बुधवार, 15 जून 2016

अराजकता


चिन्ता का एहसास !
किसी की मौत से नही है।
अभी उनके मारे जाने की खबर दी गयी है।
मारा नही गया है, राय ले रहा था हत्यारा।
दूसरे हत्यारे से, हत्यारे किससे डरा रहे थे।
पलायन हिन्दुओं का, हत्यायें मुसलमानों की।
चिल्ला रहा है सत्ता का लोलुप ।
सत्ताधारियों तुम्हारे मुकाम पर ।
मंुह बाये खडी है।

और तुम्हारे गुंडे !
जमीनें हड़प रहे हैं !
पीड़ित की व्यथा बढ़ा रहे हैं !
जो तुम्हे माला फूल चढ़ा रहे हैं ! 
क्या सचमुच तुम राजा हो !
या कंश की तरह राज्य कर रहे हो ?
-  डॉ लाल रत्नाकर  



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