सोमवार, 23 सितंबर 2024

जिसके साथ आपका उठना बैठना है


जरूरी नहीं है 
आप भी उतने ही बुरे हो जाओ 
जिसके साथ आपका 
उठना बैठना है ।
यह भी जरूरी नहीं है कि
जो आप सोचते हो 
वही सही हो 
क्योंकि मुझे लगता है 
जो मैं सोचता हूं 
वह सही नहीं है।
आज के लिए, 
आजकल के लिए 
परिणाम का इंतजार 
गीता में मना किया गया है। 
कर्म पर जोर दिया गया है।
किस तरह का कर्म 
सद्कर्म या दुष्कर्म ?
यह सवाल हमेशा जिंदा रहता है 
उनके मध्य जो सफल दिख रहे हैं, 
असफल होते हुए। 
असफलता की पहचान 
किस तरह से करनी है यह, 
विषय भी उतना ही गूढ़ है।
जितना अच्छे और बुरे का निर्णय। 
सफलता आपके चरण चूम रही है। 
असफल समाज के मस्तक पर। 
तिलक, रक्षा के धागे, जनेऊ।
मिल जाएगा जन-जन तक। 
जिनका मन नहीं मिलता,
सच से रूबरू हुए बिना।
जरूरी नहीं है आप भी 
उतने ही बुरे हो जाओ 
जिसके साथ आपका 
उठना बैठना है.

-डॉ लाल रत्नाकर


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