मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

सामाजिक सरोकार की देहरी !

सामाजिक सरोकारों की देहरी पर
पहुंच करके देखना एक बार जरा
तेरा एहसास बदल जाएगा।
इनके विकास का पता चल जाएगा।
वादों की उम्मीदों में जिंदगी गुजर गई।
नए जुमले सुना के तेरी जिंदगी सुधर गई।
मेरे भाई मेरे आका मेरे काका जरा ?
झाको अपने दामन में तुम्हारा इतिहास
तुम्हारा भूगोल सब समझ में आ जाएगा !
चलो मेरा तो यह कर्तव्य है जो संविधान प्रदत्त है।
पर तेरी किताब में तो हमारे लिए।
सब कुछ वर्जित है।
उस किताब को तुम संभाल कर रखो।
और ईमानदार हो तो उसे आग के हवाले कर दो।
होलिका जलाने की प्रवृत्ति तुम्हारी है।
मनुस्मृति हमसे क्यों जलवाते हो ।
जला दो मनुस्मृति की होली।
बदल जाएगी तुम्हारी जिंदगी और बोली।
जरा देखो वक्त तुम्हें पुकार रहा है।
और तुम्हारी हरकतों से तुम्हें धिक्कार रहा है।
और तुम हो कि दहाड़ रहे हो।
अपनी नफरत अपनी मानसिकता।
तुम कैसे छुपा रहे हो।

 -डॉ लाल रत्नाकर

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