो केवल और केवल उतारी जाती है
ऐसे इतिहासकारों ने हमारे देश का
इतिहास लिखा है जिसमें बहुत कुछ छोड़ दिया है
जो कुछ उन्होंने छोड़ दिया है
अब उन्हें कौन लिखेगा ?
क्या आप पढ़ोगे ?
यदि उन सबको लिखा जाए
जिसको छोड़ दिया गया है।
इसलिए अब नया इतिहास लिखना होगा
जैसे भाजपा के लोग अपने
गौरव का इतिहास लिख रहे हैं
जिनका इतिहास में जिक्र है कि
आजादी के लडाई के समय
यह अंग्रेजो के साथ थे
या दुश्मनों के साथ है
तब भी और अब भी !
अगर मैं इतिहास लिखूं
तो लिखूं किसके लिए
क्या वह मेरा लिखा इतिहास पढेंगे ?

मंगलवार, 9 मई 2017

बुद्ध हूं

मैं बुद्ध हूं 
मैं बाबा साहब अंबेडकर हूं 
मैं माननीय कांसी राम हूं 
मैं महात्मा फुले हूं 
मैं पेरियार हूं 
मैं ललई सिंह हूं 
मैं रामस्वरूप वर्मा हूं 
मैं मैं हूं 
जागो उठो खड़े हो जाओ 
मैं पिछड़ा हूं 
मैं दलित हूं 
और मैं मुसलमान भी हूं 
मैं अफसर हूं 
मैं शासक हूं 
मैं मुख्यमंत्री हूं 
मैं प्रधानमंत्री हूं 
मैं संविधान हूं
मैं दाता हूं 
मैं वकील हूं 
मैं डॉक्टर हूं 
मैं ज्योतिषी हूं 
मैं बुद्धिजीवी हूं 
मैं वैज्ञानिक हूं 
मैं इंजीनियर हूं 
मैं कवि हूं 
मैं कथाकार हूं 
मैं कहानीकार हूं 
मैं संगीतकार हूं 
मैं मजदूर हूं 
मैं कलाकार हूं 
मैं किसान हूं 
मैं स्वाभिमान हूं 
मैं सम्मान हूं 
तुम्हारे अपमान के खिलाफ हूं

शुक्रवार, 5 मई 2017

भरोसे के लायक नहीं हैं ?


हम भी तो चाहते हैं की वह सहज हों !
जबकि हम उनके लिए इस ओर बने हैं
हमेशा खड़े रहकर सहयोग करते रहे हैं
पर वो है की मानते ही नहीं शिवा उनके
जो उन्हें फूटी आँखों नहीं देखना चाहते
यह उन्ही के चक्कर काट रहे होते हैं !
उस स्वान की तरह जिसे यह विश्वास
न जाने क्यों हो गया है की यह अपने हैं !
वे जिन्हे केवल उन स्वानों से मोह है !
जो या तो पालतू हैं या उन्हें चाटते हैं !
चाटने और काटने का मर्म समझना
सहज नहीं है पर उसे यही समझाना,
कितना मुश्किल है क्योंकि वह उन पर
भरोसा करते है जो कहीं से भी भरोसे
के यद्यपि लायक नहीं हैं ?

डॉ. लाल रत्नाकर  

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

वतन पर हो ज़रा कुर्बान !


तुम्हारे जज्बात की क्या ? तुम्हारे सौगात की क्या ?
हमें तो फख्र इसपर है, कि तेरे ऐसे एतबार से क्या ?

वतन पे बे-इंतहा कब्जा , चमन पे उनके डालकर पर्दा ?
चलो उस जश्न में शामिल हों जहाँ मातम फख्र है उनका ?

जो हमें रुलाएं रूबरू होकर उन्हें अब आजमाएं तो !
बताएं अब वो कहाँ पर हैं जिन्हें वे राष्ट्र भक्त कहते हैं !

किसलिए वो जो नित वतन पर, न्योच्छावर हो रहा है  !
कभी तो बे-आबरू होकर , इस वतन को लुटने वाले !

वतन बर्वाद करने वालों के बयां पर करो जुम्बिश भी !
अपने वतन पर हो ज़रा कुर्बान उनके बाल बच्चे भी !

-डॉ. लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

एहसास ही तो है जिंदगी ,

एहसास ही तो है जिंदगी ,
अन्यथा जी तो बहुतेरे लोग रहे हैं !
सदियों से और आगे सदियों तक
जीते रहेंगे और अहसास के बिना !

हमारे लोग जी तो रहे हैं,
पर अहसास अपने आप में उन्हें
उन्हें अहसास ही नहीं होता !
जीवन का ! और उनके आगे !

हमने सपने  गढ़े  तो बहुत थे
पर उसका एहसास नहीं  करा पाया !
पर उसने महशुस कर लिया ?
और सपने ही नष्ट कर दिया !

एहसास को मारकर
जिंदगी दे दी उसने बहुजन को
जो रोज रोज मरता है
उसे एहसास नहीं होता !

वह धार्मिक है ?
पर धर्म क्या है उसे नहीं जानता !
इसीलिए उसे धार्मिक बने रहने का हक़ है !
बिना सत्य के एहसास के !

- डॉ.लाल रत्नाकर 

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

चंद लोगों ने


चंद लोगों ने
आसमाँ सर पे उठा रखा है
सत्ता के नाम पर !
इम्तिहान ले रहा है
मुकद्दर का उनका 
जिन्होंने सत्ता की उन्हें चाभी दी है।
नतीज़ा जो भी हो !
हमें तो फेल किया है
हमारे ही अपने लोगों ने ?
जिंदगी बदहाल कर रखा है
चंद लोगों ने ?
-डॉ लाल रत्नाकर

वो कौन हैं जो मर रहे हैं ?

वो कौन हैं जो मर रहे हैं ?
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ये कौन मर रहा है और क्यों मर रहा है ?
जो मर रहा है उसकी पहचान क्या है ?
वो कौन हैं जो मर रहे हैं ?

क्या इनकी कोई मियाद है की ये कब तक ?
ये सरकारें इस तरह के हमले की जिम्मेदार हैं ?
या जिम्मेदार हैं ही नहीं ?

माओवादी या नक्सलवादी या नेता ?
कौन खतरनाक कितना मुल्क या मानवता के लिए ?
कौन तय करेगा ?

नई राजनीती नई अर्थ निति ?
और नया समाजवाद, पूंजीवाद ?
साम्प्रदायिकता, जातिवाद, का अंत क्या है ?

कितने दिनों से देश के !
उन काबिल कौमों के ठेकेदारों ने ?
यह दोष दूसरे पर मढ़ते आ रहे हैं ?

इन्हें कौन बताये की जो दोष आप छुपाये हो
उसी में अपराध के बीज छुपे है।
तभी तो वे निरन्तर अपराध करते आ रहे हैं ?

-डॉ लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

संस्कृति

डा.लाल रत्नाकर

संस्कृति का विचार किससे करोगे
जिसने इस संस्कृति का विनाश किया है।
या जिसने सांस्कृतिक साम्राज्यवाद गढ़ा है ।
संस्कृति पतनोन्मुखी है या उत्थानोन्मुखी ।
जब जब हमने इसपर सवाल उठाया ?
तब तब मेरा मुँह बन्द कर दिया गया ।
सांस्कृतिक साम्राज्यवाद में किसकी कितनी 
हिस्सेदारी इसका लेखा-जोखा कौन करेगा ?


इस संस्कृति में जिन्होंने हमें केवल सेवक बनाया है 
और स्वयं उसका मालिक बन बैठा है 
यही कारण है कि संस्कृति और अपसंस्कृति का 
भेद खत्म होता जा रहा है और बहुत तेजी से 
जब देश वैश्विक संस्कृति अपनाता जा रहा है 
और अपनी संस्कृति को झुठलाता जा रहा है 
आइए हम संस्कृति के हर सोपान के बारे में 
गहराई से विचार करें और संस्कृति को संस्कृति 
बनाए रखने के लिए सच को स्वीकार करें ?

संस्कृति किसी की धरोहर नहीं होनी चाहिए 
और न हीं संस्कृति को हमलावर होना चाहिए 
हमारी संस्कृति उनकी संस्कृति से अलग होनी चाहिए 
जिन्होंने संस्कृति के नाम पर भ्रष्टाचार पाखंड दुराचार 
अख्तियार कर साम्राज्यवाद का नया परचम फहरा दिया है 
और उसी का नाम राष्ट्रीय साम्राज्यवाद और हिंदू रख दिया है 
हिंदू का मतलब केवल और केवल एक जाति का 
सांस्कृतिक  साम्राज्यवाद है
जिसमें वह राजा है बाकी सब प्रजा है ?



शर्म हया जिनको छू तक नहीं जाती।

शर्म हया जिनको छू तक नहीं जाती।
वो तो किसी के जीत का जश्न मनाते हैं
और सत्ता की मलाई खाते हैं।
संघर्षों से उनका क्या मतलब ?
उसके लिए जन्में ही नहीं है वो ।
कल तक तो थे वह यही इधर,
जो उधर का साज बजाते हैं।


आओ मिलकर हम जश्न मनाएं,
जब हार गया दुस्साहस है।
जिसको एहसासों की भी अनुभूति नहीं है।
जहां समझ की समझाइश का है घोर अकाल
जिसके कुल का 
जहां महाकाल लगा हो। 
दुश्मन का साम्राज्य वहीँ सजा हो।
अपनों के सपनों का डर न हो जिसको।
आखिर वह राजा कैसा ? 

कैसा शासक या है कुलनाशक।
उसका कैसा विश्वास सबल हो।
सत्ताबल का अभिमान प्रबल हो।
बड़े नाश का भाष और ज्ञान नहीं हो ।
जातियो की उसको पहचान नहीं हो ।
जातीयता का अभिमान नहीं हो।
समता का भी मान नहीं हो।
अपनों का भी ज्ञान नहीं हो।
कैसा शासक या है कुलनाशक।
-डा.लाल रत्नाकर

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

धर्म



धर्म की संवेदनशीलता को देखते हुए 
हमें अपना एक धर्म गढ़ना चाहिए 
जिसकी सारी मीमांसा का हक़ 
हमारा होना चाहिए ?



हमें अपना एक धर्म
और धर्मगुरु बनाना है
लेकिन यह धर्म
उस धर्म की तरह न हो
जो धर्म आपस में नफ़रत
फैलाने का सन्देश देता है
और भेदभाव करता है !

अब यह समझ में नहीं आ रहा
जब हमारे धर्म में यह सब
खूबियां आजाएंगी तब
हम उस धर्म का विरोध कैसे करेंगे
जो आमतौर पर आमजन को
आपस में लड़ाता है !

आइये हम एक
आमजन की संसद बुलाते हैं
जिसमें नए धर्म का
मशविरा लाते हैं ?
धर्म की शालीनता का
बंधुत्व और जाती विहीनता का
पाखण्ड से परे
नैतिकता का पोषक
शोषकों के विनाश
और समता समानता के
पैगाम का !

डॉ. लाल रत्नाकर 

सोमवार, 3 अप्रैल 2017

यह कैसा सरोकार है !

 डॉ.लाल रत्नाकर 

यह कैसी कतार है !
जो यहाँ बैठे हैं वे हैं क्या !
ये मनचले किसे पहचानते हैं ?
किसी की बीबी,बहन,बहू या बेटी को !
या अपनी बीबी, बहन या बेटी को !

वे मंत्री हों या अफसर
उनसे कौन सुरक्षित है ?
क्या यह चरित्र निर्माण है ?
हमारे राष्ट्रीय चरित्र का !
जहाँ जातियां देखकर ?

जिसे वे गढ़ रहे हैं नए हिंदुस्तान में ?
स्मृति ईरानी हो या मनुस्मृति !
इन्होंने क्या अपना चरित्र खो दिया है !
जिस तरह की राजनीती आ गयी है !
उसमें हमें एक नया स्वरुप दिख रहा है !
उस नए इंसान का !
सफेदपोश बेईमान का !

जहाँ आम आदमी खो रहा है ?
और खास आदमी नज़र आ रहा है !
जाती और पहचान का !
जनता के वोट नहीं मशीनें ?
अब सरकारें बना रही हैं !

इसीलिए आदमी नहीं
जातियां नज़र आ रही हैं
यह देश सेवक नहीं प्रधान सेवक
और मुख्य सेवक बोल रहा है
हम आ रहे हैं !


रविवार, 2 अप्रैल 2017

यह मशीने हमें आने नहीं देंगी ?

जब मशीने तय करने लगीं लोकतंत्र !
इसका आकलन अब कौन करेगा ?
वही जिसने लोकतंत्र में हार के डर से ?
तब लोक यहाँ से किस तरह गायब है !
क्योंकि जब शातिरों ने सोचा होगा उपाय ?
बदल डाला विश्वास करने लायक तंत्र ?
वोट का पत्र यानी मतपत्र क्योंकि वह !
बदल नहीं पाता निशान या अपना स्वाभाव !
हाँ इसे जबरिया डाला जा सकता है !
लूटा जा सकता है पर गलत नहीं होता ?
इसपर लगा दिया गया निशान ?
उसी मतपत्र ने बदल डाला था सत्ता का तंत्र
और जागरूक हो गया था जनतंत्र !
पर आधुनिकता और सुविधा के नाम पर !
बदल डाला जनतंत्र का चरित्र ?
हमें और हमारे विश्वास को बाध्य कर दिया है
सोचने के लिए नया ढंग !
जो विश्वसनीय हो !
नहीं तो यह मशीने हमें आने नहीं देंगी ?
क्योंकि यह करने लगी हैं षडयंत्र ?





गुरुवार, 23 मार्च 2017

सरोकारों का दम्भ

डॉ.लाल रत्नाकर
(चित्र ; कुमार संतोष )

सरोकारों का दम्भ या दम्भ का सरोकार !
इतिहास गवाह है दम्भ ही सत्ता का प्राण है !
दम्भ विहीन सत्ता सत्ता नहीं सुशासन है !
यदि सत्ता में हैं तो दम्भ उतना ही जरुरी है,
जितना शरीर में प्राण वायु !

सत्ता कैसी वैसाखियों पर टंगी हुयी है !
पाँव हैं नहीं ! दम्भ पाँव की जगह ले लिए हैं !
दम्भ जाते ही पाव ओझल हो जाते हैं !
वैसाखियाँ ही पाँव की तरह नज़र आते हैं !
जीतनी दिख रही होती हैं !

कई कई बार गिड़गिड़ा रही होती हैं बैशाखियां  !
वैशाखियां सहारा लेने के लिए या देने के लिए !
पर पाव पकड़कर गिडगिङाने की वजह क्या है
कहीं अपने ही पाँव पर खड़े होने के लिए !
वो उतनी ही कामयाब हैं !

वैशाखियां जिसके लिए जरुरी हैं उन्हें वह नहीं मिलती !
उन्हें मिलती हैं जिनको उतनी जरुरी नहीं है ?
ऐसा क्यों होता है अगर हम वाज़िब फैसले ले पाते !
तो क्या वास्तविक वैसाखिया या वैशाखियों की वास्तविकता ?
अब नहीं रह गयी है ?                        

बुधवार, 8 मार्च 2017

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर



दुनिया भर की
स्त्रियों के नाम
जिसमें
हमारी जननी
और
उनके पूर्व की
सल्तनत
बहने
और हमारी
धर्म पत्नी
बेटियां
बहुएं
और तमाम
बढ़ते जा रहे
रिस्ते
जिन्हें मात्र
सौंदर्य ही नहीं
संवेदनाओं
से जोड़कर
आदर्श और स्नेह की
डोर में बांधकर
अपार स्नेह ?
सहयोग
कष्ट और कुशलता
को अंगीकृत करते
पीढियां !
आज
तुम्हारा दिन है
वैश्विक क्षितिज पर
पर क्या ?
तुमने दुनिया को
समझा है
स्वार्थ से परे
कुछ और
बहुत कुछ सहा है ?
चलो आज दुनिया भर में
तुम्हारे नाम पर
एक दिन का
जश्न मनाने के लिए
मुक्कर्रर किया है
तुम्हे
हार्दिक शुभकामनाएं !

-डॉ.लाल रत्नाकर 

मंगलवार, 7 मार्च 2017

वोट के लिए नोट की !


क्या वास्तव में !
आचार संहिता 
के तले 
ही तो भाई  
बनारस में 
वोट के लिए नोट की 
कैसे सप्लाई हुई है भारी 
वहां किसकी थी जिम्मेदारी 
चौकीदार ने घाल मेल कर दिया 
क्या प्रधान सेवक के लिए ?
खेल कर दिया ?
यह नहीं पता की 
वीडियो बन रही है 
कर्मों कुकर्मों की सारी ?
यह तो बनती है !
चुनाव आयोग की 
जिम्मेवारी ? 

-डॉ.लाल रत्नाकर 

गुरुवार, 2 मार्च 2017

वह तो केवल मुखौटा है ?


डॉ.लाल रत्नाकर

वह  केवल राजनीती का ही क्षेत्र नहीं है ?
जहाँ समाज का सबसे कचरा जमा हो गया है।
और उसका मालिक केवल राजनेता ही हो गया हो !
और भी जगहें हैं जहाँ इस तरह के कचरे भरे पड़े है ?
जहाँ तक नज़र जाती है यह चारों तरफ हो रहा है ?
संत, सन्यासी, शिक्षक, चपरासी, प्रोफेसर, जन प्रतिनिधि और मंत्री,
कुलपति और मीडिया और न्याय की प्रक्रिया में कहाँ कहाँ की बात करें !
सर्वत्र, कचरा आ गया है क्योंकि वे नाक भौं सिकोड़ रहे हैं  ?
उन्हें लगता आरक्षण से काई की तरह वह छा गया है ?

उन्हें कौन बताये ये कचरा फ्राड और खास जाती वर्ग का ?
जो इस देश के तल में जमा हुआ है जब कोई हलचल होती है
तब अपनी शक्ति से सब कुछ कचरामय कर देता है ?
नहीं वह तो केवल मुखौटा है, उसके आका हर जगह बैठे हैं ?
समुद्र के तल में क्योंकि हमें तो समुद्र गहरा दीखता है !
और उसकी तलहटी तक जाने वाले को उसने साध लिया है।
तभी तो हम धीरे धीरे कुँओं को ढकते जा रहे हैं ?
जिससे कुंओं को खोदने वाले तह तक न जा सकें ?
और उन्हें हमारा सच न पता चल सके ?

तभी तो !
सदियाँ गुजर जाती हैं पाखण्ड को पाखण्ड समझते हुए !
पाखण्ड से पाखण्ड का उन्मूलन संभव नहीं है ?
राजनीती का पाखण्ड हो या धर्म कर्म का !
धर्म के पाखण्ड से जब बहुत जटिल हो गया है ?
राजनीती का पाखंड ?
वोट का गुणा भाग जड़वत और जहरीला हो गया है ?
हम जिसको उखाड़ने चले थे आज वही ताकतवर हो गया है ?
क्योंकि जब से आरम्भ हुआ है राजनीती का पाखण्ड  !
वह मा बाप से भी सबल हो गया है ?
मध्यकाल का इतिहास प्रबल हो गया है ?
सल्तनत का विदा हो जाना कितना सरल हो गया है ?
क्योंकि जबसे मुखौटों का चलन हो गया है।



  

बुधवार, 1 मार्च 2017

'युवा' संविधान !

युवा' संविधान !
-----------
(जब अराजकता इस कदर फैल जाए कुछ भी नियंत्ररण में ना हो।
हर तरफ से संविधान पर हमला हो रहा है तो आप क्या कहेंगे ?)
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अब यह देश खतरनाक मोड़ पर खड़ा है!
यहाँ का नेतृत्व एक ऐसे हाथ में आ गया है!
जो केवल बात ही बात करता है!
बल्कि उसके पीछे एक पूरी जमात है जो,
उससे इसी तरह की हरकत कराती रहती है !
क्योंकि इस बातूनी को नहीं पता की जो तुम्हें गप्पी की तरह!
इस्तेमाल कर रहे हैं उनकी पोल खुल चुकी है ?
और अवाम उनके खिलाफ हो गयी है ?
हां यह वही हैं जो तुम्हारे विरोध में खड़े हैं?
ये तो इस गप्पी को पकड़कर लाये हैं जो कह रहा है ?
हम दलित हैं, पिछड़ा भी और मुस्लिम भी।
और यह कह रहा है की सब हिन्दू हैं।
क्योंकि जो हिंदुस्तान में रह रहे हैं ?
और यह भी कह रहा है सूरज चाँद सब हमने बनाये हैं।
क्योंकि आज़ादी के बाद हम किसी तरह से आये हैं ?
यह बताने की अब तक देश में कुछ नहीं हुआ था ?
हमें बहुत कुछ करना है तभी तो?
अब हम आये हैं भ्रष्टाचार करके भ्रष्टाचार मिटाने
ये कैसे लोग हैं जो सदियों से केवल भ्रष्टाचार कर रहे थे ?
हम इस भ्रष्टाचार को शिष्टाचार में बदल देंगे ?
भले ही हमें इसके लिए संविधान बदलना पड़े ?
क्योंकि हमारी नज़र में संविधान बूढा हो गया है
हम कोशिस कर रहे हैं 'युवा' संविधान लाएं ?
जिससे आधी आवादी को तुरंत ठीक कर पाएं ?
क्योंकि हमारे ऋषिमुनियों ने यही किया था !
और आधी आवादी को उठने ही नहीं दिया था !
क्या दीखता नहीं उसका जंगली शेर घूम रहा है ?
क्योंकि उसे सीखंचों से मुक्त कर दिया गया है ?
उसके शावक भी खुल्ला हमलावर हो गये हैं।
शहीदों की संतानें उनके चरागाह हो गये हैं।
हम कैसे देश में रह रहे हैं।
अब यह देश एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है!
जहाँ का नेतृत्व एक ऐसे हाथ में पड़ा है !