शनिवार, 11 नवंबर 2017

हम लड़ेंगे तेरे झूठ से ।

चित्र : डॉ. लाल रत्नाकर (डिज़िटल स्केच)

हम लड़ेंगे तेरे झूठ से ।
तेरी मक्कारी और लफ़्फ़ाज़ी से !
अपने अन्त के अनन्तकाल तक !
तुम मुझे कमज़ोर समझकर या !
मजलूम समझ कर ठग रहे हो !

हम लड़ेंगे तेरे झूठ से ।
तेरी मक्कारी और लफ़्फ़ाज़ी से !
फसल के हर दाने की तरह!
तेरे रोग - भोग और तेरे हमले से।
यह धरती तेरी लूट की नहीं है।

हम लड़ेंगे तेरे झूठ से ।
तेरी मक्कारी और लफ़्फ़ाज़ी से !
क्योंकि हमने मेहनत की है इसमें।
आज से नहीं सदियों से!
मेहनतकस किसान की तरह !

-डा. लाल रत्नाकर

नोट के रंग बदलो ?

चित्र : डॉ. लाल रत्नाकर (डिज़िटल स्केच)

क्या?

हमारी मेहनत का हिस्सा।
उस लूट में शरीक है कहीं।
सब्जबाग और लफ्फाजी का।
हमारी भूख से मतलब है कहीं?
जनता से कोई सलूक है सही।


नोट के रंग बदलो ?
वोट के ढंग बदलो।
इससे देश नहीं बदलता।
इससे तुम बदल जाओगे।
मेहनतकश नहीं बदलता।
हमारी मेहनत का मतलब ‌।
तुम्हारी नफरत है या नहीं।

बात करते हो मेरी गरीबी की।
और लूटते हो उसके लिए।
हमारे अधिकारों का मतलब।
तुम्हारी सोहरत है हो चली।

तुम समझते हो अपने को।
दुनिया का सबसे काबिल।
हमें दो रोटियां नहीं मिलती।
तुम इतरा रहे हो इतना?
सूट और लूट पर उसके।

चलो तुमको भी झेलेंगे।
अकाल और सूखे की तरह?
भूख और बीमारी की तरह?
नौजवां की बेरोजगारी की तरह ?
वक्त की महामारी की तरह!

-डा.लाल रत्नाकर

मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

नहीं बदल सकते ?


क्यों तुम्हें डर लगने लगा है
चित्र ; डॉ.लाल रत्नाकर (डिजिटल)
वही डर गए हो
जहां से तुमने हुंकार भरी थी
क्या सचमुच तुम्हें डर लगने लगा है
मैं देखना चाहता हूं
वास्तव में जो लोग तुम्हें जानते हैं
उन्हें विश्वास नहीं होता
कि तुम वास्तव में डर गए हो
डर किसी और से नहीं लगता
डर तो अपने भीतर से दबोच लेता है
क्या तुम्हारे भीतर कोई डर
प्रवेश कर गया है?
वास्तव में तुम डर गए हो।
क्योंकि तुमने सच को अपने करीब।
आने ही नहीं दिया था।
और अब सत्य दूर बैठा।
तुम्हारे असत्य से खूब प्रसन्न है।
कि तुम्हारा डर सत्य से नहीं।
भयभीत तुम्हारे असत्य से ही है?
और असत्य से सत्य को
नहीं बदल सकते ?
और झूठ से दुनिया नहीं बदल सकते।
बदल सकते हो तो केवल
और केवल अपने रंग रूप
अपने अरमान और अपनी शान।
अगर तुम्हें लगता है वास्तव में,
कि तुम बदलना चाहते हो देश।
तो बदलो अपने झूठ और पाखंड के स्वभाव।

-डा.लाल रत्नाकर

गुरुवार, 26 अक्तूबर 2017

क्या आप हिन्दू हो सकते हो ?

चित्र : डॉ.लाल रत्नाकर
(डिजिटल स्केच)
आप मुस्लिम हो सकते हैं?
बौद्ध बन सकते हैं?
क्रिस्चियन बन सकते हैं?
सिख बन सकते हैं?
जैन हो सकते हैं ?
लेकिन!
क्या आप***********
नीचे जो लिखा है वह बन सकते हैं?
क्या कभी आप किसी को !
हिंदू कन्वर्ट (बनते) होते सुना ?
और यदि नहीं तो?
जो नया जुमला चल रहा है?
सबको हिंदू बनाया जा रहा है?
यह कितना सही है?
क्या वास्तव में बहन जी?
हिंदू ही हैं?
हम हजारों उनके अनुयायियों से?
यही तो पूछते हैं?
लेकिन वह कभी नहीं बताते?
कि वह हिन्दू हैं या दलित हिंदू हैं?
जबकि बाबा साहब भी!
हिंदू ही थे?
लेकिन उन्होंने बौद्ध धर्म?
क्यों स्वीकार किया था?
क्योंकि वह हिंदू होते हुए भी !
हिंदू होने पर गर्व नहीं कर पाए !
हां हमने देखा है?
तमाम पिछडों को हिंदू बनते हुए।
शादी ब्याह में?
सत्यनारायण की कथा में?
मंदिरों में?
या व्रत धारण करने में?
भूत प्रेत निवारण में?
भाग्यवाद में विश्वास करने में?
यात्रा करने में?
कुआं खोदने में?
कार पर सवारी करने में?
गृह प्रवेश में?
उठते बैठते हुए?
पांव छूते हुए?
और सबसे ज्यादा तो!
मृत्युभोज में ?
हिंदू बनते देखा है?
जिन्हें कभी वह हिंदू नहीं मानते!
हिंदू उन्हें अपने बराबर नहीं मानते।
उनके अधिकार नहीं देते।
वह सब समय समय पर हिंदू बनते रहते हैं।


-डा.लाल रत्नाकर

बुधवार, 25 अक्तूबर 2017

अड़के ! मिठास घोलता है।

चित्र : डॉ.लाल रत्नाकर
(डिजिटल स्केच)

उसको उम्मीद है कि हम उसे भुला देंगे।
हमारा मानना है कि उसको हमें याद रखना है।
उसको नफरत है इस बात की कि हम ,
उसपर और उसकी बात पर भरोसा नहीं करते।
क्योंकि ?
उसकी फितरत में जहर इतना ज्यादा है।
वह हर बात में बेबात में ज़हर घोलता है।
उसकी आदत  है ?
शहर भर में बेबात का बतंगड़ है।
कि वह अडियल है और 
अड़के ! मिठास घोलता है।
-डा. लाल रत्नाकर

मशक्कत करने वालों को !



चित्र : डॉ.लाल रत्नाकर (डिजिटल स्केच)

मेरी शोहरत पर पर्दा डालो!
मेरा अपमान जितना चाहो कर डालो!
मगर यह ध्यान रहे ?
भले ही जमाना बदल डालो!
शोहरत ऐसे ही नहीं मिला करती!
मेहनतकश की नियत यदि सच्ची हो।
अकारण जो उसे मेहनत नहीं कहते!
मशक्कत करने वालों को ! 
जिस युग में सराहा नहीं जाता।
वह है जमाना काहिलों का !
जिसे कभी सराहा ही नहीं जाता।
भले ही ख्वाब पा लो तुम?
कि तुम ने पा लिया जन्नत?
जिसे मांगा था तुमने मानकर मन्नत!
मेरी शोहरत पर परदा डालो।
भले ही कितना भी कीचड़ उछालो?
मेरे श्रृंगार को तुम रौंद डालो।
तुम्हें तब भी नहीं मिलती है।
रचनात्मकता !
जिससे मन में शांति रचती है।
-डा. लाल रत्नाकर

मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

आम जिंदगी

आम जिंदगी की मुश्किलें क्यों बढती जा रही हैं।
इसका कारण समझना होगा समय रहते हमको।
जीने के लिये बदल रहे है जो लोग अपने केंचुल।
केंचुल साँप का तो प्राकृतिक है पर हमारा केंचुल।

गुरुवार, 14 सितंबर 2017

जो सवाल हमें बार बार कचोटता है !


चित्र और कविता : डॉ. लाल रत्नाकर 
जिस बात को वह समझ रहा है
हमारे लोग क्यों नहीं समझ रहे हैं ?
यही तो सवाल है जो खाये जा रहा है
अब इसको समझाने के लिए ?
हमें नेता नहीं शिक्षक बनना होगा ?

हमारे लोगों ने एकजुट होकर
जब एक सामाजिक संगठन बनाया था
और उसी के बलपर हर जगह से
एक समुदाय के लोगों को मात दिया था
मत और सर्वसम्मति से हटाया था !

जो सवाल आज बहुत जटिल हो गया है
हमारे साथ खड़ा समाज उधर हो गया है
जिसे उसने हमारे साथ आकर हराया था
क्या हमने उसको अपने साथ सत्ता में
अदब और कायदे से बैठाया था ?

जो सवाल हमें बार बार कचोटता है
की सत्ता में तुम उसे हिस्सा देते हो
जो तुम्हारे लोगों का असली दुश्मन है
उस असली दुश्मन को गले लगाए हो !
क्योंकि तुम्हे अपने लोगों से डर लगता है ?

शनिवार, 9 सितंबर 2017

क्या कर रहे हो मेरे दोस्त !


क्या कर रहे हो मेरे दोस्त !
क्या तुम्हें पता है कि तुम क्या कर रहे हो ?
तुम्हें नहीं पता कि तुम क्या कर रहे हो ?
हजारों साल के संघर्ष को कुचलने वाले !
क्या उन आतताईयों के साथ खड़े हो !
जो सब कुछ तहस नहस कर रहे हैं !
क्या इनको पहचानते हैं ?
ये बहुत खतरनाक है ?

चलो शायद तुम्हारी समझ में तब आये ?
जब तेरे पास जलजला आ जाये !
भाग करके कहां जायोगे यहां से ?
जब सामत तुम्हारे पास आ जाये ?
मेरे दोस्त तुम बुजदिल तो नहीं हो ?
काश यह एहसास मेरा गलत हो ?
और आप अपनी जगह सही भी हों ?
पर नहीं पता कि तुम क्या कर रहे हो ?
क्या तुम्हें पता है कि तुम क्या कर रहे हो ?
क्या कर रहे हो मेरे दोस्त !

-डा.लाल रत्नाकर















ए मेरे दोस्त

ए मेरे दोस्त
तुम यह क्या कर रहे हो
कहां जा रहे हो
सचमुच तुम बेखौफ होकर के
जिस काम में लगे हो
वह तुम्हें कमजोर करता है
तुम राष्ट्रवादी नहीं हो
तुम्हें राष्ट्र का ज्ञान नहीं है।
तुम्हारी उर्जा तुम्हें।
वहां धकेल रही है
जहां से तुम्हारी कौम का
विनाश होना है।

और सदियों से
तुम्हारे जैसा युवा
अपने विनाश का कारण
बनता आ रहा है।
ए मेरे दोस्त ठहरो
तुम सदियों से
जिस व्यवस्था को ढोते आ रहे हो
वह दरअसल उनके लिए है।
जिन्होंने तुम्हारे विनाश के लिए
हजारों तरकीबें गढ़ी है
जिसमें से सबसे कारगर
सांस्कृतिक साम्राज्यवाद है
और इस साम्राज्य से
जब तक तुम नहीं लड़ोगे।
तब तक तुम इसी तरह के
विनाश का ध्वजवाहक
बने रहोगे क्या ?
जागो यह रंग
विकास का नहीं
बहुजनों के विनाश का है
अगर तुम्हें यह गलतफहमी है
यह तुम्हें धार्मिक बनाता है
तो बता सकते हो कि आज तक
तुम्हारे कितने लोगों को इस धर्म का
ठेका दिया गया है।
तुम्हारे पास कोई हिसाब नहीं है।
क्योंकि तुम कारिंदे हो
धर्म के उन ठेकेदारों के
जो तुम्हारा शोषण कर रहे हैं
तुम्हें धार्मिक बता करके।
मेरे मित्र
कभी विचार किया
कि तुम मनु के विधान में
कहां खड़े हो।
अपनी गलत जगह
पर नजर डालो
तुम्हें उन्होंने
उन्हीं के साथ रखा हुआ है
जिन्हें तुम शूद्र कहते हो।
मेरे मित्र
सदाचारी बने रहना है तो
आओ हम तुम्हें ध्वज देते हैं
जिसका रंग हरा होगा
उसमें समता और समानता होगी?
तुम्हारे श्रम की
खुशहाली होगी
और तो और
इस रंग से तुम्हारे अंदर
खुशहाली और संपन्नता का
विकास होगा
क्योंकि यह रंग
ईर्ष्या-द्वेष विकार से दूर रखता है
इसीलिए तो हर अस्पताल की खिड़कियों पर
यह चढ़ा रहता है।
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डॉ.लाल रत्नाकर

मंगलवार, 29 अगस्त 2017

दुर्भाग्य !


दुर्भाग्य !
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वो मेरे देश के दुर्भाग्य !
साधु संतों और बाबाओं!
ये माना कि हमारे ऋषि मुनियो
की कुदृष्टि स्त्रियों पर रही होगी
यह भी समझ में आता है कि
आज के प्रभावशाली नेता
इस दुष्कर्म से सने हुए हैं
लेकिन क्या यह उचित नहीं है
कि हम मानवता के विकास को
स्त्री यातना से मुक्त कर सकें।
संतो, बाबाओं तुम तो नहीं सुधरोगे
क्योंकि तुमने अपराध के उपरांत
यह रूप धरा है जिससे तुम्हारा
काला इतिहास छुपा रहे।
पर तुम उन पवित्र आत्माओं को
अपवित्र करने का षड्यंत्र कर रहे हो।
उसकी सजा संविधान में तो मौत ही है।
अब तो मौत से क्यों डर रहे हो।
मरने से पहले अपने भक्तों को
मरने के लिए आगे कर रहे हो!
धन्य हो संतो तुम धन्य हो।
और तुम्हें मदद करने वाले।
मानने वाले और धन्य है।
जो जुबान से तो अच्छी बातें कहते हैं।
लोग उनकी मोह माया में फस जाते हैं।
संतो कबीर बनकर देखो ना।
उनके बारे में तुमने ही तो फैला रखा है।
कि वह नाजायज रूप से पैदा हुए।
किसी विधवा ब्राह्मणी की औलाद हैं।
क्या सचमुच तुम्हारी मां इतनी बुरी रही होगी।
जिसकी औलादें तमाम माओं के।
चरित्र को कलंकित करने में।
अपना सम्मान समझ रहे हैं।
तुम्हें मारा जाना चाहिए।
क्योंकि तुम आसानी से मर नहीं सकते।
और यह भी उतना ही सच है
कि तुम्हें कानून से डर नहीं लगता ।
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-डा.लाल रत्नाकर

रविवार, 13 अगस्त 2017

अलविदा !

अलविदा !


हमने जिनको संवारा,
उनके खूबसूरत मन हो गए।
वो चमन हो गए।
उनको लगने लगा कि
वो मंदिरों के बुत हो गये।
उनके दर्शन भी अब तो
हैं बहुत मुश्किल हुए।
जैसे काशी मथुरा के
वे देवगन हो गए।
जिनको मैंने संवारा
वो चमन हो गए।
मैंने ठाना है कि
मैं ऐसे खड़ा ही रहूं
अपने हाथों में ऐसी ही पतवार ले
जब वो कश्ती समंदर के
जन हो गये।
डर है तूफां उन्हें
ले कहीं ना निगल ।
आज जिनके वशीभूत
अब उनके मन हो गये।
हमने जिनको संवारा,
उनके खूबसूरत मन हो गए।
वो खूबसूरत वतन हो गए।
वो चमन हो गये ।
हमने जिन जिनको संवारा,
---
डॉ. लाल रत्नाकर

बुधवार, 9 अगस्त 2017

तुम्हें बख्शेंगे नहीं


चलो चलें।
तू यहां से
बहुत दूर बहुत दूर!
इतनी दूर चलो
कि तुम्हें पहचान न सके 
लोग वहां जान गए तो
तुम्हें बख्शेंगे नहीं
बल्कि तुम्हारी खाल उखाड़ लेंगे
बाल की तरह
क्योंकि तुमने
लोगों की गाढ़ी कमाई को
लूट लिया है
ठग की तरह।
जब तुम्हें वह पहचान जाएंगे।
अब तुम्हारे आदर्श
धरे रह जाएंगे
आसाराम की तरह
आसाराम ने
बहुतेरे भक्त बनाए हैं
जिनका स्वभाव भी
उन्ही की तरह है।
तुम किस तरह के आसाराम हो।
अब तो तुम से
निराशा होने लगी है।
-डा.लाल रत्नाकर

या वर्ग बदल लो !


सिंहासन पहन लो
या मुकुट ओढ लो।
जाति बदल लो
या वर्ग बदल लो
समझ में तो सब आता है
यह सब क्यों कर रहे हो
और इतने ही ईमानदार थे तो
अपनी इमानदारी का
बेईमान सहचर क्यों रखा
इमानदारी का सर्टिफिकेट
बांटने वाले।
कहीं ईमानदारों को
सर्टिफिकेट की जरूरत होती है।
-डा.लाल रत्नाकर

देखो वह गरज रहा है।

देखो वह गरज रहा है।
गुस्से से या गुस्से में है
देखो वह गरज रहा है
बरबस वह गरज रहा है 
बरस रहा है कहां कहां!
देखा है तुमने उसे बरसते
फिर क्यों वह गरज रहा है
हद कर रहा है।

सारी सीमाएं तोड़ रहा है
संविधान को मरोड़ रहा है
लगता है यह कहीं से
टाइट किया जा रहा है
जल्दी करो, जल्दी करो
अगर तुम्हें लोग भाप लिए तो
सब कुछ चौपट हो जाएगा
और अगर तुम्हें जान लिए तो
तुम्हें मार डालेंगे।
उसे लोग मार न पाएं।
इसीलिए इतनी जल्दी में है
क्या इसीलिए वह गरज रहा है।


-डॉ. लाल रत्नाकर 

उसी तंत्र का करने चला है खून



तुम्हारे राज करने से हमें तकलीफ क्यों हैं ?
तुम्हारा राज आया तो उसी लोक तंत्र से है
तुम्हारा राज कायम है तुम्हारी बेईमानी से
कहो सच सच क्या तुम अब लोकतांत्रिक हो ?

छल फरेबों से बहुत आहत रहा है मुल्क ?
सदियों की गुलामी भी सहा है हमारा मुल्क !
तुम कोई पहले नहीं हो इस मुल्क के गद्दार !
पहले भी बहुत आये थे ठग यहाँ व्यापारी बन !

तुम्हारा व्यापारियों के संग कैसी सांठ गाँठ है
पता चलने लगा है अब यहाँ की दाल रोटी से
नमक खाकर यहाँ का वो ईमान के सौदागर 
बहुत खलने लगा है अब नया व्यभिचार सहकर !

तुम्हारी ताकतें तुमको कहीं अब कैद न कर लें
पडोसी की नियति से ही तेरा ईमान बिगड़ा है
मगर अफ़सोस है तू तो महाशतिर जो निकला ?
उसी तंत्र का करने चला है खून तुम अब तो !

-डॉ लाल रत्नाकर

रविवार, 6 अगस्त 2017

पशु हो कर कविता करता हूं


मैं पशु हूं
पशु हो कर कविता करता हूं
मेरी कविताएं इंसानों के लिए नहीं है
और पशुओं को कविताएं समझ में नहीं आतीं
इसीलिए इन कविताओं काे मंच नहीं मिलता
तभी तो हम सड़कों पर चौराहों पर
और गली मोहल्लों में कभी कभी
कविता पाठ करते रहते हैं
क्योंकि मेरे चरागाहों का
अतिक्रमण हो गया है
कहीं ग्रीन बेल्ट के नाम पर
और कई लोगों ने अपने घरों के सामने
घेर रखा है मेरे चरागाह !
मेरी कविताओं में किसी को भी
चिढ़ाने के लिए कोई शब्द नहीं होता
किसी को फसाने के लिए श्रृंगार नहीं होता
मेरी अपनी उपस्थिति बताने के लिए
केवल और केवल मेरा हुंकार होता है
यही मेरा अहंकार है।
क्योंकि आजकल मेरे रखवाले
चरवाहे नहीं है वह है
जो मेरे नाम पर लोगों की जान ले ले रहे हैं
अभी तो हमारी भाषा हमारी बोली
सब कुछ समझ में नहीं आती
हम प्रयास कर रहे हैं कि
कविता करते करते अपनी बात
लोगों तक समझा सकेंगे
जिससे लोग मेरे साथ खड़े हो
और जो मेरे नाम पर
लोगों को मार रहे हैं उनकी
असलियत का पता चल सके।
अभी भी मुझे डर है कि जो
मेरी कविता नहीं समझ पाएंगे
वह उनको नहीं समझ पाएंगे
जो हमारे नाम पर
लोगों को मार रहे हैं
इसलिए मेरी कविता को समझिए
और उसके प्रभाव से
लोगों के जीवन की रक्षा कीजिए।
मैं पशु हूं
पशु हो कर कविता करता हूं.


-डॉ. लाल रत्नाकर 

कितना असत्य होता है !


जहां नीयत भी अशुद्ध है !


वाह।
यह भी गजब का युद्ध है
जहां नीयत भी अशुद्ध है
हिम्मत हमारी हारने की
जीत में बदल रही है
आवाज मेरी कर्कश जो
गीत में बदल रही है
एहसास उम्र का अब
एहसास होने लगा है।
कितना यहां तुम्हारा है
अब तय हो रहा है
अनुभूतियों के बदले
अनुभूतियों को सह ले
है वक्त का तकाजा
बदला हुआ समय है
चुपचाप तू निकल ले
कुरीतियों को सह ले
यह भी गजब का युद्ध है
जहां नीयत भी अशुद्ध है।
---
डॉ. लाल रत्नाकर

हम लड़ेंगे !




हम लड़ेंगे
और पूरी ताकत से लड़ेंगे
जो मेरे साथ लड़ेगा उसे भी 
उसे यह एहसास होगा कि
वह लड़ रहा है
अपनी ताकत से
उस व्यवस्था के विरुद्ध
जो शक्तिहीन तो है
लेकिन उसकी शक्ति
तिकड़म में अंतर्निहित है
तुष्टिकरण से कैसे लड़ोगे
क्योंकि वह तुम्हारी हर मनोकामना को !
पूरी करने का प्रबंध करता है
और यही प्रबंधकीयता है कि
वह तुम्हें लड़ने नहीं देता
उस असत्य से
जिस असत्य से तू रूका हुआ है
वही तो तुम्हारा तुष्टीकरण है।
जिसे तुम संतुष्टि समझ बैठे हो।
लड़ो और पूरी ताकत से
क्योंकि बिना लड़े
तुम्हारा हक 
तुम्हारा अधिकार
तुम्हें नहीं मिलेगा।
लड़ो और पूरी ताकत से।

-डॉ. लाल रत्नाकर