शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

स्वाभिमान



स्वाभिमान सम्मान नहीं तो !
जीवन का मतलब ही क्या है।
जीवन ही यदि नहीं स्वतंत्रत तो !
उसका गौरव गान कहां है !
रोज-रोज का सहते सहते।
मानव का मनमाना व्यवहार।
करता है अपमान रोज ही।
जाति धर्म और राष्ट्र के नाम।
दलदल में जो फंसा हुआ है।
वह कैसे हो सकता महान।
लगने लगा आजकल हमको।
क्या वास्तव में है वह हैवान।
मानव मानव में करता है।
अंतर और निरंतर द्वेष।
अहंकार में भरा हुआ है।
अपराधों से तरा हुआ है।
रग रग उसका लगता है।
जैसे है वह दानव या हैवान।
मेरा देश महान मेरा देश महान

- डॉ. लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 11 जनवरी 2019

घातक हो हथियार ?


मेरा मॉडल, तेरा मॉडल 
कहते हो हमसे अच्छा है ।
चलो मान लेते हैं ?
पर तू झांको मन में !
अपने जीत हार से परे !
व्यापार और दुराचार में !
राजनीती का क्या सरोकार ?
शासन तंत्र को तहस नहश कर !
क्या कहते हो तेरा मॉडल ?
सबसे अच्छा है !
नहीं शिकारी वक़्त नहीं है ?
अभी सही कहने का !
है तेरा आगोश घिनौना ?
शावक को यह नहीं पता है !
उसकी केवल यही खता है !
शातिर की खातिर करने को !
घातक हो हथियार ?
नहीं बचेगा हमलावर हो !
जब तेरा प्रहार !

-डॉ लाल रत्नाकर 

माडल क्या होता है ।



मॉडल क्या होता है ? 
समझ में नहीं आता ?
समझने के लिये सबने !
राजनिती में एक माडल !
चुना था गुजरात माडल !

गुजरात के लिये वह माडल !
2002 में वह खास बना था !
जब वहॉ इसका प्रयोग हुआ !
तब दिल्ली में उसी कंपनी ने !
रिजक्ट करने के बाद चुना था !

उस कंम्पनी का सी ए ओ !
सेवा निवृत्त हो गया है !
और कर्मचारी सी ए ओ !
कभी कभी सी ए ओ नजर आता है !
मरा हुआ अपराध बोध से !

अपने ही प्रोडक्ट से डरा हुआ !
वही माडल तो चल रहॉ है !
स्वदेशी विदेशी का फर्क कहॉ है ?
पूरी दुनिया में बिकने के लिये !
दल बल से व्यापार चल रहा है !

देश का कानून और उसके रक्षक !
सब उसी माडल पर चल रहे हैं ?
नौकरशाह एजेण्ट सब नियंन्त्रण में है !
उद्योगपति भी गुजरात से है !
चौकीदार और उसके मलंग भी !

- डा.लाल रत्नाकर
(अभिव्यक्ति की आजादी और समकालीन / तत्कलीन राज्य पर आधारित)

गुरुवार, 10 जनवरी 2019

आर्थिक आरक्षण कहाँ से आ गया है।


आर्थिक आरक्षण कहाँ से आ  गया है। 
तुम्हारी मानसिकता को क्या हो गया है। 

संविधान की वास्तविक मंशा से विज्ञ हो ?
नहीं तुम आर्थिक आधार ही जानते हो !

क्योंकि तुम्हारा व्यवसाय आर्थिक ही है !
तुमने आर्थिक सत्ता की जड़ रखी है !

पूँजीपतिओं के गुलाम आज़ाद तो हो !
हम तुम्हे चुनौती देते हैं तुम आओ !

चुनाव में हम तुम्हे देखेंगे आने दो  !
जुमले नोटबंदी नौकरियां  और नाकामी !

आर्थिक आरक्षण से नहीं दबेगा !
भारतीय संविधान की मंशा को जानो !
आर्थिक आरक्षण कहाँ से आ  गया है। 

-डॉ लाल रत्नाकर 

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

वर्ष 2019 और हम !

नये वर्ष के 
चहल पहल में 
शामिल हैं हम सब 
जो गाफ़िल हैं
नये साल में !

सत्ता से बाहर हैं
सत्ता के भीतर हैं
मगर देश और राज्य से
नित नित वादा करते हैं
ठगते ही रहते हैं ।

हम समय काल से
लूट के माल से
तौबा तौबा करते हैं
वह उनको यह उनको
शातिर कहते हैं ।

डा.लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

हमें कुछ कहना है



हमें कुछ कहना है !
मगर ऐसा कुछ नहीं कहना !
जिसमें लेश मात्र भी सच न हो ?
मुझे कुछ कहना है !
मगर मुँह से कुछ नहीं कहना है !
मुझे कुछ कहना है !
अपने इन चित्रों के माध्यम से !
मेरा मानना है ,
अपनी रचनाओं के माध्यम से !
सच कहना है !
एसा सच जो !
हर वह व्यक्ति समझ सके !
जिसे छल प्रपंच नहीं आता !
लूटपाट और पॉखंड !
न करता है और न जानता है !
उनके लिये रचना है !
और कहना है !

-डॉ.लाल रत्नाकर

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

किसका राष्ट्र !


हमारी नीतियॉ । 
राष्ट्र के उपयुक्त हैं या नहीं ?
कैसा राष्ट्र ? किसका राष्ट्र ?
जो मनुस्मृति को संविधान मानता है ?
या जो संविधान को संविधान मानता है ?
या वह जो न संविधान के बारे में 
और न मनुस्मृति के बारे मे ?
या दोनों को ही नहीं जानता है ?
उसका राष्ट्र ?
यह भ्रम है जिसे न वह जानता है ?
और न ही जानना चाहता है ।
रोटी कपड़ा और मकान ?
उसकी ज़रूरत नहीं है !
वह कट्टर हिन्दू बनना चाहता है।
उसका राष्ट्र !

-डा.लाल रत्नाकर

संघर्ष


हम मेहनत कर रहे थे।
वह मेरी मेहनत का मुनाफा ले रहा था।
हम उसके कर्जदार हो रहे थे।
वो मेरे श्रम पर मालदार हो रहा था।
हम कंगाल हो रहे थे।
वह सत्ता और शक्ति संभाल रहा था।
वे कर्ज से आत्महत्या कर रहे थे।
वह जज की कुर्सी पर बैठकर !
लंबे समय मुकदमे में उलझा रखा था ।
अधर्मी उसे धार्मिक बना रहा था।
जो अधर्म में डूबा तांडव मचा रहा था।
हम मेहनत कर रहे थे।
वह मेरी मेहनत का मुनाफा ले रहा था।
हम उसके कर्जदार हो रहे थे।
हम उसके बुत बना रहे थे।
और हमें वह बुत बना रहा था।
फर्क इतना था हम इंसान थे।
वह हमें बेईमान बना रहा था।
जबकि बेईमानी करके ?
वह साम्राज्य खड़ा किया था।
डॉ . लाल रत्नाकर

नफ़रत भरते फिरते हो !



                                                           

आवाज़ दो हम एक हैं
हम एक हैं हम एक है ।
हम आज़ाद है ।
हम आबाद हैं ।
बर्बादियों के चक्रव्यूह में
तुम हमको डाल दिये हो ?
मालिक हो या मवाली हो !
तुम कितने खाली ख़ाली हो ।
सर्वज्ञ बने फिरते हो !
नफ़रत भरते फिरते हो !
तुम शक्ति नहीं ?
शैतानी के पोषक हो !
शोषक हो ?
कहते हो तुम पोषक हो !
संशाधन का घालमेल कर !
संविधान का रेल पेल कर !
जनता के कैसे सेवक हो ?
जनता भोली भाली है !
पर यह सब चाल जानती है !
रग रग पहचानती है ?
झूठ फ़रेब मक्कारी की !
यह पब्लिक है !
सब जानती है !
डा. लाल रत्नाकर

गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

इवेंट्स मैनेजर !

चित्र : रत्नाकर 

बात ईवेंण्टस की नहीं है ईवेंण्ट्स मैनेजमेंण्ट की है !
आपकी क्षमता, हैसियत की लोकप्रियता की नहीं !
यह भूल भूल नहीं होती भूख होती है भीतर के झूठ की !
जिसे पूरा करता है इवेंट्स मैनेजमेंण्ट कहीं भी कभी भी !

हमारी जनसभाएँ शादी ब्याह स्वत: होती है अतिथियों की !
श्रोताओं की नाते रिस्तेदारों और बारातियों के समूह की !
मगर इवेंट्स मैनेजमेंण्ट सभायें शादी तो कभी भी कहीं भी !
आयोजित करा देते हैं जिसमें वो लोग नहीं होते जिन्हें हम ?
अपना कहते हैं ?

ज़रूरत तो है यह सब समझने की लाल बुझक्कड की तरह !
सपने वादे इरादे विश्वास सब हमें क्यों और कौन दे रहा है !
क्यों क्योंकि उसने जब सब कुछ हासिल ही किया है झूठ से !
झूठ और पाखण्ड का ही तो साम्राज्य चला रहा है हथियाकर !

डॉ.लाल रत्नाकर





मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

मनुस्मृति के प्रकोप को संविधान से धोकर !

चित्र : डॉ.लाल रत्नाकर  (एच यल दुसाध की पुस्तक)
नए वर्ष के एक एक दिन कम होते गए !
हम फिर इंतज़ार कर रहे हैं नव वर्ष का !

पिछली बार हम सब ने जो योजनाएं बनाई थीं !
कितनी पूरी हुई इसका लेखा जोखा कर रहे है !

हम नए की उम्मीद में पुराने होते गए प्रतिदिन !
इंतज़ार, व्यापार, लाचार और न जाने क्या क्या ?

विकास अब तो तू झूठ का पुलिंदा हो गया है !
क्योंकि संविधान पुराना हो गया है और "मनुस्मृति"?

"मनुस्मृति" नयी नवेली दुल्हन की तरह ड्योढ़ी पर !
कहारों ने नहीं पाखंडियों ने लाकर रख दिया है हमारे  !

वह नंगा नाच रही है "जलेबी" फिल्म की नायिका की तरह ! 
और हीरो डरे हुए हैं इस उम्मीद में की कहीं उनको भी !

अब फिर नया वर्ष आ रहा है संविधान कराह रहा है !
आरोप गढे जा रहे हैं और चौकीदार मृदंग बजा रहा है !

धीरे धीरे समय जा रहा है संविधान वापस आ रहा है !
अब नए वर्ष की ड्योढ़ी पर सजग रहने की जरुरत है !

जरुरत है मनुस्मृति के प्रकोप को संविधान से धोकर !
गोबर से लीपकर वापस संवैधानिक नियम को लाना है !

एक जुटता से पाखण्ड मिटाना है यह संकल्प दोहराना है !
संविधान बचाना है ! संविधान बचाना है !संविधान बचाना है !

सांस्कृतिक साम्राजयवाद मिटाना है इससे पीछा छुड़ाना है 
नया सबेरा लाना है, नया सबेरा लाना है, संविधान बचाना है !

-डॉ.लाल रत्नाकर 


शनिवार, 15 दिसंबर 2018

क्या उन्हें पता है हमारा मुकाम !


कहाँ ले जा रहे हैं हमारे शासक !
क्या उन्हें पता है हमारा मुकाम !
शायद नहीं उन्हें केवल पता है !
अपने उन भक्तों का ही मुकाम !
जो आँख मूंदकर गा रहे हैं गीत !
इनमे मुख्य रूप से वे लोग हैं !
जिनकी जाति, धर्म और लोभ !
समेटे हुए है संविधान के खिलाफ !
वे अटके हुए हैं झूठे वादों के साथ !
उन्हें कहाँ पता है आज़ादी का अर्थ !
क्योंकि वो जो हैं मानसिक गुलाम !
उनकी शिक्षा बेशक मैकाले की !
मा. मैकाले की शिक्षा पद्धति की है !
आश्रम व्यवस्था की शिक्षा पद्धति का !
कैसा कैसा रहा है कमाल !

-डॉ.लाल रत्नाकर 

सोमवार, 10 दिसंबर 2018

सत्ता के साथ !


राज या राज्य ?
राज जिसे छुपा कर रखा जाता है 
राज्य जो हथियाया जाता है ?
पुरुषार्थ से, धूर्तता से और आजकल !
ईवीएम से ?

यह राज बना हुआ है 
जनता के सामने ?
पर राज्य तो इसी से मिलकर बना है !
क्योंकि वह निरंन्तर कह रहा है !
हमारी जीत तय है।

क्या उसका विश्वास विश्वसनीय है !
और यदि नहीं तो वह कैसे कह रहा है !
इतने विश्वास के साथ !
उसके हाथ लम्बे हो गए हैं आजकल !
सत्ता के साथ !

-डॉ. लाल रत्नाकर 

प्रतिभा


प्रतिभा
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जिंदगी के इतने आयाम हैं
जिसमें कला रचना भी शामिल है
इसलिए निराशा कारण नहीं है
निराशा इस बात की है कि
जो लोग विराजमान हैं
गद्दियों पर !
कैसे कहूं कि बेईमान है।
कोई कारण नहीं बनता
उन्हें ईमानदार कहने का!
क्योंकि देश हजारों वर्षों से
मेहनतकश लोगों का सम्मान,
क्यों नहीं करता ?
क्या इसका कोई जवाब है ?
आपके या किसी के पास ?
इसलिए बार बार यह कहना
अच्छा नहीं लगता !
कि बेईमानों के बीच में!
हमें रहना पड़ता है !
और वे चाहते हैं कि चुप रहें ?
उन्हें लगता है कि वह आहत हैं।
उन्हे आहत करने का हक !
किसी को नहीं है क्योंकि ?
जैसे अपराधी वह नहीं !
कोई और है?
वह कौन है जिसे सालों साल !
तक ढूढा नहीं जा सका ?
और तलाश जारी है।
चोर चिल्ला चिल्ला कर !
कह रहा है !
चोर पकडे जायेंगे ?
हर हाल में !
उसके साथी तालियां बजा बजाकर !
नाच रहे हैं।
डा. लाल रत्नाकर
(चित्र:डा. लाल रत्नाकर)

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

कैसा विकास !


जो कह रहे हैं विकास हो रहा है।
जरा उनसे पूछो विकास की परिभाषा क्या है?
वह  परिभाषा के नाम पर टुकुर-टुकुर निहार रहा है।
ऐसा विकास जिसमें सब कुछ ध्वस्त हो गया है।
मगर ?
उनसे विकास का क्रम पूछो !
तो कह रहा है कुछ तो हो रहा है।
उसके कुछ के पीछे !
उसकी जात उसका धर्म !
और उसकी बेवकूफी की !
बहुत अच्छी माप हो रही है।
यह कैसा विकास है ?
जो एकतरफा हो रहा है।
पूंजीपति सरकार को नियंत्रित कर रहा है ?
और सरकार गरीबों को मार रही है।
वही सरकार पूजीपतियों को देश की सारी संपदा सौंप रही है।
जनता की जेब काटने के लिए ?
नोट बंद कर रही है।
और नोटबंदी करके !
नोट की हेराफेरी कर रही है।
कहती है हम बनिए हैं ?
बनियों की सरकार है !
तो बनियागिरी करेगी ही।
बनिया !
सरकार चलाने के लिए नहीं होता?
बनिए का काम व्यापार होता है।
यह व्यापार ही तो कर रहे हैं?
सरकार तो कोई और चला रहा है।
कोई और चला रहा है।
यह तो केवल अक्कड़ बक्कड़ ।
बता रहा है।
लाल बुझक्कड़ जैसा!
माहौल बना रहा है!
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डा.लाल रत्नाकर

गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

चालाक !


जिनकी चालाकियों ने एहसास को समेट दिया !
मानवता के मूल्यों को वह जहर में लपेट दिया !
ऊँची ऊँची बातों ने नीची हरकतों में लपेट दिया !
समूह को बाटकर सबकुछ समेटकर लपेट दिया !

हरकतें उनकी उन्हें मुबारक जो हमारे काम की न रही !
लबे अंदाज उनका बहुत शातिराना है !


-डॉ.लाल रत्नाकर 


गुरुवार, 29 नवंबर 2018

किसी से छुपा नहीं है ?


आजकल दौर चल रहा है ?
अजीबो-गरीब !
हर व्यक्ति दोष दे रहा है 
पिछली से पिछली व्यवस्था को?
और अभी भी उम्मीदें पाले हैं 
मौजूदा तंत्र के कुतंत्र से।

और मौजूदा तंत्र के निरंकुशता की ?
पडताल कौन कर रहा है।
वह जो कुछ कर रहा है?
किसी से छुपा नहीं है ?
उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता?
जो लूट लिए हैं देश को।
लेकिन वो।
जो सदियों से कष्ट झेल रहे हैं।
कष्ट तो उन्हें होता है।
जो सदियों से आनंद ले रहे हैं।
जाति का
धर्म का
देश का
सत्ता का
और सत्ता के सुखद !
आनन्द का।
जरा उनके हालात में
एक बार आओ और देखो।
तुम्हें कैसा लगता है।
कि तुम्हारे साथ?
क्या क्या हो रहा है।

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-डॉ.लाल रत्नाकर 

बुधवार, 28 नवंबर 2018

अपवाद नही !


दुर्भाग्य ही है इस समय समय का !
चारों तरफ़ बड़ा जमावड़ा हो गया है !
मवालियों और बवालियों का ?

सरकारी ग़ैर सरकारी संस्थानों पर !
क़ब्ज़ा जमा लिया है मवालियों ने ?
वक़्त का दरअसल खेल है !

समीकरण तो बन ही जाते हैं गणित में !
जनता को ज़माने से ठगने के लिये जग में !
यही तो मौक़े की तलाश है ?

स्वप्न दिखा रहा है घूमघूम कर मवाली !
बहला रहा है चिढ़ा रहा इतिहास को ?
कैसा है यह नक़ली खिलाड़ी ?

- डा. लाल रत्नाकर

रविवार, 25 नवंबर 2018

मेरे बाबू जी !

जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा था !
शायद आपको उसे पूरा कर रहा हूँ !

आपको बहुत याद करते हैं घर आकर काश !
आज आप होते ! तो मैं आपके क्षत्रछाया में !
यह एहसास कर रहा होता कि मेरे ऊपर भी !
हाथ है विश्वास का और हम बँधे है उससे ही !

वही तो थे जो बॉधे हुये थे समाज को हाथों से !
हमारे बाबू जी ही थे जो सबको गले लगाते थे !
जिन्होंने उन्हें देखा जाना था उनमें सबसे ज़्यादा !
मेरी मां है जिसे सबने किनारे कर दिया है आज !

काश मेरे बाबू जी होते आज तो वह कुछ करते !
क्योंकि उनके मन में सबके लिये जो सम भाव था !
थे वह निश्छल विकार रहित वट वृक्ष की तरह !
उसे ही काट डाला जिन्हें सर्वाधिक छाया दी थी !

जो जानते थे परिवार और उसे संभालना निर्विकार !
जिसे तहस नहस कर डाला उन्होंने जिन्हें सींचा था !
अपने हाडतोड श्रम ख़ून और पसीने से दिन और रात !
उनके विश्वास को ही तो तहस नहस कर डाला ?

जिस जिस पर उन्हें भरपूर भरोसा था ?
जिसपर सबसे ज़्यादा करते थे विश्वास !

- डॉ.लाल रत्नाकर 


शनिवार, 24 नवंबर 2018

हम आैर हमारा समाज ?


हमने जिससे बेइंतहा मुहब्बत की है ?
सदियों से और जन्म जन्मान्तर से !
पर क्या वह मुहब्बत कहीं बाक़ी है ?
रिस्तों में भावनाओं में या हक़ हूकुक में ?

नहीं मेरे स्वार्थ ने सब हड़प लिया है !
अपने पराये के रिस्तों के हक़ और !
नियति के किये कराये क़ानूनी दॉव पेच !
सब डरे हुये हैं तुम्हारे डरावने डर से !

कभी तो सोचते इंसान की नियति से !
उपकार की नियति या विनाश की मंशा !
सदाचार करना और केवल दिखाना 
दोनों ख़तरनाक खेल है अंतर्मन का !

चलो अब ज़रा त्याग की बात करें !
उसकी नियति का पर्दाफ़ाश का एहसास करें !
हवा बदल गयी है यहॉ की आज़ादी की !
हर शख़्स यही समझता है वही तो मालिक है !

डॉ.लाल रत्नाकर