बुधवार, 20 मई 2026

यह श्रमणों का देश, ऐसा यहां संदेश।

 

यह श्रमणों का देश,
ऐसा यहां संदेश।
जीवन के मोड़ों पर। 
महापुरुष मिले 
किया अनुसरण जिनका। 
मगर ठगों के बेस में,
अपने ही परिवेश में, 
मिले बहुरूपिये के वेश में ।
जब तक उन्हें पहचानें
ठगी कर गए अनेक ।
उनको क्या-क्या नाम दूं या नाम लूं।
यह सवाल जो बना हुआ है। 
उत्तर है अनेक?
जो समाज बारात के लिए 
सजा हुआ है। 
क्या उसको पता है ?
'बाराती का मूल्य ?
एक प्लेट भोजन होता है। 
स्वाद के लिए कुछ और व्यंजन।' 
उसका कर्मकांड से 
पाखंड से अंधविश्वास से। 
चमत्कारिक संबंध होता है। 
वह नहीं समझता। 
जीवन के मूल्यों को। 
क्योंकि उसका विश्वास है,
ठगों के आसपास।
चक्कर काटता रहता है।
ऊन ठगों को प्रणाम।
साधुबाद कि उन्होंने 
ठगों पर नियंत्रण बनाए रखा है।
जो हैं आपके आसपास।
परिवर्तन तो चाहते हैं। 
लेकिन ठगी में।

-डॉ.लाल रत्नाकर

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