शुक्रवार, 2 जनवरी 2026

उसने ! फोन करना ही बंद कर दिया।

 

उसने !
फोन करना ही बंद कर दिया। 
इससे पहले भी !
कई बार बंद किया था। 
पर फिर करने लगा था। 
उससे फोन पर जो जो ....
बातें होती हैं। 
उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता? 
बहुत सारे लोग उसकी बातें सुनकर !
होशो हवास खो देते हैं।
और उसके मुरीद हो जाते हैं।
मैंने उसे बार-बार कहा है। 
मैं एक आदमी हूं। 
और ऐसा आदमी!
जो आदमी को आदमी ही...
समझता है। 
वह बार-बार यह ?
समझाने की कोशिश करता है! 
हर आदमी ! 
आदमी नहीं होता? 
आदमी के रूप में उसके कथनानुसार !
जो जो होता है ?
उसे सार्वजनिक !
नहीं किया जा सकता!
फिर भी वह जब फोन करता है! 
जब वह फोन करता था! 
तब मुझे उसकी !
वही प्रवृत्ति स्मरण हो आती थी !
या तो यह आदमी नहीं है? 
या उस आदमी की तरह है ?
जिसे वह जो जो नाम देता है। 
या देता रहता है !
मैं छांट नहीं पाता कि ?
इस बार उसे किस वर्ग में रखूं।
फिर भी जब बात खत्म होती है। 
तो काफी राहत होती है। 
इसलिए फोन करने की सावधानी। 
के चक्कर में फोन करना ही। 
कम होता जा रहा है।
अब तो वह लोग भी फोन नहीं करते !
जो दिन में कई बार किया करते थे। 
सुबह शाम तो करते ही थे। 
कई बार उसकी बात सही लगती है। 
लेकिन अक्सर गलत लगती है। 
सबसे गलत तब लगी थी। 
जब वह नए-नए संबंध ! 
गढ़ रहा था।
और पुराने संबंधियों को? 
न जाने क्या समझ रहा था? 
काश वह अब फोन 
बंद ही रखता।
क्योंकि अब डर लगता है। 
कहीं उसका फोन फिर न आ जाए !
-डॉ लाल रत्नाकर

आतंकवाद !

 

आतंकवाद ! 
की बहस रुक गयी है क्या ?
सुनाई नहीं पड़ता अब आतंकवाद ! 
कौन है वह आतंकी या आतंकवादी ! 
कहाँ चले गए वह देश छोड़ कर ? 
उनकी पहचान धर्म, जाति, राष्ट्रवाद ! 
हुआ करती थी, जो पृष्ठभूमि में चली गई है 
और उसे डरावना बना दिया गया है !
परंतु वह छाया आम आदमी की 
स्मृति में कायम है अखण्ड पाखण्ड की तरह ! 
जिन्हें डरा दिया गया है क्यों ? 
क्या उनका इस देश के संविधान में 
इस देश की खुशहाली में 
इस देश के उद्योग धंधे में 
या सांस्कृतिक विरासत बचाने में 
अपने लिए श्रम से रोटी कमाने में 
कोई विश्वास नहीं है 
या कोई योगदान नहीं है !
क्योंकि जो अपराधी और 
सीनाजोरी से परोस रहे हैं 
ऐसा अवैज्ञानिक आतंकवाद 
ऐसा पाखण्डवाद, अन्धविश्वास 
और चमत्कार ।
पाखण्डवाद और आतंकवाद में क्या फर्क है ? 
फर्क तो समझने का विचार है ? 
जो बाबा साहब और बुद्ध का आचार है ! 
वही स्वतंत्रता का विचार हमारा संविधान। 
धर्म, जाति, मज़ हब, मानवता के खिलाफ है |
- डॉ लाल रत्नाकर

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2025

बात इतनी सी ही है, जो समझ आ जाए तो।


बात इतनी सी ही है, 
जो समझ आ जाए तो। 
तब बात बन जाएगी, 
यदि बिगड़ जाए तो! 
बात कितनी भी बड़ी हो !
यदि समझ ना आए तो।
वह तो यही चाहते हैं। 
वो जो बेईमानी कर रहे हैं।
जो हम कह रहे हैं। 
वह नहीं चाहते वह,
जो जो सच कह रहे हैं।
उनको दुश्मन लग रहे हैं।
जिनका हक मारना, 
बन गया धर्म है उनका !
बात कैसे बनेगी ?
अब तो समझ जाइए।
बात इतनी सी है ।
जो समझ आ जाए तो।
समय रहते बात बन जाये।

-डा.लाल रत्नाकर

शनिवार, 20 दिसंबर 2025

जब कहीं मूर्खों की जमात इकट्ठा हो जाए तो !



जब कहीं मूर्खों की जमात
इकट्ठा हो जाए तो !
उसे एक नाम दिया जाता है!
जो सहजतयॉ स्वीकार्य ही नहीं होता॥
बल्कि उस पर वह थिरक रहे होते हैं।
क्योंकि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी
अपने पाठ्यक्रम में!
ऐसे-ऐसे कोर्स शामिल करती है !
जिसे केवल फॉरवर्ड करना होता है॥
जैसे आज कल के प्रकाशन ?
परीक्षा उत्तीर्ण करने के बुकलेट तैयार करते हैं?
मूर्खों की जमात तैयार करने के लिए !
क्योंकि अब पढ़ने की ज़रूरत नहीं रही ! 
इसलिए पढ़ने की ज़रूरत नहीं रही !
जिसे फॉरवर्ड करने से पहले पढ़ लिए जाते !
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के संदेश !
काश हमारी समझ ?
नासमझी में न बदल गयी होती !
जब कहीं मूर्खों की जमात
इकट्ठा हो जाए तो !

-डॉ लाल रत्नाकर

मेरे शुभचिंतकों एवं अशुभ चिंतकों!


मेरे शुभचिंतकों !
एवं अशुभ चिंतकों! 
मुझे नहीं पता कि 
मैं यह सवाल !
आपसे क्यों कर रहा हूं? 
क्या अब सोचना बंद कर देना चाहिए?
अच्छे बुरे का भेद भूल जाना चाहिए? 
या आंख मूंदकर 
यह मान लेना चाहिए। 
कि समाज को किसी की जरूरत नहीं है। 
पिछले दिनों मैंने कोशिश की थी! 
आज भी निरंतर कोशिश करता रहता हूं। 
एक ऐसी सोच का जो !
सांस्कृतिक समाजवादी हो !
उसका विस्तार हो। 
मैंने देखा है वह विस्तार कैसे !
विनाश की लंबी यात्रा कर चुका है। 
अब कहां है कुछ पता नहीं। 
किसके साथ है यह भी पता नहीं। 
उसकी पहचान क्या है कुछ पता नहीं। 
यदि उसके नेता होते तो ! 
क्या वह ऐसा करते?
मानवतावादी विचार को छोड़कर! 
अखंड पाखंड के जुलूस में शामिल होते? 
तो इतिहास की इस बड़ी ग़लती पर !
वह मौन रहते !
यह सवाल आपसे करते हुए। 
अपने से डरते हुए। 
जवाब चाहता हूं। 

-डॉ.लाल रत्नाकर

बुधवार, 17 दिसंबर 2025

एक अदद आदमी ही बचा था


एक अदद आदमी ही बचा था 
दुकानों में सजे सामान की जगह!
बड़ी बड़ी दुकानों के सामानों में 
अब सुमार है आदमी ।
डरा हुआ आदमी चुपचाप 
बोलता हुआ आदमी, अनायास ?
नौकरी करता हुआ वह आदमी भी
जो इमानदार है, कर्मठ आदमी !
जातियों में विभाजित, धार्मिक आदमी?
व्यापारी, अधिकारी, वैज्ञानिक, नेता !
भीड़तंत्र की मंडी का व्यापारी !
बहुत डरावना है यह दौर ?
आदमी की विविधता, विशेषता, सोच 
के टैग देखकर कीमत चुकाना !
परम्परागत मूल्यों के गिरते जाना !
सब कुछ हो गया है बाज़ार के हवाले !
जो समझ नहीं आता ?

-डॉ.लाल रत्नाकर

मंगलवार, 16 दिसंबर 2025

अजंता एलोरा और एलिफ़ेंटा खजुराहो, ताजमहल!


अजंता एलोरा 
और एलिफ़ेंटा 
खजुराहो, ताजमहल!
सब पर बहस 
करना बाक़ी है 
अभी तो बंदेमातरम् ?
को उठाऐ हैं!
अभी आपके 
रिश्तों में आग लगाएंगे।
प्रतीकों को 
हथियार बनाकर।
आपके घर तक आएंगे।
सावधान रहिए। 
उनकी इस तरह की 
वारदातों से सावधान रहिए !
बेईमानों से ।


-डॉ लाल रत्नाकर

उन्हें मेरी शक्ति का ? शायद एहसास नहीं है।


उन्हें मेरी शक्ति का ?
शायद एहसास नहीं है।
वर्तमान समय में धारा का !
जिस तरह से परिवर्तन हो रहा है ।
उसकी उम्मीद तो नहीं थी।
वादा तो विकास का था!
नकेल विनाश की !
कैसे पकड़ में आ गई ?
यह समझना भी बहुत मुश्किल है।
पर वह है कि मानता ही नहीं!
ऐसा लगता है जैसे जानता नहीं है !
कि विकास की वह धारा !
कितनी मुश्किल से 
यहाँ तक पहुँची थी ।
जन जन के विकास से 
उसको जैसे नफरत हो !
उसको लगता है 
सब कुछ समेट कर !
दोस्तों में ही लपेटकर
वह वहाँ जाना चाहता है !
जहाँ से वापस नहीं आया जाता ?
परन्तु यह देश तो यहीं रहेगा ।
और संस्थाएं फिर से ज़िंदा होगी।
अहंकार मर जाने के बाद ।
जिसको वह लेने में लगा है।
लुटेरों के सरगना की तरह !
लूट के लिए चिल्ला रहा है !
सबका साथ सबका 
विकास बता रहा है 


-डॉ.लाल रत्नाकर

आज के समय में जिस तरह के संकट खड़े किए जा रहे हैं।


आज के समय में 
जिस तरह के संकट 
खड़े किए जा रहे हैं। 
उन्हें संकट की बजाय, 
उपकार बताया जा रहा है। 
नौकरी लेकर लाभार्थी 
बनाया जा रहा है।
लाभार्थी को तरह-तरह से 
फुसलाया जा रहा है।
संविधान मिटाने के लिए। 
निष्पक्ष चुनाव कराने की बजाय। 
उनका वोट -
₹10000 में खरीदा जा रहा है। 
चुनाव आयोग समाप्त हो जाए। 
इसके लिए चुनाव आयुक्त 
पूरी तरह से आमादा है। 
ऐसा लगता है !
जैसे सरकार का प्यादा है।
यह लड़ाई केवल धर्म की नहीं है। 
धर्म की कम जातियों की ज्यादा है। 
यह देश की मर्यादा के खिलाफ है। 
पर इसको चलाने वाले !
अपने को देशभक्त कहते हैं। 
लड़ने की ताकत नहीं है। 
पर सत्ता में बने रहते हैं।
जो लोग सत्ता में  हैं !
वह क्यों सत्ता में हैं !
उन्हें नहीं पता वह किसके साथ हैं !


-डॉ लाल रत्नाकर

वक़्त तेज़ी से बदलता है बदलते हुए वक़्त में हम भूल जाते हैं वास्तविकता जीवन की !


वक़्त तेज़ी से बदलता है 
बदलते हुए वक़्त में 
हम भूल जाते हैं 
वास्तविकता जीवन की !

जीवन को जार-जार कर रहे होते हैं 
वह ठग समाज के 
जो सफल हो गए हैं 
ठगी के मायाजाल में !
उनको लगता है जीवन के मूल्य 
श्रम में नहीं ठगी में मौजूद है।

वो नहीं जानते बसावन कौन है
उनको यह भी नहीं पता है 
कि दुखी राम कौन है !
क्योंकि वह डी आर को जानते हैं 
और जानते हैं अक़बर को 
अकबर जानते थे बसावन कौन है 
और हम जानते हैं दुखी राम कौन है!

वक़्त बहु तेज़ी से बदल रहा है 
बदलते हुए वक़्त में 
तड़ीपार शासक हो गया है 
और चाय वाला !
प्रधान सेवक !
अगर यह सच है तो 
यह बदलता हुआ वक़्त है !

जो अब तक बाबा साहब को 
नहीं मानते थे 
अब उन्हें उनकी याद आ रही है 
वो ठग जो 50 से ज़्यादा वर्षों तक!
संविधान के नियमों को 
ताक पर रखकर राज कर रहे थे !
ठगो की जमात के साथ 
मूलतः तो वह भिखारी थे ?

जो आज अपनी संपदा 
बचाने के लिए शरणागत हो गए हैं !
बदलते हुए वक़्त के साथ !
वक़्त तेज़ी से बदलता है 
बदलते हुए वक़्त में 
हम भूल जाते हैं 
वास्तविकता जीवन की !

-डॉ लाल रत्नाकर 

चित्कार से मुक्त शक्ति की खोज


चित्कार से मुक्त 
शक्ति की खोज 
प्रकृति के नियम से युक्त शक्ति!
तवाह कर देगी !
उसकी नियति और नीति। 
जो प्रकृति के विधान को। 
सत्य और असत्य के 
संकुल से छेड़छाड़ करेगा। 
यदि तुम्हें गुमान है
की, तुम शक्तिमान हो। 
तो खबरदार यह बात समझ लो। 
प्रकृति से तुम छेड़छाड़ कर रहे हो। 
यह तुम्हारी प्रकृति है !
जो तुम्हें अनाचार की। 
अत्याचार फैलाने की,
और अंदर से डरे होने की।
अनुभूति कराता रहता है।
डर इस बात का भी रहता है !
कि तुम बौखला जाते हो। 
यह संविधान का ही विधान है !
कि तुम्हारी बौखलाहट 
नजर आने लगती है। 
प्रकृति उसे बहुत सलीके से 
उजागर कर देती है। 
अन्यथा तुम्हारे मन का 
चोर बाहर नहीं आता !
बाहर आती है बार बार 
तुम्हारी चोरी। 
मैं नहीं जानता चोरी के खिलाफ। 
संविधान के कानून क्या करेंगे। 
लेकिन इतना जरुर जानता हूं। 
प्रकृति के विधान तुम्हारा !
सत्यानाश कर देंगे। 
तब तुम बौखलाकर 
अनाप-सनाप बकने लगोगे।
यही है प्रकृति का प्रकोप !
प्रकृति का विधान।


-डॉ.लाल रत्नाकर

मैंकाले की वजह से असंख्य लोग शिक्षित हुए।







मैंकाले की वजह से
असंख्य लोग शिक्षित हुए।
जो मैकाले को गाली दे रहे हैं ?
वह सहज नहीं है उन्हें गुस्सा है।
उनका गुस्सा वाजिब भी है।
क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि 
लोग शिक्षित हों !
यह वही लोग हैं जो मनुस्मृति को 
मानते हैं ।
मनुस्मृति का मनुवाद
कितना खतरनाक है! 
क्या आप जानते हैं? 
यदि नहीं जानते हैं तो! 
वर्तमान सत्ता को 
समझने की कोशिश करिए।
फिर शिक्षा पर बात करिये !
अन्यथा सब बेमानी है !

-डा.लाल रत्नाकर 

वक्त या समय हस्ताक्षर होता है !

 


वक्त या समय
हस्ताक्षर होता है !
आमतौर पर
वक्त तेजी से गुजर जाता है !
लेकिन जो लोग उसके मर्म को
नहीं समझते !
वह ऐसे ही खड़े रह जाते हैं !
वक्त गुजर जाने के बाद!
मेरे बुजुर्गों ने कोशिश की थी।
पर उन्हें कितना निराश किया!
उनकी पीढ़ी के बाद।
जो संभल नहीं पाए !
बदलते हुए वक्त के साथ !
थे ऐसे हालात ?


-डा.लाल रत्नाकर

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

बर्बादी के लिए ज़िम्मेदार कौन है ?


बर्बादी के लिए ज़िम्मेदार कौन है ?
क्या वह बताएगा जो बर्वाद किया है ।
या वह अकड़कर आगे आएगा !
वही जो बेईमान है ।
उस पर ही तोहमत 
लगाएगा ।
जो वक़्त के हिसाब से वफादार है ।
प्रतिष्ठा के लिए नहीं !
मर्यादा बचाने के लिए भी नहीं।
सत्य को बचाए रखने के लिए।
यह कहानी जो नई नहीं है ।
हज़ारों हज़ार साल पुरानी है ।
बस उसके पात्र नये हैं !
जिनका अमानवीय किरदार है ।
इतिहास और इतिहासकार 
बदल रहे हैं ?
समाजवाद जो अब
नये साम्राज्यवादी
और मनुवादी हैं ।
दुनिया कहीं जाए, 
उनको देश गड्ढे में ले जाने की।
बहुत जल्दी है।
इस अपराध में उनकी
पूरी हिस्सेदारी है।
जिनको इस देश को बचाने की जिम्मेदारी है।
- डॉ लाल रत्नाकर

मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना।


मजहब नहीं सिखाता 
आपस में बैर रखना। 
यह गुलसिता हमारा,
यह वतन हमारा!
एस आई आर ?
नफरत का जहर है डाला। 
जातियों के आधार पर। 
मतदाता बना रहा। 
ऐसा बीएलओ ही बता रहा।
वह इस दबाव को सह नहीं पा रहा।
दबाव में ही वह जान गवा रहा है। 
एस आई आर के चक्कर में।
मौतों का मरघट 
चुनाव आयोग बना रहा है। 
यह कैसी चालाकी है। 
क्या देश में दुश्मन बाकी है। 
डॉ लाल रत्नाकर

लोग चले जाते हैं। रह जाता है उनका कृत्य।


लोग चले जाते हैं।
रह जाता है उनका कृत्य।
जब वह होते हैं 
तब समझ में नहीं आता। 
वह क्यों है। 
उनकी जरूरत क्या है?
जो समझ में आते हैं। 
जब वह चले जाते हैं। 
तब समझ में आता है। 
वह क्यों थे? 
उनकी जरूरत क्या थी। 
क्यों कर रहे थे वह दुष्कर्म।
जिन्हें हम याद करते हैं। 
सदियों सदियों युगों युगों। 
नहीं मानते उनकी बात। 
करते रहते हैं रात दिन खुरापात।
बकवास, लुच्चों का स्वागत।
टुच्चों का साथ।
मिला रहे होते हैं! 
हर उससे हाथ।
जो हाथ गंदे हैं। 
सने हुए हैं अपराध में। 
अपनों के सपनों के खिलाफ। 
झूठी वाहवाहियों में।
घूम रहे होते हैं दिन रात। 
हमें याद नहीं आते। 
जब वह हमें बता रहे होते हैं। 
हमारे विकास के मार्ग। 
वह बहुत याद आते हैं। 
जो ले जा रहे होते हैं। 
विनाश के मार्ग पर। 
हम क्यों नहीं पहचान पाते।
उनके कलुषित विचार।
हजारों हजार साल से। 
--डॉ लाल रत्नाकर

बुधवार, 26 नवंबर 2025

मुझे वह कभी पसंद नहीं था।





मुझे वह कभी पसंद नहीं था।
जो पसंद था ।
वह मेरे करीब नहीं था।
करीब तो वह भी नहीं था।
जो नापसंद था!
उसकी नापसंदगी में,
मेरा कोई दोष नहीं था,
उसके जो दुर्गुण थे ।
उसी से लोग उसे
अच्छा मानते थे।
उनके लिए वह अच्छा था।
जो खुद अच्छे नहीं थे।
यह बहुत विचित्र सवाल था।
सवाल का जवाब हमेशा।
मेरा बहुत अच्छा होता था।
लोग जवाब को अच्छा कहते थे।
लेकिन न जाने क्यों ?
हमसे खुश नहीं होते थे।
मैं मन ही मन सोचता था।
अच्छे को अच्छा कहना।
बुरे को बुरा कहना।
कैसे अच्छा नहीं है।
जो लोग इसका जवाब देते थे।
उनका कहना था।
कोई जरूरी है सब कुछ आपको कहना।
बात तो उनकी भी सही थी।
पर मुझे लगता था।
झूठे के सामने क्यों चुप रहना।
हालात देखिए!
पूरा देश चुप है।
झूठों के सामने।

-डा.लाल रत्नाकर 

सोमवार, 17 नवंबर 2025

हम क्यों गीत गाएँ

 

हम क्यों गीत गाएँ
विचारों की,
हत्या करें और गीत गाए।
तुम्हारी महफ़िल में
दरिंदे बहुत हैं ।
हत्यारों के उत्सव में 
'शोकगीत' गीत गाएँ।
लोकगीत गाऐं!
बिरह गीत गाऐं।
बीररस सुनाएं।
मन को समझाएं।
बहुत कष्ट उठाएं। 
यह किसको बताएं ,
किससे छुपाएं।
नफरत के मोहल्ले में 
कैसे उल्लास मनाएं।
कैसे दिल को बहलाएं। 
रचें या रचाऐंं।
क्या-क्या छुपाएं। 
क्या-क्या दिखाएं।

-डॉ लाल रत्नाकर

जो अपने साथ नहीं है


जो अपने साथ नहीं है 
वह उनका साथ ! 
छोड़ने की बात कर रहे हैं।
जो सदियों से उनके साथ खड़े हैं 
जिनको जोड़ने की बात कर रहे हैं 
हम उनके दुश्मन बने हुए हैं।
जो धर्म के नाम पर 
अधर्म की बात कर रहे हैं ।
जिस धर्म में हैं 
उनका धर्म नहीं है 
उस धर्म के यह बंधुआ हैं ।
जिनका कोई स्वाभिमान नहीं है 
हां यह इंसान नहीं है 
वहां यह भगवान ढूंढ रहे हैं। 
जो अपनों के साथ नहीं है 
सपनों की बात कर रहे हैं। 
इन अज्ञानियों की वजह से। 
हजारों साल से मानवता गुलाम है। 
जहां इंसान-इंसान नहीं है। 
वहां इनका कोई भगवान है। 
भगवान इन्हें जानता नहीं है।
मानता नहीं है।
यह उसी के भरोसे 
मानवता का विरोध कर रहे हैं 
दानवों का समर्थन।
जो अपनों के नहीं हैं 
वह अपने दुश्मनों को 
जोड़ने की बात कर रहे हैं। 

-डॉ लाल रत्नाकर

बुधवार, 12 नवंबर 2025

आयोग अयोग्यता की पराकाष्ठा पर !


तुम्हारा जन्म ही दूषित तरीके से हुआ है 
"आयोग" अयोग्यता की पराकाष्ठा पर !
इतरा रहे हो शर्म देश को आ रही है !
तुम्हारे नाज़ायज़ बाप तुम्हें बेच रहे हैं !
"आयोग"अयोग्यता की पराकाष्ठा पर !

अंधों की तरह तुम बिक रहे हो आने पौने में !
तुमने बिहार को देखा ! वह बुद्ध की धरती है !
वहां झूठ बेईमानी, तानाशाही नहीं चलेगी !
"आयोग"अयोग्यता की पराकाष्ठा पर !

तुम्हारे जैसे अफसर मिल जरूर जाएंगे !
पर कितने कुछ तो ईमानदार होंगे ही !
गुजरात में भले ना हों क्योंकि ?
उनको जेल में डाल दिया गया है !
हो सकता है वह भूल गए हों कि वह !
संविधान की शपथ लेकर आये थे !
बेच दिया हो अपने वसूल कारपोरेट को !
"आयोग"अयोग्यता की पराकाष्ठा पर !

-डॉ० लाल रत्नाकर